यूपी: जेल में मोबाइल से रंगदारी मांगने के मामले में डॉन बबलू श्रीवास्तव बरी, साक्ष्य नहीं जुटा सकी सीबीआई
माफिया डॉन बबलू श्रीवास्तव को लखनऊ की सीबीआई कोर्ट ने करीब 20 साल पुराने अपहरण मामले में बरी कर दिया है। हालांकि, उनकी जेल से रिहाई फिलहाल संभव नहीं है। कस्टम कलेक्टर एलडी अरोड़ा हत्याकांड में उन्हें उम्रकैद की सजा मिली थी और राज्यपाल उनकी दया याचिका खारिज कर चुके हैं।
विस्तार
जेल में बंद रहने के दौरान दूसरे का सिम प्रयोग करके रंगदारी मांगने के आरोपी अंतरराष्ट्रीय डॉन ओमप्रकाश श्रीवास्तव उर्फ बबलू श्रीवास्तव को सीबीआई की न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रतिभा सिंह ने साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया। कोर्ट ने बबलू श्रीवास्तव को बरी करते हुए कहा कि आरोपी 20 हजार रुपये की एक जमानत दाखिल करे। अगर इस निर्णय के खिलाफ कोई अपील होती है तो आरोपी अपीलीय कोर्ट की नोटिस पर हाजिर होगा।
कोर्ट ने कहा कि अभियोजन आरोपों को साबित करने में पूरी तरह से विफल रहा है। अभियोजन का पूरा कथानक विश्वसनीयता की कसौटी पर खरा नहीं उतरता है। अभियोजन के अनुसार हाईकोर्ट ने एक फरवरी 1999 को बबलू श्रीवास्तव के द्वारा नैनी जेल के अंदर से सैल्यूलर फोन के जरिए अपने गैंग के सदस्यों से संपर्क कर जेल के बाहर अपराध करने और लोगो से रंगदारी मांगने के आरोपों की सीबीआई से जांच कराने की मांग वाली रिट पर मामला सीबीआई को सौंपने का आदेश दिया था। रिट में कहा गया था कि जेल कर्मचारी यह सुविधा बबलू श्रीवास्तव को मुहैया करा रहे थे।
अनुमति मांगी लेकिन वादी ने इनकार कर दिया
हाईकोर्ट ने अपने इस आदेश में कहा था की हत्या, अपहरण और वसूली का अपराध एक उद्योग के रूप में विकसित हो रहा है और व्यापारी एवं अन्य नागरिक व उनके रिश्तेदार अपहृत हो रहे हैं। कहा गया कि 14 दिसंबर 1998 को वादी धीरेंद्र कुमार श्रीवास्तव ने कैंट थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई थी।
हाईकोर्ट के आदेश के बाद सीबीआई ने 24 फरवरी 1999 को मामला दर्ज करते हुए धीरेंद्र श्रीवास्तव के मामले की जांच शुरू की। बताया गया कि धीरेंद्र श्रीवास्तव ने रिपोर्ट दर्ज करके बताया था की उन्होंने अपना सिम कार्ड और मोबाइल फोन संतोष शर्मा, मुदित श्रीवास्तव और गौरव श्रीवास्तव को बेच दिया था। लगभग एक सप्ताह बाद एस्सार कंपनी का कर्मचारी वादी के पास आया और उसके मोबाइल पर एसटीडी सुविधा चालू करने की अनुमति मांगी लेकिन वादी ने इनकार कर दिया।
इसके लगभग एक माह बाद वादी के पास नौ हजार रुपये का बिल आया तो उन्होंने ने एस्सार कंपनी से संपर्क किया। कंपनी की कर्मचारी मनीषा जायसवाल और प्रवीण सावंत ने वादी को धमकाया। वादी के सिम कार्ड का प्रयोग एक प्रभावशाली और बड़े आदमी द्वारा किया जा रहा है।
आगे कहा गया कि 14 दिसंबर 1998 को मुदित श्रीवास्तव, गौरव श्रीवास्तव और संतोष शर्मा ने भी धमकी दी कि अगर सिम कार्ड के विषय में पूछताछ की तो वादी को और इनके परिवार को समाप्त कर दिया जाएगा क्योंकि सिम का इस्तेमाल नैनी जेल में बंद कुख्यात अपराधी बबलू श्रीवास्तव कर रहा है। सीबीआई की ओर से बताया गया कि विवेचना में पता चला की बबलू श्रीवास्तव 31 जनवरी 1997 से 11 जून 1999 तक नैनी जेल में बंद रहा। इसके बाद उसे बरेली जेल में स्थानांतरित कर दिया गया।
