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मध्यप्रदेश: कमजोर हो रहे ज्योतिरादित्य सिंधिया? ग्वालियर-चंबल में भाजपा के अंदर की गुटबाजी खुलकर आ रही सामने

Fri, 25 Sep 2026 04:08 PM IST
Anand Pawar न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भोपाल
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भोपाल Published by: Anand Pawar Updated Fri, 25 Sep 2026 04:08 PM IST
सार

2020 में जब केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया भाजपा में शामिल हुए तो उनका अलग रुतबा था, लेकिन समय के साथ उनका प्रभाव कम होने लगा है। हाल के दिनों में घटित घटनाओं से यह संकेत मिल रहे हैं कि ज्योतिरादित्य सिंधिया ग्वालियर-चंबल के इलाके में कमजोर हो रहे हैं। उनके गृह क्षेत्र ग्वालियर में उनके लिए ऐसी परिस्थिति ज्यादा बन रही है। उनका स्थानीय सांसद के साथ सामंजस्य नहीं बैठ रहा है। हाल ही में सांसद भरत सिंह कुशवाह के समर्थकों ने सिंधिया को काले झंडे तक दिखा दिए थे। 

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MP: Is Scindia Losing Ground? BJP Factionalism Surfaces Openly in Gwalior-Chambal
ज्योतिरादित्य सिंधिया, सीएम मोहन यादव, विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर, भारत सिंह कुशवाह (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया और ग्वालियर के सांसद भरत सिंह कुशवाह के समर्थकों के बीच विकास कार्यों के श्रेय को लेकर राजनीतिक खींचतान अब सार्वजनक रूप से सामने आ रही है। भरत सिंह कुशवाह को भाजपा के वरिष्ठ नेता और विस स्पीकर नरेंद्र सिंह तोमर का करीबी बताया जाता है। 2020 में ज्योतिरादित्य सिंधिया कई समर्थक विधायकों के साथ भाजपा में शामिल हुए थे। इससे क्षेत्र में  सिंधिया का राजनीतिक प्रभाव भाजपा के भीतर तेजी से बढ़ा। हालांकि, समय के साथ क्षेत्र में भाजपा के पुराने नेताओं और सिंधिया समर्थक नेताओं के बीच राजनीतिक भूमिका, स्थानीय प्रतिनिधित्व और विकास कार्यों के श्रेय को लेकर खींचतान की घटनाएं भी सामने आती रही हैं। हाल की घटनाओं ने एक बार फिर इस चर्चा को तेज कर दिया है कि क्या ग्वालियर-चंबल में सिंधिया के सामने स्थानीय स्तर पर राजनीतिक चुनौती बढ़ रही है? खासकर ग्वालियर में केंद्रीय मंत्री के कार्यक्रम में काले झंडे दिखाए जाने और इसके बाद भाजपा से जुड़े दो समूहों के बीच विवाद ने पार्टी के अंदर के समीकरणों को चर्चा में ला दिया है।
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काले झंडे दिखाने से गरमाई ग्वालियर की राजनीति
21 सितंबर को बेला की बावड़ी में कुशवाहा समाज के छात्रावास के भूमिपूजन कार्यक्रम में सिंधिया मुख्य अतिथि थे। उनके भाषण के दौरान कुछ लोगों ने काले झंडे दिखाकर विरोध किया। इसके बाद कार्यक्रम स्थल पर विवाद बढ़ गया और दो समूहों के बीच हाथापाई की स्थिति बन गई। पुलिस ने मौके पर पहुंचकर स्थिति संभाली। मीडिया रिपोर्टों में प्रदर्शन कर रहे लोगों को ग्वालियर सांसद भरत सिंह कुशवाह से जुड़े लोगों के तौर पर बताया गया। विरोध करने वालों की ओर से कहा गया कि छात्रावास के लिए जमीन कुशवाहा समाज से जुड़ी है, इसलिए कार्यक्रम में समाज के नेताओं और स्थानीय जनप्रतिनिधियों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए थी। हालांकि, प्रदर्शनकारियों के किसी राजनीतिक गुट से जुड़े होने की आधिकारिक पुष्टि स्पष्ट रूप से सामने नहीं आई है। यही घटना अब ग्वालियर की राजनीति में चर्चा का विषय है। मामला सिर्फ काले झंडे दिखाने तक सीमित नहीं है। इसके पीछे स्थानीय प्रतिनिधित्व और विकास कार्यों के श्रेय का सवाल भी जोड़ा जा रहा है।
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सिंधिया और स्थानीय नेतृत्व के बीच तालमेल का सवाल
ग्वालियर में बड़े विकास कार्यों के उद्घाटन, भूमिपूजन और कार्यक्रमों में किस नेता को प्रमुखता मिलती है, यह अब राजनीतिक नजरिए से भी देखा जा रहा है। सिंधिया के समर्थक जहां क्षेत्र में उनकी सक्रियता और केंद्र सरकार से जुड़ी परियोजनाओं को सामने रखते हैं, वहीं, स्थानीय नेता अपने क्षेत्र में अपनी भूमिका और भागीदारी को महत्वपूर्ण मानते हैं। फरवरी 2026 में ग्वालियर विकास कार्यों की समीक्षा बैठक कलेक्टर कार्यालय में हुई। इस बैठक को केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने लिया, लेकिन स्थानीय सांसद भरत कुशवाह बैठक में नहीं पहुंचे। इसको लेकर अलग-अलग अटकलें लगाई। यही वजह है कि विकास कार्यों का श्रेय किसे मिले, कार्यक्रमों में किसकी भूमिका प्रमुख हो और स्थानीय जनप्रतिनिधियों को कितना महत्व मिले— ये मुद्दे पार्टी के अंदर के समीकरणों को प्रभावित कर सकते हैं? 


