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Lucknow News: संदर्भ नहीं, अब मूल पुस्तकें बताएंगी मुगलों का इतिहास
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सचिन त्रिपाठी
लखनऊ। मुगलों की जानकारी के लिए उपलब्ध ज्यादातर पुस्तकें फारसी (पर्शियन) किताबों का हवाला तो देती हैं, पर मूल पुस्तकें हमारे सामने नहीं होती हैं। लखनऊ विश्वविद्यालय का पर्शियन विभाग विवि के मध्यकालीन इतिहास विभाग के साथ मिलकर अब इतिहास की मूल पुस्तकें हिंदी और अंग्रेजी भाषा में उपलब्ध कराएगा। पर्शियन विभाग अपने विद्यार्थियों को कोर्स की अवधि के दौरान पर्शियन की कम से कम एक पुस्तक का हिंदी या अंग्रेजी में अनुवाद करने के लिए कहेगा। यह उनका प्रोजेक्ट होगा। इसके आधार पर उनको नंबर मिलेंगे।
पर्शियन विभाग के अध्यक्ष डॉ. गुलाम नबी अहमद के अनुसार, भारत में मुगलों ने तीन सौ वर्ष से ज्यादा समय तक शासन किया। उनकी आपसी बोलचाल की भाषा टर्की थी, पर आधिकारिक राजभाषा फारसी ही रही। राज्य से संबंधित कामकाज, आदेश और काफी साहित्य इसी भाषा में लिखा गया। मुगलों के इतिहास की जानकारी के लिए फारसी पाठ्य सामग्री और पुस्तकें सबसे विश्वसनीय स्रोत हैं, लेकिन इनका हिंदी या अंग्रेजी अनुवाद बेहद कम उपलब्ध है। इतिहास की ज्यादातर पुस्तकें इन पुस्तकों के संदर्भ की बात तो करती हैं, पर मूल पुस्तक सामने नहीं होती है। इसे देखते हुए मध्यकालीन इतिहास विभाग से बात की गई है। विभाग जिन पुस्तकों की सूची देगा उनका अनुवाद विद्यार्थियों को हिंदी या अंग्रेजी में करना होगा। यह काम शिक्षक की देखरेख में होगा।
इतिहास की पुस्तकें ही क्यों
विभागाध्यक्ष डॉ. गुलाम नबी अहमद के अनुसार, लविवि ने देश में सबसे पहले नई शिक्षा नीति लागू की। कुलपति प्रो. आलोक कुमार राय के निर्देश पर इस समय 10 साल का विजन डॉक्यूमेंट भी तैयार किया जा रहा है। इसमें नवीन जानकारियों के साथ ही क्षेत्र को भी अहम स्थान दिया गया है। इसी को ध्यान में रखते हुए क्षेत्रीय और राष्ट्रीय इतिहास की उपलब्ध पुस्तकों के अनुवाद की योजना तैयार की गई है। गद्य और पद्य की पुस्तकों के मुकाबले इतिहास की पुस्तकों का अनुवाद अपेक्षाकृत आसान होगा। इसलिए शुरुआत इसी से की जाएगी। इसके बाद इसे विस्तार दिया जाएगा।
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लविवि में मुंशी नवल किशोर पर स्थापित होगी चेयर
लखनऊ में पुस्तक प्रकाशन के जनक मुंशी नवल किशोर को सम्मान देने के लिए लविवि के पर्शियन विभाग में उनके नाम पर एक चेयर स्थापित करने की योजना है। प्रस्ताव तैयार है। लखनऊ के मुंशी नवल किशोर प्रेस की ख्याति इतनी बढ़ गई थी कि इसे पेरिस के एलपाइन प्रेस के बाद दूसरा दर्जा दिया जाता था। इसके माध्यम से हिंदी, उर्दू, अरबी, फारसी और अंग्रेजी समेत अन्य भाषाओं की किताबें प्रकाशित की गईं। मुंशी नवल किशोर के नाम पर चेयर स्थापित होने पर उनके बारे में लोग और जानकारी पा सकेंगे।
