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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Lucknow News ›   The saffron camp is desperate to make history, so the opposition is weaving a web of equations, ground reports from Tirwa, Maharajpur, Maholi and Sitapur

यूपी का रण : भगवा खेमा इतिहास बनाने को बेकरार, तो विपक्षी बुन रहे समीकरणों का जाल, तिर्वा, महाराजपुर, महोली और सीतापुर से ग्राउंड रिपोर्ट

Wed, 16 Feb 2022 02:22 AM IST
पंकज श्रीवास्‍तव अमर उजाला ब्यूरो, लखनऊ
अमर उजाला ब्यूरो, लखनऊ Published by: पंकज श्रीवास्‍तव Updated Wed, 16 Feb 2022 02:22 AM IST
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सार
यूपी के रण में मुद्दों का भी इम्तिहान है। हो भी रहा है। कई चले। चलते ही जा रहे हैं। कुछ का शोर था। शुरुआत में बड़ा जोर था। पर, असल परीक्षा आते ही वे फुस्स हो गए। क्या वे सिर्फ दिखावटी थे? क्या वे सिर्फ बनावटी थे? यकीनन यह तो नहीं कह सकते। पर, सवालों के घेरे में मुद्दे भी हैं।
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The saffron camp is desperate to make history, so the opposition is weaving a web of equations, ground reports from Tirwa, Maharajpur, Maholi and Sitapur
यूपी चुनाव 2022 - फोटो : amar ujala

विस्तार

अनुभवी महाना के सामने नए खिलाड़ी


महाराजपुर : भगवा खेमा इतिहास बनाने को बेकरार, तो विपक्षी बुन रहे समीकरणों का जाल
कानपुर : महाराजपुर सीट वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में अस्तित्व में आई।  छावनी और किदवई नगर के कुछ हिस्से को मिलाकर महाराजपुर विधानसभा सीट बनाई गई है। बहरहाल, अस्तित्व  मंें आने के बाद से इसपर भाजपा ही काबिज है। पार्टी के वरिष्ठ नेता और कैबिनेट मंत्री सतीश महाना बड़े अंतर से जीतकर विधायक बने। बसपा लगातार दूसरे नंबर पर बनी रही, जबकि सपा तीसरे और कांग्रेस चौथे स्थान पर रही है। कांग्रेस की तरफ  से पिछली बार पूर्व सांसद राजाराम पाल चुनाव लड़े थे, अब वह कांग्रेस छोड़कर समाजवादी पार्टी में शामिल हो गए हैं। 

2022 के विधानसभा चुनाव में एक बार फिर से भाजपा के टिकट पर सतीश महाना चुनाव मैदान में हैं। यह उनका आठवां विधानसभा चुनाव है। पिछले सात बार से वह लगातार विधायक चुने जा रहे हैं। महाराजपुर विधानसभा सीट बनने से पहले वह छावनी विधानसभा क्षेत्र से लगातार पांच बार विधायक रह चुके हैं।  समाजवादी पार्टी की तरफ  से अवतार सिंह गिल, कांग्रेस की तरफ से यूथ इकाई के प्रदेश अध्यक्ष कनिष्क पांडेय और बहुजन समाज पार्टी की तरफ  से सुरेंद्र पाल सिंह चुनाव मैदान में ताल ठोक रहे हैं। खास बात है कि सपा, कांग्रेस, बसपा ने नए चेहरों को मैदान में उतारा है। यानी सभी विपक्षी पार्टियों के प्रत्याशियों का पहला चुनाव है। लिहाजा सपा, बसपा, कांग्रेस के रणनीतिकार नए समीकरण बनाकर भाजपा को मात देने की तैयारियों में जुटे हैं। जबकि, भगवा खेमा यहां नया इतिहास रचने के लिए बेताब है।

महाराजपुर विधानसभा क्षेत्र में सवर्ण मतदाताओं के साथ-साथ पिछड़ा और दलित मतदाताओं की संख्या अच्छी खासी है। विधानसभा क्षेत्र का ज्यादातर हिस्सा ग्रामीण है। अन्य ग्रामीण क्षेत्रों की तरह इस क्षेत्र में भी खेती-किसानी बड़े पैमाने पर की जाती है। इसी तरह शहरी क्षेत्र में ऐसी अधिकांश कॉलोनियां पिछले कुछ वर्षों में विकसित हुईं, जहां पर बड़ी संख्या में नौकरी पेशा और कारोबार करने वाले लोग आकर बसे। पिछले 10 वर्षों में इस विधानसभा क्षेत्र का स्वरूप काफी कुछ बदला है। ऐसे में यहां का मिजाज भी अलग है। बहरहाल, बस्तियों में, कॉलोनियों में, गांवों में जगह-जगह चुनावी बैठकों का दौर जारी है। जातिगत आधार पर लामबंदी की भी कोशिशें की जा रही हंै।

