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स्पेन के मॉडल से यूपी में दूर होगी फल-सब्जी उत्पादकों की दिक्कतें, तैयार होगी एक मेगा मंडी

Mon, 08 Jan 2018 01:47 AM IST
महेंद्र तिवारी/अमर उजाला, लखनऊ
महेंद्र तिवारी/अमर उजाला, लखनऊ Updated Mon, 08 Jan 2018 01:47 AM IST
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spanish model to help vegetable farmers in uttar pradesh.

यूपी में फल-सब्जी उत्पादक किसानों की दुर्दशा स्पेन के मरकासा (एमईआरसीएएसए) मॉडल अपनाने से दूर हो सकती है। यह सलाह एशियन डवलपमेंट बैंक (एडीबी) ने दी है। मुख्य सचिव राजीव कुमार के सामने इस बाबत प्रजेंटेशन भी हो चुका है। बैंक ने कहा है कि यूपी में जितनी कीमत का आलू बर्बाद होता है, प्रदेश उसमें एक मरकासा मॉडल की मेगा मंडी तैयार कर सकता है।

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शासन के एक अधिकारी ने बताया कि प्रजेंटेशन में प्रदेश के किसानों की मुश्किलों के साथ ही उनकी समस्या के स्थायी समाधान के लिए फ्रांस के रंगिस, चीन के सीएफएसएमसी और स्पेन के मरकासा मॉडल की चर्चा की गई। इसमें स्पेन के मॉडल को यूपी के लिहाज से उपयोगी बताते हुए माडर्न एग्रीकल्चर होलसेल मार्केट सिस्टम डवलप करने का सुझाव दिया है।
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एडीबी ने बताया कि मरकासा मॉडल की एक मेगा मंडी की स्थापना के लिए करीब 300 हेक्टेयर जमीन व 3163 करोड़ रुपये जरूरत होगी। जबकि यूपी में साल भर में इससे ज्यादा कीमत का आलू बर्बाद हो जाता है।
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क्या है स्पेन का मरकासा मॉडल
स्पेन का ‘मरकासा’ एक सरकारी स्वामित्व वाला प्रतिष्ठान है। यह देश में माडर्न एग्रीकल्चर होलसेल मार्केट इन्फ्रास्ट्रक्चर डिजाइन करने, बनाने व प्रबंधन के लिए जिम्मेदार है। एडीबी ने इस मॉडल को पूरी दुनिया के लिए मिसाल बताया है। मरकासा आम लोगों को बेहतर पब्लिक सर्विस उपलब्ध कराने के साथ बाजार में आपूर्ति और मांग में संतुलन बनाने का काम करता है।

इसमें पोस्ट हार्वेस्टिंग लॉस घटकर बेहद कम हो जाता है। यहां उत्पाद को लाने, संग्रह करने, ट्रीटमेंट, स्टोरेज से लेकर वितरण तक का मैकेनिज्म है। इसमें रियल टाइम इन्फार्मेशन, किसानों को ट्रेनिंग के जरिये उत्पाद की कीमत, आपूर्ति से जुड़ी सावधानियां बताई जाती है। दावा है कि यह सिस्टम किसानों के फसल की लागत में कमी लाने और आय बढ़ाने में बेहद कारगर साबित हुआ है।

सरकार को दी दो मेगा मंडी बनाने की सलाह

spanish model to help vegetable farmers in uttar pradesh.

एडीबी ने राज्य सरकार को पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर दो मेगा माडर्न एग्रीकल्चर होलसेल मार्केट की स्थापना का सुझाव दिया है। कहा, अगर प्रयोग सफल लगे तो सरकार और जगहों पर भी स्थापित करे। सरकार को यह काम पीपीपी मोड में आगे बढ़ाने की सलाह दी है। बैंक ने कहा है कि प्राइवेट सेक्टर इस सिस्टम में वित्तीय मदद देने के साथ ही मंडी प्रबंधन की जिम्मेदारी भी ले सकते हैं। बैंक ने इस प्रोजेक्ट पर आगे बढ़ने के लिए सरकार को विशेषज्ञों की एक टीम को स्पेन भेजने की सलाह दी है।

किसान को तीन रुपये नहीं मिलते, बाजार में बिकता 22 रुपये किलो आलू
एडीबी की रिपोर्ट के मुताबिक पिछले साल जून में जब किसानों को आढ़तियों को तीन रुपये प्रति किलो से भी कम में आलू बेचना पड़ा था, उस वक्त फुटकर बाजार में आलू की कीमत 18 से 22 रुपये प्रति किलोग्राम थी। जबकि विकसित देशों में फुटकर कीमत की 50 प्रतिशत से अधिक कीमत किसानों के हिस्से में जाती है। उत्पादन बढ़ने पर आलू बर्बाद होना और घटने पर कीमत आसमान होने पर भी उसकी सही कीमत न मिलना, किसानों की दुर्दशा की वजह बना हुआ है। क्योंकि उन्हें सही मूल्य दिलाने के लिए यहां कोई तंत्र नहीं है।

3541 करोड़ का आलू, प्याज व टमाटर हर साल होता है बर्बाद
प्रदेश में कोल्ड स्टोरेज की कमी ही किसानों के नुकसान का एकमात्र कारण नहीं है। पैकेजिंग, प्री कूलिंग सुविधा और वैल्यू चेन के अभाव में भी आलू बर्बाद हो जाता है। एडीबी की रिपोर्ट के मुताबिक, प्रदेश में 17 प्रतिशत प्याज, 21 प्रतिशत आलू और 35 प्रतिशत टमाटर खेत से निकलने के बाद बर्बाद हो जाता है। इसमें मात्रा के लिहाज से सबसे ज्यादा नुकसान आलू का होता है।

प्याज जहां 10 हजार टन में 17.52 टन बर्बाद होता है, वहीं आलू 271.62 व टमाटर 20.68 टन बर्बाद हो जाता है। हर साल उत्पादन के बाद प्रदेश में करीब 3541 करोड़ रुपये का आलू, प्याज और टमाटर बर्बाद हो जाता है।

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