महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला सिर्फ नाम के ही नहीं बल्कि स्वभाव से भी निराला थे। पश्चिम बंगाल के मेदिनीपुर में जन्मे निरालाजी का लखनऊ से गहरा नाता रहा। वह ज्यादातर अमीनाबाद स्थित बताशे वाली गली में रहे।
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सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'
- फोटो : डेमो
उन्होंने यहां कई रचनाएं लिखीं, जिन्हें उस समय दुलारेलाल भार्गव की प्रसिद्ध प्रेस ‘गंगा ग्रंथागार’ ने छापा। ‘ऐसे थे निराला’ पुस्तक के एक प्रसंग से पता चलता है, ‘एक बार निरालाजी अपने प्रकाशक से पुस्तक की रॉयल्टी लेकर घर लौट रहे थे।
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रास्ते में एक बुढ़िया ने निराला से कहा, ‘बेटा! इस गरीब को कुछ भीख दे दो।’ निरालाजी उस औरत के पास पहुंचे और उसकी गर्दन पकड़ ली। बोले, ‘निराला को बेटा कह रही हो और मांग रही हो भीख। यदि तुम्हें पांच रुपये दे दूं तो कब तक भीख नहीं मांगोगी?’ बूढ़ी औरत ने कहा, ‘आज दिन भर।’
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निराला बोले, ‘अगर दस रुपये दे दूं तो?’ औरत बोली, ‘दो दिन।’ यदि सौ रुपये दे दूं? बूढ़ी औरत आश्चर्यचकित। उससे कुछ बोलते ही नहीं बन रहा था। निरालाजी ने जेब में हाथ डाला। रॉयल्टी के मिले कई सौ रुपये उनकी जेब में थे। उन्होंने सारे रुपये निकाले और उस औरत को देते हुए कहा, ‘यह रखो।
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खबरदार, निराला की मां होकर आज के बाद यदि भीख मांगती दिखीं तो गर्दन दबा दूंगा।’ बूढ़ी औरत निराला जैसे बेटे को आशीष पर आशीष दिए जा रही थी, लेकिन वह तो ऐसे भाव में मस्ती से चले जा रहे थे कि जैसे कुछ हुआ ही न हो।