लोकसभा चुनाव में हार के बाद सपा ने बदली रणनीति, संपर्क, संवाद व संघर्ष का अपना रही रास्ता
लोकसभा चुनाव में हार के बाद समाजवादी पार्टी अब संपर्क, संवाद व संघर्ष के रास्ते पर बढ़ेगी। नेता और संगठन पदाधिकारी जिला, ब्लॉक व गांव स्तर तक जनता को पार्टी की नीतियां समझाएंगे। पार्टी सुप्रीमो अखिलेश यादव भी लोकसभा के मौजूदा सत्र के बाद जिलों के दौरे करेंगे।
अखिलेश यादव की अगुवाई में पार्टी 2017 में कांग्रेस के साथ विधानसभा चुनाव और 2019 में बसपा के साथ लोकसभा चुनाव लड़ी, लेकिन सफलता नहीं मिली। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जहां 75 जिलों में एक से ज्यादा बार दौरा करने का रिकॉर्ड बना रहे थे, वहीं अखिलेश यादव राजधानी में ही संगठन की समीक्षा कर रहे थे।
लोकसभा चुनाव के प्रचार से पहले जिलों में उनके दौरे गिनती के ही हुए। इसी कारण दूसरी पंक्ति के नेता भी जनता से कटे रहे। चुनाव में सपा ने बसपा व रालोद से गठबंधन कर सामाजिक न्याय से महापरिवर्तन का नारा दिया, पर वह अपनी बात लोगों तक पहुंचाने में नाकाम रहे। वहीं, ज्यादातर पिछड़ी व दलित जातियों को काफी हद तक भाजपा पहले ही अपने साथ जोड़ चुकी थी।
लोकसभा चुनाव में नाकामी के बाद मिले फीडबैक को देखते हुए अखिलेश यादव अपनी रणनीति बदल रहे हैं। इसी के चलते वह गाजीपुर में जिला पंचायत सदस्य विजय यादव उर्फ पप्पू की हत्या और बाराबंकी में जहरीली शराब से दम तोड़ने वालों के परिवारीजनों से मिलने गए। बार काउंसिल की चेयरमैन दरवेश यादव की हत्या के बाद उनके गांव में दुख बांटने गए। पहली बार कानून-व्यवस्था की बदहाली पर राज्यपाल को ज्ञापन देने पहुंचे। पार्टी के तमाम नेताओं को शिकायत थी कि उनकी पार्टी सुप्रीमो से मुलाकात नहीं हो पाती है। अब इस कमी को दूर करने के लिए रणनीति बनाई गई है।
उपचुनावों के लिए जल्द तय होंगे उम्मीदवार
संभावना है कि सपा का राष्ट्रीय लोकदल से गठबंधन बना रहेगा। विधानसभा उपचुनाव में रालोद के लिए हाथरस की इगलास सीट छोड़ी जा सकती है। शेष 11 सीटों पर सपा जल्द उम्मीदवार घोषित करेगी।
सभी नेताओं व कार्यकर्ताओं को गांव-गांव जाकर संपर्क अभियान चलाने के निर्देश दिए गए हैं। उन्हें अभी से 2022 के विधानसभा चुनाव की तैयारी में जुटने के लिए कहा गया है। कानून व्यवस्था और किसानों, नौजवानों समेत सभी वर्गों की समस्याओं को मजबूती से उठाया जाएगा।
-राजेंद्र चौधरी, राष्ट्रीय सचिव, सपा