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यूपी का रण : विपक्ष नदारद...अब सिर्फ सत्ता पक्ष और सत्ता आकांक्षी, पूर्व मंत्री की बेबाक राय : मौजूदा दौर की राजनीति में जातिवाद-भ्रष्टाचार का बोलबाला

Wed, 01 Dec 2021 08:14 AM IST
पंकज श्रीवास्‍तव अजित बिसारिया, अमर उजाला, लखनऊ
अजित बिसारिया, अमर उजाला, लखनऊ Published by: पंकज श्रीवास्‍तव Updated Wed, 01 Dec 2021 08:14 AM IST
सार

सत्यदेव बताते हैं, सिस्टम के रग-रग में बस चुका भ्रष्टाचार लोगों के भीतर अब गुस्सा पैदा नहीं करता। पहले ऐसा नहीं था। पहले राजनीति और राजनेता शुचिता, ईमानदारी और पारदर्शिता के प्रतिबिंब माने जाते थे। आज विपक्ष तो कहीं दिखता ही नहीं। अब तो सिर्फ सत्ता पक्ष है या फिर सत्ता का आकांक्षी पक्ष।

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Opposition absent... Now only ruling party and power aspirant, outspoken opinion of former minister: casteism-corruption dominates the politics of the present era
पूर्व मंत्री सत्यदेव त्रिपाठी - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

प्रदेश में कांग्रेस की सरकार में मंत्री रहे सत्यदेव त्रिपाठी की बेबाकी किसी से छिपी नहीं है। वह कहते हैं, पिछले ढाई दशक की राजनीति में जातिवाद हावी हो चुका है। वह भी इस कदर कि जाति के नशे में लोग भ्रष्टाचार के मामलों को भी दरकिनार कर देते हैं। सिस्टम के रग-रग में बस चुका भ्रष्टाचार लोगों के भीतर अब गुस्सा पैदा नहीं करता। पहले ऐसा नहीं था। पहले राजनीति और राजनेता शुचिता, ईमानदारी और पारदर्शिता के प्रतिबिंब माने जाते थे। आज हालात यह हैं कि विपक्ष तो कहीं दिखता ही नहीं। अब तो सिर्फ सत्ता पक्ष है या फिर सत्ता का आकांक्षी पक्ष।

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सत्यदेव त्रिपाठी ने 1959 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय में बीए में दाखिला लिया था। वे बताते हैं, उस वक्त राजनेताओं की बातों को सुनकर ही लोग तय करते थे कि किसका साथ देना है। जाति-व्यवहार की बातें होती तो थीं, पर दबी जुबान से। आज की तरह खुल्लम-खुल्ला नहीं। 1962 की बात है। इलाहाबाद से चुनाव लड़ रहे पंडित जवाहर लाल नेहरू और उनके प्रतिद्वंद्वी डॉ. राममनोहर लोहिया का भाषण सुनने गए थे। तब नेहरू अधिक बड़े नेता थे, लेकिन मैं लोहिया के विचारों से इतना प्रभावित हुआ कि उस दौर की समाजवादी युवजन सभा का सदस्य बन गया। छात्र राजनीति में सक्रिय हो गया। इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्र संघ का महासचिव और बाद में लखनऊ विश्वविद्यालय छात्र संघ का अध्यक्ष चुना गया। 

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त्रिपाठी अपनी स्मृतियों को साझा करते समय उस दौर में पूरी तरह से डूब जाते हैं। कहते हैं, 1950 और 60 के दशक में इलाहाबाद दक्षिणी विधानसभा सीट से छुन्नन गुरु चुनाव लड़ा करते थे। छुन्नन गुरु को हराने के लिए पं. जवाहर लाल नेहरू के अलावा लाल बहादुर शास्त्री भी लगे, पर बात नहीं बनी। मतदाताओं ने उन्हें कई बार विधानसभा में पहुंचाया। ऐसा तब होता था, जब खर्च के नाम पर उनकी जेब में फूटी कौड़ी नहीं हुआ करती थी। प्रचार में लगे कार्यकर्ताओं को खुद लोगों के बीच जाकर अपने खाने-पीने का इंतजाम करना पड़ता था। 

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1967 में आया बड़ा मोड़
सत्यदेव बताते हैं, प्रदेश की राजनीति में 1967 में बड़ा मोड़ तब आया, जब चौधरी चरण सिंह की अगुवाई में संयुक्त विधायक दल की सरकार बनी। इस सरकार में जनसंघ के राम प्रकाश गुप्ता और कम्युनिस्ट पार्टी के झारखंडे राय भी कैबिनेट मंत्री थे। लोगों का विकल्प की राजनीति के प्रति भरोसा जगा। हालांकि, 1971 के लोकसभा चुनाव में इंदिरा गांधी ‘गरीबी हटाओ’ के नारे के साथ प्रचंड बहुमत से जीतीं। विपक्षी पार्टियों का सफाया हो गया। लेकिन, तीन-चार साल बाद ही महंगाई, बेरोजगारी, शिक्षा में बदलाव और भ्रष्टाचार मुक्त व्यवस्था जैसे मुद्दों पर विकल्प की राजनीति ने फिर पासा पलट दिया। जेपी की अगुवाई में चले आंदोलन ने 1977 में देश में जनता पार्टी की सरकार बनाई। यूपी में इंदिरा गांधी और संजय गांधी भी अपना चुनाव हार गए। यह पहला मौका था जब आम लोगों ने विकल्प की राजनीति को और गहरे से महसूस किया।

