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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Lucknow News ›   preparations of parties for UP assembly election 2017.

सियासी पारा चढ़ा, जल्द ही होगा 'यूपी महासमर' का ऐलान

Sat, 12 Mar 2016 09:24 AM IST
कुमार भवेश चंद्र/अमर उजाला, लखनऊ
कुमार भवेश चंद्र/अमर उजाला, लखनऊ Updated Sat, 12 Mar 2016 09:24 AM IST
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preparations of parties for UP assembly election 2017.
सभी पार्टियां हो रही हैं तैयार - फोटो : demo pic

प्रदेश की राजधानी लखनऊ में इन दिनों दिन के तापमान में तेजी से बदलाव आ रहा है। ठीक इसी तरह प्रदेश में सियासी गर्मी भी बढ़ने ही वाली है। आखिरी बजट पास कराने के बाद मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के सामने अब अपना काम दिखाने का आखिरी साल बचा है। उनके सामने एक बार फिर दोहरी चुनौती है। खुद को खरा साबित करना है।

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उन्हें दिखाना होगा कि उनमें और उनकी पार्टी में अपने कार्यकाल की उपलब्धियों के बूते अगले चुनाव की रेस में आखिर तक बने रहने का दमखम है। वैसे मुख्यमंत्री अखिलेश खुद को मजबूत बता रहे हैं।
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दावा भी कर रहे हैं कि वे एक बार फिर सत्ता में वापसी करेंगे, पर उनकी कामयाबी इस बात पर निर्भर होगी कि वे अपनी सरकार के काम के सकारात्मक पहलुओं को कितनी मजबूती से जनता के बीच रख पाते हैं?

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उपलब्धियों पर भारी पड़ रहे हैं चूक व विवाद

preparations of parties for UP assembly election 2017.
अखिलेश यादव - फोटो : getty images

सत्ता में रहने के कारण सरकार से हुई तमाम तरह की चूक और विवादों का साया उनकी उपलब्धियों पर भारी पड़ सकता है। वैसे भी यूपी में सत्ता का यह दंगल वन टू वन नहीं रहने वाला है। सो मुकाबला तो सभी दलों के लिए बेहद कड़ा होगा। मैदान में सियासी तप से निकले कई महारथी होंगे।

मजेदार बात ये है कि यूपी का चुनावी दंगल कुछ अलग ही स्तर पर अलग स्टाइल में लड़ा जाने वाला है। यहां न तो पड़ोसी राज्य बिहार की तर्ज पर दोतरफा फाइट है न ही यूपी में दलों के लिए यह गुंजाइश है कि वे पश्चिम बंगाल, असम के नतीजों के आधार पर अपनी रणनीति तय कर सकें।

वैसे भी पांच राज्यों के चुनावी नतीजे मई में आएंगे। तब तक तो यूपी का सियासी तापमान और चढ़ जाएगा।

2012 के बदले को मचल रही बसपा

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मायावती - फोटो : getty images

सूबे में चुनावी माहौल शुरू होने में एक साल से भी कम वक्त है। 2012 के चुनाव में भ्रष्टाचार के मुद्दे पर अलग-थलग पड़ गई बसपा अपनी हार का बदला चुकाने को मचल रही है, लेकिन यह सब कुछ इस बात पर निर्भर है कि उसकी जमीनी ताकत कितनी बची है? उसकी चुनावी तैयारियां कैसी हैं?

इस पर राजनीति के विद्वानों की राय जुदा हो सकती है, लेकिन शहर से निकलते ही किसी आम आदमी (केजरीवाल के साथी नहीं) से बात करेंगे तो मायावती की वापसी की बात करने वाले एक-दो नहीं, कई मिल जाएंगे।

मुमकिन है वे बसपा के वोटर न हों और एक पब्लिक परसेप्शन से प्रभावित होकर अपनी बात रखते हों, पर यह सच है कि बसपा सत्ता के इस मुकाबले में फिलहाल बीजेपी से आगे दिख रही है। कारण कई हैं। एक तो यही कि उसके पास अखिलेश के खिलाफ एक जुझारू चेहरा है, मायावती का।

बसपा का अपना वोट बैंक भी उसकी दूसरी बड़ी ताकत है। पार्टी के सत्ता से बाहर रहने या मायावती के दिल्ली में डेरा डाल देने के नुकसान का गणित तो उसके साथ जुड़ा है लेकिन अखिलेश सरकार की कमियों-गलतियों का लाभ उठाने की स्थिति में फिलहाल वही है।

उजड़ा घर संवारने में जुटी भाजपा

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अमित शाह - फोटो : getty images

यूपी में भाजपा तो अभी अपना उजड़ा घर बसाने में ही जुटी है। मुख्यमंत्री का चेहरा तय करने की बात तो तब होगी जब प्रदेश अध्यक्ष का नाम फाइनल हो।

मोदी-शाह की जुगलबंदी की बिहार में शिकस्त के बाद बिना चेहरे के चुनाव लड़ने की भूल भाजपा शायद ही यूपी में दोहराए। पार्टी के भीतर-बाहर उसे अभी बहुत काम करना है। चुनाव का एजेंडा भी तय करना है। विकास के नारे के पीछे की रणनीति को अंतिम रूप देना होगा।

चेहरों को आगे लाना होगा। जातीय समीकरण बिठाना होगा। इन सबके बाद ही पता चल पाएगा कि लोकसभा चुनाव में यूपी में 73 सीटों पर आसानी से कब्जा जमा लेने वाली भाजपा सूबे में आज कहां खड़ी है?

हलचल मचाने को बेताब कांग्रेस

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राहुल गांधी - फोटो : getty images

भाजपा-बसपा की गुपचुप सियासी रणनीति के बीच कांग्रेस अब खुलकर मैदान में अपनी नई ताकत के साथ युद्ध में कूदने का संकेत दे रही है। बिहार में नीतीश की वापसी के हीरो प्रशांत किशोर लगभग हाशिए पर खड़ी कांग्रेस में जान फूंकने का मंसूबा लेकर यूपी पहुंच चुके हैं।

प्रदेश की सियासी गर्मी भांपने और कांग्रेस की जमीन की थाह लेने के बाद उनका दांव सामने आने वाला है। बातें बहुत हो रही हैं, पर अगर वे प्रियंका को फ्रंट में रखकर कोई बड़ा दांव खेलने का मन बनाते हैं तो उन्हें अच्छा लाभ मिल सकता है। इसमें दो राय नहीं।

पिछले चुनाव में सपा का चुनावी घोषणापत्र फाड़कर सुर्खियां बटोरने वाले राहुल शायद इस बार नए अवतार में दिखे तो मुमकिन है वे अपना आधार थोड़ा और मजबूत कर लेंगे।

अगर कांग्रेस यूपी में नई रणनीति और नई ताकत के साथ मैदान में उतरती है तो मुमकिन यह भी है कि चौतरफा लड़ाई से यूपी का सियासी माहौल ही बदल जाए।

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