माया ने मुलायम के अरमानों पर पानी फेर, दिया झटका!
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...और वही हुआ जिसकी संभावना थी। बिहार में नीतीश से गठजोड़ के बाद लालू यादव ने सपा-बसपा के एक होने की सलाह दी तो सपा मुखिया ने भी हामी भर दी, लेकिन मायावती ने बिना किसी लाग-लपेट के मुलायम के बयान को खारिज कर दिया।
मायावती ने कहा कि इस तरह का सुझाव देने वाले लालू यादव के लिए सत्ता बड़ी चीज हो सकती है लेकिन हमारे लिए सत्ता से अधिक सम्मान बड़ा है। उन्होंने साफ कहा कि स्टेट गेस्ट हाउस कांड को बसपा नहीं भूल सकती।
दरअसल, उत्तर प्रदेश में अतीत की राजनीतिक परिस्थितियों और स्टेट गेस्ट हाउस की घटना के चलते मुलायम व सपा के रिश्तों में निजी स्तर पर तल्खी है, जिसके खत्म होने की संभावना दूर-दूर तक नहीं है।
सत्ता नहीं सम्मान बड़ा
बसपा सुप्रीमो ने खुद सामने आकर कह दिया कि उत्तर प्रदेश में सपा ही नहीं, किसी भी पार्टी से वे गठबंधन नहीं करेंगी। अकेले दम पर चुनाव लड़ेंगी।
राजनीतिक समीक्षकों की मानें तो मायावती की मुलायम सिंह यादव से रिश्तों की तल्खी को अगर अलग भी रख दें तो भी राजनीतिक स्तर पर सपा की बसपा से दोस्ती हो ही नहीं सकती।
यहां उस कहावत को लागू नहीं किया जा सकता कि राजनीति संभावनाओं का खेल है। मायावती ने यह कहकर ‘बसपा कार्यकर्ता स्टेट गेस्ट हाउस कांड को न भूलें’ बसपा के उन लोगों को भी चेतावनी दे दी है कि वे अपने दिमाग में किसी सहारे से सियासी नाव के पार होने का सपना देखना बंद कर दें।
क्या जवाब देते मुलायम?
सपा के प्रदेश महासचिव रहे वरिष्ठ नेता डॉ. सीपी राय कहते हैं, ‘जहां तक मैं समझता हूं तो लालू यादव के बयान के बाद नेताजी और जवाब देते भी तो क्या...। मेरी निजी राय से किसी से समझौता करने और जोड़तोड़ करने से कोई फायदा नहीं होने वाला। उल्टे इस तरह की बातों से भाजपा को लाभ होता है।
समझौता करना ही है तो जनता से किया जाए। सरकार चलाने वाले सरकार चलाएं। संगठन में बैठे लोग जनता के साथ खड़े हों। यदि सरकार के किसी निर्णय से जनता पीड़ित हो रही है तो संगठन के लोग समाजवादी चरित्र के अनुसार आंदोलन करें।
यह ध्यान रखे बगैर कि सरकार किसकी है। लोहिया जी भी कहा करते थे कि संगठन सत्ता धकेल नहीं बल्कि सत्ता नकेल होना चाहिए। संगठन को सत्ता सहारा दे यह ठीक नहीं है। संगठन जब सत्ता पर नकेल लगाने की ताकत रखेगा तो जनता का भी साथ मिलेगा।’
सपाइयों को याद आया इतिहास
ऐसी ही बातें सपा के अन्य नेता भी कहते हैं। इनकी मानें तो लोकसभा चुनाव में मिली करारी हार से हताश होकर मायावती व बसपा से समझौता करने के बजाय अकेले दम पर भाजपा से संघर्ष करने से ज्यादा लाभ होगा।
ये याद दिलाते हैं वर्ष 1991 की, जब अयोध्या आंदोलन की लहर में सपा प्रदेश में विधानसभा की महज 27 सीटें ही जैसे-तैसे जीत पाई थी।
लोकसभा की 85 सीटों में सपा को सिर्फ चार पर जीत मिली थी, पर नतीजे आने के एक हफ्ते बाद ही मुलायम सिंह ने यहां रवींद्रालय में विधानसभा और लोकसभा की सभी सीटों के प्रत्याशियों और अन्य प्रमुख नेताओं का सम्मेलन बुलाकर जो संघर्ष शुरू किया तो 1993 में सपा को सूबे में 109 सीटें मिल गईं।
राजनीति का नहीं प्रतिष्ठा का झगड़ा
हालांकि यह तर्क देने वाले इसका बहुत ठोस जवाब नहीं दे पाते कि सपा को यह कामयाबी तब मिली थी जब वह बसपा के साथ मिलकर लड़ी थी। बसपा 164 सीटों पर लड़कर 67 पर जीती थी। सपा 256 पर लड़कर 109 पर जीती थी।
इसके बावजूद भाजपा को 177 सीटों पर जीत मिली थी। पर, दूसरे दलों के समर्थन से मुलायम के नेतृत्व में 4 दिसंबर 2003 को सूबे में सपा-बसपा गठबंधन ने सत्ता संभाल ली।
राजनीतिक समीक्षक व वरिष्ठ पत्रकार रतनमणि लाल कहते हैं कि यह बात सही है कि आज की स्थिति में भाजपा को रोकना, मुलायम व मायावती की साझा चिंता हो सकती है।
बावजूद इसके इन दोनों दलों के साथ आने की कोई संभावना नहीं है। यह झगड़ा महज विचारधारा और राजनीतिक दलों का नहीं, बल्कि प्रतिष्ठा का है।
मायावती नहीं, लालू की चिंता
रतनमणि कहते हैं, मुलायम राजनीति के माहिर खिलाड़ी हैं, लेकिन वे इस समय राजनीतिक भंवर में फंसे हैं। इसलिए संभावनाओं का कोई दरवाजा बंद नहीं करना चाहते। चूंकि यह प्रस्ताव उनके पुराने साथी लालू यादव की तरफ से आया है।
इसलिए उन्होंने इसे सिरे से खारिज करने के बजाय घुमा-फिराकर जवाब दिया। उनकी चिंता मायावती से ज्यादा लालू को नाखुश न करने की है, क्योंकि ये रिश्ते भविष्य में नई संभावनाएं दिखाते हैं। रही बात मायावती की, तो मेरी राय से वह ऐसा कभी नहीं करेंगी, क्योंकि उनकी मूल पूंजी उत्तर प्रदेश ही है।
वह सपा सरकार के कामकाज से 2017 में अपने लिए यूपी में फिर संभावना बनती देख रही हैं। ऐसे में वह मुलायम को बचाने के लिए क्यों आगे आएंगी। रही बात भाजपा को रोकने की, तो मायावती नादान नहीं हैं।
उन्हें पता है कि लोकसभा चुनाव अब 2019 में होंगे। इसलिए उसके चक्कर में पड़ने के बजाय वे उत्तर प्रदेश की जमीन मजबूत बनाना चाहेंगी। यह काम सपा के साथ नहीं, उससे लड़कर ही हो सकता है।