वोटों का गणित
कुल वोटर 4,38,684 

ब्राह्मण  53 हजार
पासी  41 हजार
क्षत्रिय  39 हजार
जाटव  36 हजार
पाल  26 हजार
यादव  26 हजार
कुशवाहा  25 हजार
मुस्लिम  22 हजार
निषाद  21 हजार
वैश्य  19 हजार
कोरी  16 हजार
तेली  21 हजार
कठेरिया  16 हजार
वाल्मीकि  15 हजार

2017 का चुनाव परिणाम
सतीश महाना, भाजपा  1,32,394
मनोज कुमार शुक्ला, बसपा  40,568
अरुणा तोमर, सपा  38,752
राजाराम पाल, कांग्रेस  18,697

मुस्लिम-ब्राह्मण मतदाताओं पर टिका जीत का दारोमदार, मुद्दे गौण, जातीय समीकरणों के सहारे ही पार होगी नैया

सीतापुर : सदर विधानसभा क्षेत्र का चुुनावी दंगल जीतने के लिए उतरे सियासी पहलवानों में से किसका राजतिलक होगा, यह बहुत कुछ मुस्लिम और ब्राह्मण मतदाताओं के रुख से तय होगा। यहां का चुुनाव पूरी तरह से जातीय समीकरणों पर आकर टिक चुका है। यही वजह है कि चुनावी चौसर में मुद्दे गौण होते जा रहे हैं। भाजपा और सपा के बीच ही मुख्य मुकाबला माना जा रहा है। हालांकि, निर्दलीय उम्मीदवार ने भाजपा की धड़कनें बढ़ा रखी हैं। वहीं, बसपा और कांग्रेस के मुस्लिम उम्मीदवार भी मुस्लिम वोट बैंक में सेंध लगाकर सपा की मुश्किलें बढ़ा सकते हैं।

सदर विधानसभा सीट पर भाजपा और सपा की प्रतिष्ठा दांव पर लगी हुई है। 1977 में जनता पार्टी के टिकट से जीते राजेंद्र गुप्त लगातार छह बार विधायक चुने गए। 1993 तक उनका परचम फहराता रहा। पर, 1996 में उन्हीं के शिष्य रहे सपा के राधेश्याम जायसवाल ने उन्हें मात देकर सीट पर कब्जा जमा लिया। लगातार 2012 तक चार बार राधेश्याम विधायक रहे, लेकिन 2017 में मोदी लहर में उन्हें हार का सामना करना पड़ा। भाजपा से राकेश राठौर विधायक बने। हालांकि, इन दिनों वे सपा में हैं। 

इस बार सपा ने पूर्व प्रत्याशी और चार बार के विधायक राधेश्याम जायसवाल पर दांव लगाया है, जबकि भाजपा ने नए चेहरे राकेश राठौर गुरु को मैदान में उतारा है। हालांकि, सियासी पंडितों का मानना है कि सीट पर सीधी और कड़ी टक्कर भाजपा और सपा के बीच ही है। वहीं, कांग्रेस की प्रत्याशी शमीना शफीक और बसपा प्रत्याशी खुर्शीद अंसारी भी मुस्लिम वोट बैंक में सेंधमारी कर रहे हैं। यानी सपा प्रत्याशी राधेश्याम जायसवाल को पूरा मुस्लिम वोट मिलेगा, इस पर अभी संशय के बादल मंडरा रहे हैं। सदर विधानसभा क्षेत्र में सबसे ज्यादा मुस्लिम मतदाताओं की संख्या एक लाख के करीब है, जबकि ब्राह्मण 60 हजार हैं। ऐसे में इस सीट पर दोनों ही समुदाय के मतदाता निर्णायक की भूमिका होंगे। सियासी पंडितों का मानना है कि इन मतदाताओं का रुझान जिधर होगा, उसकी जीत की राह आसान होगी। फिलहाल इस सीट पर मुकाबला कड़ा है। संवाद

