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सेहत की बात: दिमाग तक पहुंच रहा प्लास्टिक का रसायन, बच्चों की याददाश्त पर हो रहा असर; शोध में हुआ खुलासा

Mon, 20 Jul 2026 01:37 PM IST
Bhupendra Singh विनीत चतुर्वेदी, अमर उजाला, लखनऊ
विनीत चतुर्वेदी, अमर उजाला, लखनऊ Published by: Bhupendra Singh Updated Mon, 20 Jul 2026 01:37 PM IST
सार

भारतीय विषविज्ञान अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों के शोध में खुलासा हुआ है कि प्लास्टिक का रसायन  दिमाग तक पहुंच रहा है। इससे बच्चों की याददाश्त पर असर पड़ रहा है। प्लास्टिक का बिस्फेनॉल-ए रसायन, ब्रेन की ऊर्जा-प्रणाली पर वार करता है। आगे पढ़ें पूरी खबर...

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Plastic chemicals are reaching brain and affecting children memory study reveals
दिमाग तक पहुंच रहा प्लास्टिक का रसायन - फोटो : AI

विस्तार

बच्चों के टिफिन बॉक्स, पानी की प्लास्टिक बोतल और रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाला प्लास्टिक, बच्चों की सीखने और याद रखने की क्षमता को प्रभावित कर सकता है। भारतीय विषविज्ञान अनुसंधान संस्थान (आईआईटीआर) के वैज्ञानिकों के शोध में खुलासा हुआ है कि प्लास्टिक में पाया जाने वाला बिस्फेनॉल-ए (बीपीए) नामक रसायन दिमाग की कोशिकाओं तक ऊर्जा पहुंचने की प्रक्रिया बाधित करता है। इससे नई तंत्रिका कोशिकाओं का विकास धीमा पड़ जाता है और याददाश्त व सीखने की क्षमता कमजोर होने लगती है।
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जर्नल ऑफ बायोकेमिस्ट्री में प्रकाशित यह शोध करीब पांच वर्ष तक चला। शोध का नेतृत्व वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. रजनीश कुमार चतुर्वेदी ने किया। शोध टीम में फूलमाला चौहान, सौरभ तिवारी, रंजीत कुमार यादव और श्वेता सिंह शामिल रहे। शोध में निकले निष्कर्ष को यूरोपियन यूनियन की बीपीए रेगुलेटरी गाइडलाइंस में भी शामिल किया गया है।
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गर्म और खट्टे भोजन से बढ़ता है खतरा

डॉ. रजनीश ने बताया कि बीपीए प्लास्टिक की पानी की बोतलों, टिफिन बॉक्स, फूड पैकेजिंग और अन्य खाद्य कंटेनरों में व्यापक रूप से इस्तेमाल होता है। सामान्य परिस्थितियों में इसकी बहुत कम मात्रा भी प्लास्टिक से भोजन में पहुंच सकती है। यह जोखिम तब और बढ़ जाता है, जब प्लास्टिक के बर्तनों में गर्म खाना, गर्म दूध, चाय या नींबू जैसे खट्टे खाद्य पदार्थ रखे जाते हैं।

शरीर के पावर हाउस पर करता है सीधा वार

शोध में मस्तिष्क के हिप्पोकैंपस वाले हिस्से पर खास ध्यान दिया गया, जो सीखने और याददाश्त का प्रमुख केंद्र माना जाता है। वैज्ञानिकों ने पाया कि बीपीए तंत्रिका कोशिकाओं के भीतर मौजूद शरीर के पावर हाउस माइटोकॉन्ड्रिया की कार्यप्रणाली को प्रभावित करता है। एडवांस इमेजिंग तकनीक से यह भी पता चला कि बीपीए के संपर्क में आने पर मस्तिष्क में माइटोकॉन्ड्रिया की संख्या कम हो गई और तंत्रिका कोशिकाओं के बीच संपर्क कमजोर पड़ गए।
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तीन महीने में घट गई याददाश्त

शोधकर्ताओं ने कोशिकाओं और प्रयोगशाला के जानवरों पर प्रयोग किया। उन्हें बीपीए की उतनी ही मात्रा दी गई, जितनी सामान्य व्यक्ति को रोजमर्रा के भोजन के जरिये मिल सकती है। करीब तीन महीने बाद जानवरों में सीखने और याद रखने की क्षमता घटती हुई पाई गई। नई तंत्रिका कोशिकाओं का निर्माण घटा मिला। साथ ही ऊर्जा पहुंचाने वाले काइनेसिन प्रोटीन की गतिविधियां भी प्रभावित पाई गईं, जिससे कोशिकाओं के भीतर ऊर्जा का प्रवाह धीमा हो गया था।

काइनेसोर बना उम्मीद की किरण

शोध के दौरान काइनेसोर नाम के एक यौगिक के इस्तेमाल से प्लास्टिक के रसायन का नकारात्मक असर रिवर्स हुआ। इस यौगिक से कोशिकाओं में ऊर्जा का प्रवाह बेहतर हुआ और सीखने-समझने की क्षमता में सुधार आया। भविष्य में यह उपचार की दिशा में नई संभावनाएं खोल सकता है।

सुझाव: आईआईटीआर के निदेशक डॉ. भास्कर नारायण ने सुझाव दिया है कि प्लास्टिक के बर्तनों का उपयोग कम से कम करें। इनमें गर्म या खट्टे खाद्य पदार्थ रखने से बचें और जहां संभव हो, सुरक्षित विकल्प अपनाएं। चीनी मिट्टी के बर्तनों का उपयोग बढ़ाएं।
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