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Lucknow News: विवाह समारोहों में फ्यूजन के साथ लौट रही शहनाई

Wed, 22 Jan 2025 01:45 AM IST
Lucknow Bureau लखनऊ ब्यूरो
Updated Wed, 22 Jan 2025 01:45 AM IST
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Shehnai returning with fusion in wedding ceremonies
अन्य वाद्ययंत्रों के साथ शहनाई की जुगलबंदी।
लखनऊ। परंपरागत वाद्ययंत्रों में शहनाई का खास स्थान हुआ करता था। विशेषकर शादी-ब्याह जैसे अवसरों पर यह अनिवार्य थी, मगर धीरे-धीरे आधुनिक गीत-संगीत में शहनाई कहीं खो सी गई थी, लेकिन अब इस परंपरागत वाद्ययंत्र की विवाह समारोहों में फिर से वापसी हो रही है। ढोलक, तबला, गिटार, बांसुरी और पियानो के साथ शहनाई की जुगलबंदी लोग खूब पसंद कर रहे हैं।
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इन दिनों शहर के प्रमुख आयोजनों में फिर चाहे वे आयोजन लॉन में हों या होटल में, शहनाई की मौजूदगी माहौल में चार चांद लगा रही है। इवेंट प्लानर्स से भी लोग शादी समारोहों में इसकी मांग कर रहे हैं। इसे देखते हुए इवेंट प्लानर भी शहनाई के साथ कई प्रयोग कर रहे हैं। पियानो, तबला और गिटार जैसे वाद्ययंत्रों के साथ इसे समारोहों में पेश किया जा रहा है। यहां तक कि बैंड कंपनी वालों से भी लोग पैकेज में शहनाई की मांग कर रहे हैं।
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आलमबाग के एक इवेंट प्लानर ने बताया कि सामान्य तौर पर दो शहनाई वादकों का पारिश्रमिक पांच हजार से शुरू होता है। बड़ी पार्टियों के लिए इसमें ढोलक, तबला, गिटार, वायलिन, बांसुरी और पियानो जैसे वाद्ययंत्र मांग के अनुसार बढ़ाए जाते हैं। इसके साथ ही पैकेज का रेट भी बढ़ जाता है। अलीगंज के इवेंट प्लानर का कहना है कि कई विवाह समारोह में तो अब ऑर्केस्ट्रा की जगह शहनाई के साथ फ्यूजन म्यूजिक की ही डिमांड हो रही है। अच्छे वाद्य कलाकारों का पारिश्रमिक ज्यादा होता है।
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पुंगी का परिष्कृत रूप है शहनाई
शहनाई सैकड़ों साल पहले लकड़ी से बने लोक वाद्ययंत्र पुंगी का परिष्कृत रूप ही मानी जाती है। यह दक्षिण भारत के वाद्ययंत्र नादस्वरम जैसी है। सैकड़ों वर्ष पूर्व शहनाई की शुरुआत आमतौर पर उत्तर भारतीय शादियों में, मंदिरों में या अन्य खुशी के मौके पर बजाने के लिए हुई थी। शहनाई के लिए पहला युगल गीत 1706 में प्रकाशित हुआ था। इसका ऑर्केस्ट्रा में पहली बार प्रयोग विवाल्डी के जुडिथा टायम्फेंस में किया गया था। 1812 में इवान मुलर ने 13 कुंजी वाली बहु-स्वर शहनाई का आविष्कार किया था। 1948 के आसपास प्लास्टिक से बनी शहनाई का आविष्कार हुआ। अब शहनाई के एक सिरे पर दोहरा ईख होता है, दूसरे सिरे पर धातु या लकड़ी की परत होती है। इसकी लंबाई 12 से 20 इंच तक होती है। इस पर छह से आठ छेद होते हैं।

पहले शहनाई के साथ बजता था दुक्कड़
मशहूर तबला वादक शेख मोहम्मद इब्राहिम बताते हैं कि यह अच्छी बात है कि शहनाई जैसा परंपरागत वाद्ययंत्र फिर से लोकप्रिय हो रहा है। उन्होंने बताया कि वैसे तो पुराने समय में शहनाई के साथ पहले ढोलक, बांसुरी या दुक्कड़ की जुगलबंदी का ही चलन था, लेकिन बाद में तबले का भी इस्तेमाल होने लगा। दुक्कड़ नक्कारे का छोटा स्वरूप माना जाता है, जिसे हाथ से बजाते हैं। आधुनिक परिवेश में अब कलाकार गिटार, वायलिन, बांसुरी और पियानो जैसे वाद्ययंत्रों का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिससे यह अब फ्यूजन का रूप ले चुका है। शेख इब्राहिम का मानना है कि इस फ्यूजन से लोगों को अच्छा संगीत सुनने को मिल ही रहा है, शहनाई के भी दिन बहुरने लगे हैं।
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