बागी साकेत क्या गुल खिलाएंगे?
महोली और सदर सीट के लिए दावेदारी कर रहे भाजपा नेता साकेत मिश्रा ने टिकट नहीं मिलने के बाद बगावती तेवर अख्तियार कर लिया है। निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में वे मैदान में हैं। हर दिन सियासी घटनाक्रम में नया-नया रंग देकर चुनावी मौसम का मिजाज बदल रहे हैं।  शहर समेत ग्रामीण क्षेत्रों में कुछ इलाके ऐसे हैं, जहां पर साकेत की अच्छी पकड़ मानी जा रही है। सोशल साइट्स पर भी उन्हें लोगों का समर्थन मिल रहा है। सियासी पंडितों का कहना है कि साकेत सीधे-सीधे बाह्मणों का वोट काटेंगे। ऐसे में इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि वह भाजपा का खेल नहीं बिगाड़ेंगे।

2017 का चुनाव परिणाम
राकेश राठौर, भाजपा 98,850
राधेश्याम जायसवाल, सपा 74,011
अशफाक खां बसपा, 52,181

वोटों का गणित
3,95,416 कुल वोटर

मुस्लिम   01 लाख
ब्राह्मण    60 हजार
लोधी    25 हजार
तेली    15 हजार
कलवार  10 हजार
क्षत्रिय   15 हजार
कुर्मी   18 हजार
पासी   28 हजार
जाटव   25 हजार

तिर्वा : कभी एक दल का नहीं रहा दबदबा, लोधी-पाल मतदाता होंगे निर्णायक

कन्नौज जिले की तिर्वा विधानसभा सीट पर कभी किसी एक राजनीतिक दल का कब्जा नहीं रहा है। भाजपा ने लोधी, राजपूत और पार्टी के परंपरागत ब्राह्मण, क्षत्रिय और अति पिछड़ा वर्ग के अन्य वोट को देखते हुए विधायक कैलाश राजपूत को दोबारा प्रत्याशी बनाया है। वहीं, समाजवादी पार्टी ने यादव, मुस्लिम, पाल का समीकरण बनाते हुए अनिल पाल को टिकट दिया है। वहीं, बसपा ने भी लोधी कार्ड खेलते हुए भाजपा छोड़ कर पार्टी में आए अजय वर्मा को प्रत्याशी बनाया है। कांग्रेस प्रत्याशी नीलम शाक्य का नामांकन रद्द होने से कांग्रेस पहले ही चुनावी मैदान से बाहर हो गई है। 

भाजपा प्रत्याशी विधायक कैलाश राजपूत पेशे से अधिवक्ता हैं। जनता दल से छिबरामऊ विधानसभा सीट से लड़कर उन्होंने राजनीति की शुरुआत की। 1996 में उमर्दा सीट से भाजपा से चुनाव लड़े और विधायक बने। इसके बाद पाला बदल कर 2007 में बसपा से उमर्दा से विधायक बने। फिर पार्टी बदली और 2017 में तिर्वा सीट से भाजपा के विधायक बने। वहीं, बसपा प्रत्याशी अजय वर्मा उमर्दा के ब्लॉक प्रमुख हैं। और भाजपा के कार्यकर्ता से लेकर पार्टी के पदाधिकारी भी रहे। भाजपा से 2007 में चुनाव लड़ चुके हैं। पार्टी से टिकट नहीं मिलने से नाराज होकर बसपा का दामन थाम लिया और बसपा से चुनाव मैदान में हैं। सपा प्रत्याशी अनिल पाल को पिता से विरासत के रूप मे राजनीति मिली है। उनके पिता कई बार उमर्दा विधान सभा से चुनाव लड़ चुके हैं। 2002 और 2012 में विधायक भी रहे। सपा सरकार में शिक्षा राज्य मंत्री के पद पर भी रहे। अस्वस्थ होने के कारण चुनाव लड़ने से इनकार करने पर सपा ने अनिल को मैदान में उतारा।

