एमपी में कांग्रेस के मजबूत गढ़ में CM मोहन की 'जनविश्वास' दस्तक, छिंदवाड़ा से बालाघाट तक क्या है सियासी संदेश?
सीएम मोहन यादव ने जनविश्वास अभियान की शुरुआत की है। इस अभियान की शुरुआत छिंदवाड़ा से हुई है। छिंदवाड़ा 2023 के विधानसभा चुनाव तक कांग्रेस का अभेद किला था। लोकसभा चुनाव में सीएम ने इसे भेद दिया है। अब मिशन 2028 की तैयारी है, कांग्रेस की जमीन जहां मजबूत है। सीएम मोहन यादव का जनविश्वास वहां पहुंच रहा है। पढ़ें पूरी खबर
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विस्तार
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव जनविश्वास अभियान के तहत शुक्रवार को रक्षाबंधन होने के कारण शनिवार को बालाघाट में जनता से संवाद करेंगे। 7 अगस्त को छिंदवाड़ा से शुरू हुआ यह अभियान अब तक बड़वानी, टीकमगढ़ के बाद बालाघाट पहुंचने वाला है। इन चार जिलों में 2023 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का प्रदर्शन भाजपा से बेहतर रहा था। ऐसे में 2028 के विधानसभा चुनाव से पहले इन इलाकों में मुख्यमंत्री का सीधा संपर्क भाजपा के जमीनी आधार को मजबूत करने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है।
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आदिवासी वर्ग में पैठ बढ़ा रहे
प्रदेश में अनुसूचित जनजाति की संख्या करीब 22 प्रतिशत है। यहां 230 में से 47 प्रतिशत सीटें आदिवासी वर्ग के लिए आरक्षित हैं। जनविश्वास में शामिल चार जिलों में से तीन छिंदवाड़ा, बड़वानी और बालाघाट आदिवासी बहुल हैं। 2023 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने यहां से 24 सीटें जीती थीं। भाजपा की लहर के बावजूद कांग्रेस यहीं से 22 सीटें जीतने में सफल रही। रतलाम जिले की सैलाना सीट पर भारत आदिवासी पार्टी ने जीत दर्ज की। इससे पहले 2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 30 सीटीें जीती थी और भाजपा खिसककर 16 पर आ गई थी। इसी कारण भाजपा की सत्ता चली गई थी। वहीं, 2013 के चुनाव में भाजपा के पास 31 सीटें थीं। इसीलिए सत्तारूढ़ भाजपा 2028 के चुनाव के पहले आदिवासी वर्ग में पैठ बढ़ाने के लिए अभी से पूरी तरह सक्रिय हो गई है।
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20 सीटों में से कांग्रेस के पास 15 सीट
इन चार जिलों की 20 विधानसभा सीटों के 2023 के नतीजे देखें तो तस्वीर काफी स्पष्ट है। छिंदवाड़ा में पांढुर्ना को मिलाकर सभी सात सीटें कांग्रेस के खाते में गई थीं। हालांकि, भाजपा ने अमरवाड़ा की एक सीट उपचुनाव में अपने कब्जे में ले ली थी। वहीं, बालाघाट की छह में से चार सीटें कांग्रेस ने जीतीं, जबकि भाजपा को दो सीटें मिलीं। बड़वानी की चार में से तीन सीटों पर कांग्रेस और एक पर भाजपा जीती थी। टीकमगढ़ की तीन सीटों में कांग्रेस ने दो और भाजपा ने एक सीट जीती थी। यानी चारों जिलों में कुल 20 सीटों में अभी कांग्रेस के पास उपचुनाव के बाद 15 और भाजपा के पास पांच सीटें हैं। यही वजह है कि जनविश्वास अभियान के रूट को राजनीतिक नजर से भी देखा जा रहा है। खासतौर पर छिंदवाड़ा भाजपा के लिए लंबे समय से महत्वपूर्ण राजनीतिक मैदान रहा है। 2023 में कांग्रेस ने यहां क्लीन स्वीप किया था।
छिंदवाड़ा में भाजपा ने लगाई सेंध
छिंदवाड़ा को कांग्रेस का मजबूत किला माना जाता रहा हैं, लेकिन मोहन यादव के मुख्यमंत्री बनने के बाद कांग्रेस के इस अभेद किले में भी 2024 में भाजपा ने सेंध लगा दी। लोकसभा चुनाव के पहले भाजपा ने छिंदवाड़ा में सक्रियता बढ़ाई और लंबे समय से कांग्रेस के कब्जे में रही लोकसभा की सीट भी जीत ली। साथ ही उपचुनाव में अमरवाड़ा सीट पर भी कब्जा किया।
छिंदवाड़ा से जनविश्वास अभियान की शुरुआत करते हुए मुख्यमंत्री ने जनता की शिकायतों पर सीधे कार्रवाई का संदेश दिया था। पहले ही दिन सीएमएचओ और तहसीलदार समेत तीन अधिकारियों के खिलाफ निलंबन की कार्रवाई की गई। टीकमगढ़ में भी मुख्यमंत्री ने जनविश्वास अभियान के दौरान अधिकारियों के कामकाज पर सख्ती दिखाई। जिला पंजीयक सहकारिता को निलंबित किया गया। इसके अलावा कुंडेश्वर धाम को 'कुंडेश्वर लोक' के रूप में विकसित करने की घोषणा की गई। वहीं, बड़वानी में तहसीलदार, दो सीएमओ समेत सात अधिकारियों पर कार्रवाई की गई।
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2028 से पहले 'ग्राउंड कनेक्ट' की परीक्षा
राजनीतिक जानकारों के अनुसार जनविश्वास अभियान भाजपा सरकार के लिए सरकार के कामकाज की सीधी परीक्षा भी है। जिन इलाकों में कांग्रेस ने 2023 में बढ़त बनाई थी, वहां मुख्यमंत्री का सीधे जनता के बीच जाना भाजपा के लिए दोहरा लक्ष्य साध सकता है। एक तरफ सरकार के प्रति भरोसा बढ़ाना और दूसरी तरफ संगठन के कमजोर इलाकों में राजनीतिक जमीन मजबूत करना। यानी सवाल सिर्फ यह नहीं है कि जनविश्वास अभियान में कितनी शिकायतें हल होती हैं? बड़ा राजनीतिक सवाल यह भी है कि क्या छिंदवाड़ा से बालाघाट तक की यह 'जनविश्वास' यात्रा 2028 के विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस के मजबूत इलाकों में भाजपा का जनाधार बढ़ा पाएगी?