कद्दावर नेता ने बहू के गहने गिरवी रख चुनाव लड़ने के लिए दिए थे तीन हजार रुपये
सत्यदेव बताते हैं, 1977 में मुझे इटावा से कांग्रेस का विधानसभा का टिकट मिला। उस वक्त सीबी गुप्ता पार्टी के कोषाध्यक्ष हुआ करते थे। जैसा कि नियम था, उन्होंने मुझे भी चुनाव लड़ने के लिए सिंबल देखकर पांच हजार रुपये दिए। तब इटावा के कांग्रेस पार्टी के इंचार्ज होती लाल अग्रवाल थे। अग्रवाल विधानसभा में डिप्टी स्पीकर, लोकसभा सदस्य और तीन बार विधायक रह चुके थे। मैं उनके पास गया और कहा कि चुनाव लड़ने के लिए मेरे पास पर्याप्त पैसे नहीं हंै। सिर्फ पांच हजार रुपये ही हैं। उन्होंने अपनी बहू के जेवर गिरवी रखकर मुझे तीन हजार रुपये और दिए। तब मैं यह देखकर दंग रह गया था कि इतने कद्दावर आदमी के पास देने के लिए तीन हजार रुपये भी नहीं थे। जबकि हर तरफ उनका नाम था। सम्मान था।

 

अब तो विपक्ष भ्रष्टाचार-जातिवाद पर हमला ही नहीं बोलता
मुझे यह स्वीकार करने में रत्ती भर भी झिझक नहीं है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर अपने कार्यकाल में भ्रष्टाचार का एक भी आरोप नहीं लगा। इस लिहाज से उनकी छवि बेदाग है। लेकिन, जब तक बहुतायत में इस तरह के राजनेता नहीं होंगे, तब तक व्यवस्था में आमूलचूल बदलाव नहीं हो सकता। आज तो स्थिति यह है कि विपक्ष अपनी भूमिका में ही नहीं रहता। भ्रष्टाचार और जातिवाद पर वह हमला नहीं बोलता, बल्कि अपने अनुकूल जातिवाद की सीढ़ी चढ़कर ही सत्ता पाना चाहता है। क्या पक्ष और क्या विपक्ष सभी का मूल मंत्र भ्रष्टाचार और जातिवाद बन गया है। इसीलिए तो मैं कहता हूं कि आज दो ही पक्ष बचे हैं, सत्ता पक्ष और सत्ता का आकांक्षी पक्ष।

आमने-सामने
भाजपा सरकार से ऊब गई जनता

सपा सरकार ने मंडल को अंतरराष्ट्रीय स्तर का सिद्धार्थ विश्वविद्यालय दिया था। इस सरकार ने उसकी प्रगति रोक दी। सपा सरकार ने तमाम सड़कें बनवाई थीं। इस सरकार ने टूटी सड़कों तक की मरम्मत नहीं कराई। ग्रामीण सड़कें चलने लायक नहीं हैं। कहने के लिए सिद्धार्थनगर व बस्ती में मेडिकल काॅलेज दिए, लेकिन विशेषज्ञ चिकित्सकों की जबर्दस्त कमी है। किसान व्यापारी को धान बेचने को मजबूर है और खाद मिल नहीं रही है। खाद पर सब्सिडी देनी चाहिए, लेकिन नहीं दी। कानून-व्यवस्था की हालत बदतर है। शिक्षकों के हजारों पद रिक्त हैं। एक भी शिक्षक को पदोन्नति नहीं दी गई। आम जनता भाजपा सरकार से ऊबी हुई है और अखिलेश की ओर देख रही है। सपा सत्ता में आने जा रही है। - माता प्रसाद पांडेय, सपा नेता व पूर्व विधानसभा अध्यक्ष



योगी के नेतृत्व में फिर बनेगी सरकार
पीएम मोदी व सीएम योगी की डबल इंजन सरकार ने मंडल के तीन में से दो बस्ती व सिद्धार्थनगर जिले में मेडिकल काॅलेज बनाए। बस्ती से सिद्धार्थनगर और सिद्धार्थनगर से गोंडा जाने वाला मार्ग नेशनल हाईवे हुआ। नौगढ़-उसका मार्ग एनएच होगा।  संतकबीरनगर से सिद्धार्थनगर, बहराइच गोंडा नई रेलवे लाइन को मंजूरी मिली। लगभग सभी क्षेत्रों में नए राजकीय डिग्री काॅलेज, इंटर काॅलेज और पालीटेक्निक का निर्माण हुआ। सिद्धार्थनगर में पांच नई नगर पंचायतों का गठन हुआ। मुफ्त कोविड वैक्सीन और राशन के साथ किसानों को 6000 रुपये किसान सम्मान निधि, धान व गेहूं की रिकाॅर्ड खरीद व भुगतान सुनिश्चित किया है। मुख्यमंत्री योगी के नेतृत्व में भाजपा 350 सीट के साथ दोबारा सत्ता में आएगी।            -सतीशचंद्र द्विवेदी, बेसिक शिक्षा राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार)

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