समीकरण सबका लेंगे इम्तिहान : अगर चुनावी मिजाज की बात करें तो यहां हमेशा से जातीय समीकरणों का पलड़ा भारी रहा है। यहां लोधी के बाद यादव, पाल और मुसलमान मतदाता बहुतायत हैं। भाजपा और बसपा दोनों ने लोधी कार्ड खेला है। निश्चित तौर पर लोधी वोटों में बंटवारे की पृष्ठभूमि तैयार की गई है। लोधी, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य मतों को अगर भाजपा साध ले तो उसकी नैया पार हो सकती है। पर, यह सब कुछ उतना आसान नहीं है। क्योंकि, लोधी वोटों में बसपा के सेंध लगाने से उसकी चुनौती बढ़ जाती है। वहीं, सपा की बात करें तो यादव, पाल और मुस्लिम के समीकरण को अगर वह पूरी तरह से साध ले तो उसका पलड़ा भारी हो जाता है। फिलहाल कौन मतदाता किधर जाएगा, यह तो 10 मार्च को पता चलेगा, पर राजनीतिक दलों के जो समीकरण हैं उससे भाजपा-सपा के बीच कांटे का मुकाबला है। संवाद 

वोटों का गणित
लोधी   85 हजार
यादव   72 हजार
पाल  40 हजार
मुस्लिम   31 हजार
ब्राह्मण 30 हजार
क्षत्रिय  25 हजार
वैश्य  15 हजार

2017 का चुनाव परिणाम
कैलाश राजपूत, भाजपा 1,00,426
विजय बहादुर पाल, सपा  76,217 
विजय सिंह, बसपा   32,036 

 

महोली : रोचक मुकाबले के आसार, ब्राह्मण, पासी, कुर्मी मतदाता होंगे निर्णायक

सीतापुर : जैसे-जैसे चुनाव की बेला करीब आती जा रही है, महोली में सियासी रंग और गाढ़ा होता जा रहा है। यहां भी लड़ाई भाजपा और सपा के बीच सिमटती दिख रही है। बसपा और कांग्रेस वोटों में सेंधमारी कर नया समीकरण बनाने की पूरी कोशिशें कर रही हैं। फिलहाल ध्रुवीकरण हावी है। 

2012 में अस्तित्व में आई महोली विधानसभा सीट को हरगांव और मिश्रिख से जोड़कर बनाया गया था। पहले चुनाव में सपा प्रत्याशी अनूप गुप्ता विधायक बने थे। वहीं, 2017 के चुनाव में सपा ने फिर से अनूप गुप्ता पर दांव लगाया था, जबकि भाजपा ने शशांक त्रिवेदी को मैदान में उतारा था। भगवा लहर में महज तीन हजार वोटों के अंतर से जीतकर शशांक त्रिवेदी पहली बार विधायक बने थे। इस बार भी शशांक और अनूप मैदान में हैं। जातीय समीकरणों के हिसाब से कांग्रेस ने आशीष मिश्रा को चुनावी दंगल में उतारा है, जबकि बसपा ने डॉ. रामेंद्र प्रसाद वर्मा पर दांव लगाया है। 

बसपा-कांग्रेस के प्रत्याशी बिगाड़ेंगे खेल : सियासी पंडितों का मानना है कि अब तक मतदाताओं के जैसे मिजाज हैं, उसके हिसाब से मुकाबला भाजपा और सपा के बीच है। पर इनमें से कौन भारी पड़ेगा यह बसपा और कांग्रेस के प्रत्याशी तय करेंगे। सबसे पहले बात कांग्रेस प्रत्याशी आशीष मिश्रा की। महोली ब्राह्मण बहुल इलाका है। आशीष ब्राह्मण चेहरा हैं। ऐसे में वह कुछ वोट तो काटेंगे ही। अब बात बसपा के प्रत्याशी डॉ. रामेंद्र प्रताप वर्मा की। वह बिसवां के निवासी हैं, लेकिन कुुर्मी बिरादरी से होने की वजह से बिरादरी का कुछ वोट उन्हें भी मिलेगा।  भाजपा प्रत्याशी शशांक त्रिवेदी के सामने भितरघातियों को साधने की भी चुनौती है। कुछ ब्राह्मण मतदाता भी नाखुश बताए जा रहे हैं। संवाद 

वोटों का गणित
ब्राह्मण  50 हजार
पासी  40 हजार
जाटव  40 हजार
कुर्मी  35 हजार
क्षत्रिय  32 हजार
लोधी  18 हजार
यादव  25 हजार
निषाद  21 हजार
तेली  17 हजार
कुशवाहा  16 हजार
मुस्लिम  15 हजार

2017 का चुनाव परिणाम
शशांक त्रिवेदी, भाजपा  80,938
अनूप गुप्ता, सपा  77,221
महेश चंद्र मिश्रा, बसपा  60,917

 

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