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तोमर से भी मतभेद चर्चा में 
ग्वालियर-चंबल की भाजपा राजनीति में सिंधिया के अलावा नरेंद्र सिंह तोमर भी लंबे समय से महत्वपूर्ण भूमिका में रहे हैं। ग्वालियर सांसद भरत सिंह कुशवाह को नरेंद्र सिंह तोमर का ही करीबी बताया जाता है। सिंधिया और तोमर खेमे के बीच मतभेद की चर्चा पहले भी होती रही है। पिछले साल एक कार्यक्रम में तोमर ने बिना नाम लिए टिप्पणी की थी जो हर काम का श्रेय खुद लेने की बात करते हैं, यह मैं लाया, उनको मैं मैं से फुर्सत ही नहीं हैं। उस समय राजनीतिक हलकों में इसे सिंधिया खेमे से जोड़कर देखा गया था। हालांकि, ग्वालियर-चंबल में भाजपा के भीतर अलग-अलग राजनीतिक प्रभाव केंद्र लंबे समय से मौजूद हैं। 

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केपी यादव प्रकरण भी रहा चर्चा में
सिंधिया खेमे और भाजपा के दूसरे नेताओं के बीच राजनीतिक मतभेद की चर्चा का एक उदाहरण पूर्व सांसद केपी यादव से भी जुड़ा रहा है। 2019 के लोकसभा चुनाव में यादव ने गुना सीट से सिंधिया को हराया था। इसके बाद मार्च 2020 में सिंधिया भाजपा में शामिल हुए और 2024 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने गुना से जीत दर्ज की। मई 2026 में सिंधिया समर्थक कृष्णा घाड़गे की सोशल मीडिया पोस्ट को लेकर भाजपा ने उन्हें कारण बताओ नोटिस भी जारी किया था। इस पोस्ट को केपी यादव के खिलाफ बताया गया था। इस घटनाक्रम के बाद एक बार फिर सिंधिया समर्थक नेताओं और पार्टी के दूसरे नेताओं के बीच राजनीतिक मतभेद की चर्चा हुई।

2023 में भी सिंधिया समर्थक छह विधायक हारे 
2023 के विधानसभा चुनाव में सिंधिया के साथ 2020 में भाजपा में आए 19 नेताओं में से भाजपा ने 13 को टिकट दिया। इनमें सात चुनाव जीतने में सफल रहे, जबकि छह को हार का सामना करना पड़ा। जीतने वालों में ग्वालियर से प्रद्युम्न सिंह तोमर, सुरखी से गोविंद सिंह राजपूत, सांची से प्रभुराम चौधरी, सांवेर से तुलसीराम सिलावट, मुंगावली से बृजेंद्र सिंह यादव, हाटपिपल्या से मनोज चौधरी और भितरवार से मोहन सिंह राठौड़ शामिल थे। उपलब्ध चुनावी रिपोर्टों में भी 13 टिकट पाने वालों में छह की हार दर्ज है। दूसरी तरफ पूरे ग्वालियर-चंबल की तस्वीर देखें तो 2018 में भाजपा को 34 में से सात सीटें मिली थीं, जबकि 2023 में पार्टी ने 18 सीटों पर जीत दर्ज की। यानी क्षेत्र में भाजपा का प्रदर्शन बेहतर हुआ, लेकिन सिंधिया समर्थक नेताओं का व्यक्तिगत प्रदर्शन एक जैसा नहीं रहा।
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