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लखनऊ। मुगलों की जानकारी के लिए उपलब्ध ज्यादातर पुस्तकें फारसी (पर्शियन) किताबों का हवाला तो देती हैं, पर मूल पुस्तकें हमारे सामने नहीं होती हैं। लखनऊ विश्वविद्यालय का पर्शियन विभाग विवि के मध्यकालीन इतिहास विभाग के साथ मिलकर अब इतिहास की मूल पुस्तकें हिंदी और अंग्रेजी भाषा में उपलब्ध कराएगा। पर्शियन विभाग अपने विद्यार्थियों को कोर्स की अवधि के दौरान पर्शियन की कम से कम एक पुस्तक का हिंदी या अंग्रेजी में अनुवाद करने के लिए कहेगा। यह उनका प्रोजेक्ट होगा। इसके आधार पर उनको नंबर मिलेंगे।
पर्शियन विभाग के अध्यक्ष डॉ. गुलाम नबी अहमद के अनुसार, भारत में मुगलों ने तीन सौ वर्ष से ज्यादा समय तक शासन किया। उनकी आपसी बोलचाल की भाषा टर्की थी, पर आधिकारिक राजभाषा फारसी ही रही। राज्य से संबंधित कामकाज, आदेश और काफी साहित्य इसी भाषा में लिखा गया। मुगलों के इतिहास की जानकारी के लिए फारसी पाठ्य सामग्री और पुस्तकें सबसे विश्वसनीय स्रोत हैं, लेकिन इनका हिंदी या अंग्रेजी अनुवाद बेहद कम उपलब्ध है। इतिहास की ज्यादातर पुस्तकें इन पुस्तकों के संदर्भ की बात तो करती हैं, पर मूल पुस्तक सामने नहीं होती है। इसे देखते हुए मध्यकालीन इतिहास विभाग से बात की गई है। विभाग जिन पुस्तकों की सूची देगा उनका अनुवाद विद्यार्थियों को हिंदी या अंग्रेजी में करना होगा। यह काम शिक्षक की देखरेख में होगा।
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इतिहास की पुस्तकें ही क्यों
विभागाध्यक्ष डॉ. गुलाम नबी अहमद के अनुसार, लविवि ने देश में सबसे पहले नई शिक्षा नीति लागू की। कुलपति प्रो. आलोक कुमार राय के निर्देश पर इस समय 10 साल का विजन डॉक्यूमेंट भी तैयार किया जा रहा है। इसमें नवीन जानकारियों के साथ ही क्षेत्र को भी अहम स्थान दिया गया है। इसी को ध्यान में रखते हुए क्षेत्रीय और राष्ट्रीय इतिहास की उपलब्ध पुस्तकों के अनुवाद की योजना तैयार की गई है। गद्य और पद्य की पुस्तकों के मुकाबले इतिहास की पुस्तकों का अनुवाद अपेक्षाकृत आसान होगा। इसलिए शुरुआत इसी से की जाएगी। इसके बाद इसे विस्तार दिया जाएगा।
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लविवि में मुंशी नवल किशोर पर स्थापित होगी चेयर
लखनऊ में पुस्तक प्रकाशन के जनक मुंशी नवल किशोर को सम्मान देने के लिए लविवि के पर्शियन विभाग में उनके नाम पर एक चेयर स्थापित करने की योजना है। प्रस्ताव तैयार है। लखनऊ के मुंशी नवल किशोर प्रेस की ख्याति इतनी बढ़ गई थी कि इसे पेरिस के एलपाइन प्रेस के बाद दूसरा दर्जा दिया जाता था। इसके माध्यम से हिंदी, उर्दू, अरबी, फारसी और अंग्रेजी समेत अन्य भाषाओं की किताबें प्रकाशित की गईं। मुंशी नवल किशोर के नाम पर चेयर स्थापित होने पर उनके बारे में लोग और जानकारी पा सकेंगे।