धमकाकर डराकर पैसा देने के लिए विवश किया
इस दौरान एक बार भी बबलू को नैनी जेल से बाहर नहीं लाया गया लेकिन आरोपी नैनी जेल में बंद रहने के दौरान अनेक सिम की सहायता से मोबाइल फोन का प्रयोग किया। कहा गया कि आरोपी ने जेल के बाहर कृष्णा शेट्टी और अपने अन्य साथियों से संपर्क करके लोगों से रंगदारी मांगी।
बताया गया कि बबलू के साथी जेलकर्मियों को रिश्वत देते थे, जिसके चलते वह जेल से मोबाइल का प्रयोग करता था। बबलू श्रीवास्तव के सहयोगी फर्जी नाम-पते पर सिम कार्ड खरीदकर बबलू को जेल में पहुंचाते थे। सीबीआई ने आरोप लगाया था कि इन्हीं सिम कार्ड से बबलू श्रीवास्तव नैनी जेल में बंद रहते हुए क्रिकेट सट्टा संचालक, सट्टेबाज से संपर्क किया और उन्हें धमकाकर डराकर पैसा देने के लिए विवश किया।
बताया गया कि बबलू के गिरोह ने हुबली, कच्छ, इंदौर, अहमदाबाद और दरभंगा जैसे जगहों पर अपहरण, हत्या और रंगदारी जैसे अपराध किए हैं। आगे कहा गया कि वादी धीरेंद्र श्रीवास्तव के सिम में एसटीडी सुविधा पाने के लिए उसके फर्जी हस्ताक्षर करके एस्सार कंपनी को पत्र लिखा गया था।
बबलू ने इस सिम का प्रयोग करके मुंबई के पीर हैंड, दिलीप जैन, निमेंद्र कुमार चोकसी और विनोद जी असरानी को धमकी देकर रंगदारी वसूली थी। यही नहीं, आरोपी ने क्रिकेट मैच में सट्टा खेलने और क्रिकेट मैचों का विवरण नैनी जेल में बबलू को उपलब्ध कराने के लिए मजबूर किया। सीबीआई ने विवेचना के बाद आरोपी बबली श्रीवास्तव के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की थी। कोर्ट ने इसका संज्ञान लेकर बबलू श्रीवास्तव पर 30 अक्तूबर 2003 को जान का भय दिखाकर रंगदारी मांगने और धमकी देने के आरोपों में आरोप तय किए थे।
अपहरण के मामले में बड़ी कानूनी राहत मिली
माफिया डॉन ओम प्रकाश उर्फ बबलू श्रीवास्तव को करीब 20 साल पुराने अपहरण के मामले में बड़ी कानूनी राहत मिली है। 6 नवंबर को लखनऊ की सीबीआई कोर्ट ने बबलू श्रीवास्तव को इस मामले में बरी कर दिया है। अंतरराष्ट्रीय माफिया डॉन बबलू श्रीवास्तव के खिलाफ मुकदमे में भले ही हाईकोर्ट ने बरी कर दिया है लेकिन उनका जेल से बाहर आना फिलहाल मुमकिन नहीं है। बबलू पहले से सजायाफ्ता है। 6 नवंबर 2024 में राज्यपाल द्वारा उसकी दया याचिका को खारिज किया जा चुका है।
बता दें कि 24 मार्च 1993 में बबलू श्रीवास्तव ने प्रयागराज में अपने गुर्गों के साथ कस्टम कलक्टर एलडी अरोड़ा की हत्या कर दी थी। इस हत्याकांड के बाद बबलू पर टाडा लगाया गया था जिसके बाद 30 सितंबर 2008 को कानपुर नगर स्थित कोर्ट ने बबलू को उम्र कैद की सजा सुनाई थी।
वहीं 25 जनवरी 2011 को सुप्रीम कोर्ट ने भी इस सजा को यथावत रखा था। हालांकि बाद में सुप्रीम कोर्ट ने उसकी दया याचिका पर राज्य सरकार ने विचार करने को कहा था। राज्य सरकार ने शीर्ष अदालत को बताया था कि बबलू श्रीवास्तव की दया याचिका को खारिज किया जा चुका है।
उसके साथी मंगेश व कमल किशोर सैनी की दया याचिका भी खारिज कर दी गई थी। बता दें कि वर्तमान में बबलू बरेली सेंट्रल जेल में बंद है। इससे पहले प्रयागराज के पंकज महिंद्रा अपहरण कांड से भी बबलू बरी हुआ था लेकिन उसकी जेल से रिहाई नहीं हो पाई थी।