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Lucknow News: हमने खाया खाना, सीनियर्स ने चुकाया बिल
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केजीएमयू छात्र मिलन समारोह में मौजूद पुरातन छात्र-छात्राएं।
लखनऊ। केजीएमयू के प्रशासनिक भवन में 1998 बैच के छात्रों के लिए बुधवार को पुरातन छात्र सम्मेलन का आयोजन किया गया। इसमें देश-विदेश के डॉक्टरों ने शिरकत की। सम्मेलन में बहुत से छात्रों ने करीब 15 से 20 साल बाद केजीएमयू की जमीं पर पांव रखे। छात्रों ने अपने पुराने हॉस्टल और कमरों को देखकर पुराने यादें ताजा कीं। बातों के दौरान डॉक्टर्स पुरानी बातें याद कर काफी भावुक हो गए। इस दौरान पूर्व छात्रों ने संस्थान के विस्तार पर भी चर्चा की।
डॉ. सुमित रुंगटा ने एक घटना की याद करते हुए बताया कि 1998 में अप्रैल का महीना था। शनिवार को हॉस्टल की मेस बंद थी। वह दोस्तों के साथ चौक के एक रेस्त्रां में भोजन करने पहुंच गए। अभी उन्होंने खाना शुरू ही किया था कि तीन सीनियर छात्र भी रेस्त्रां आ गए। जूनियर कुछ हिचक रहे थे मगर सीनियर उनके पास आए और खुद भी वहीं बैठकर भोजन किया। जब बिल चुकाने की बारी आई तो सीनियर ने कहा कि पैसे वे लोग ही देंगे। आखिर में सीनियर ने 15 छात्रों के ग्रुप का भी बिल चुकाया। सीनियर ने कहा कि आज मौका है वह और भी ऑर्डर कर सकते हैं। इस पर लोहिया संस्थान में अपनी सेवाएं दे रहे डॉ. आकाश अग्रवाल ने एक-एक प्लेट छोला भटूरा और कोल्ड ड्रिंक का ऑर्डर और दे डाला था।
रैगिंग तो हमारे समय में भी होती थी मगर उसकी कुछ मर्यादा थी
केजीएमयू गेस्ट्रोइंट्रोलॉजी विभाग के प्रमुख डॉ. सुमित रूंगटा ने बताया कि रैगिंग तो हमारे समय में भी होती थी मगर उसकी कुछ मर्यादा थी। रैगिंग के नाम पर सीनियर कभी बदसुलूकी नहीं करते थे। गीत सुनने से लेकर डांस तक की फरमाइश होती थी। जूनियर को यह करना भी पड़ता था मगर सलीके से। हॉस्टल से लेकर मेस तक कहीं भी रैगिंग हो सकती थी लेकिन दायरे में रहकर। इस मौके पर प्रति कुलपति डॉ. अपजीत कौर के साथ माइक्रोबायोलॉजी विभाग की डॉ. अमिता जैन, डॉ. अशोक चन्द्रा, डॉ. डीआर सिंह, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, डॉ. संजीव मिश्र समेत कई शिक्षक मौजूद रहे।
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एप्रेन के तीसरे बटन पर नजर रहेगी
रेस्पाइरेटरी मेडिसिन विभाग के डॉ. अजय वर्मा ने भी अपनी दास्तां सुनाई। बताया कि प्रवेश पाने के बाद पहले दिन वह हॉस्टल गए। सीनियर ने आदेश दिया कि सभी छात्र दाढ़ी-मूंछ कटवा लें। घुटनों तक एप्रेन ही पहनकर बाहर निकलें और आंखें एप्रेन के तीसरे बटन पर ही रहें। ऐसा न करने वाले को उसके परिणाम भुगतने होंगे। यह सुनकर मेरे साथी डॉ. प्रतीक सिंह काफी घबरा गए थे। बीस दिनों तक ऐसा ही चला। सीनियर्स की दहशत ऐसी थी कि अगर कोई जोर से आवाज सुनाई देती थी तो लगता था कि सीनियर डांट रहे हैं।
फिर मिलने के वादे के साथ हुई विदाई
सम्मेलन में शामिल हुए छात्र अपने दाेस्तों के साथ बैठकर पुरानी बातें करते नजर आए। उन्होंने क्लास रूम से लेकर हॉस्टल में बिताए दिनों को याद करके खूब ठहाके लगाए। पढ़ाई के दौरान होने वाली घटनाएं और किस्से भी एक-दूसरे को खूब सुनाए गए। सभी ने एक-दूसरे से वादा किया कि वह जल्द फिर मिलेंगे। दुबई से आईं डॉ. आकांक्षा गांधी, डॉ. अमित गुप्ता, अमेरिका में बसे डॉ. गौरव जैन और फ्लोरिडा से आईं डॉ. श्वेता श्रीवास्तव ने अपने पुराने दिनों की याद की तो सब भावुक हो गए।
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डॉ. सुमित रुंगटा ने एक घटना की याद करते हुए बताया कि 1998 में अप्रैल का महीना था। शनिवार को हॉस्टल की मेस बंद थी। वह दोस्तों के साथ चौक के एक रेस्त्रां में भोजन करने पहुंच गए। अभी उन्होंने खाना शुरू ही किया था कि तीन सीनियर छात्र भी रेस्त्रां आ गए। जूनियर कुछ हिचक रहे थे मगर सीनियर उनके पास आए और खुद भी वहीं बैठकर भोजन किया। जब बिल चुकाने की बारी आई तो सीनियर ने कहा कि पैसे वे लोग ही देंगे। आखिर में सीनियर ने 15 छात्रों के ग्रुप का भी बिल चुकाया। सीनियर ने कहा कि आज मौका है वह और भी ऑर्डर कर सकते हैं। इस पर लोहिया संस्थान में अपनी सेवाएं दे रहे डॉ. आकाश अग्रवाल ने एक-एक प्लेट छोला भटूरा और कोल्ड ड्रिंक का ऑर्डर और दे डाला था।
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रैगिंग तो हमारे समय में भी होती थी मगर उसकी कुछ मर्यादा थी
केजीएमयू गेस्ट्रोइंट्रोलॉजी विभाग के प्रमुख डॉ. सुमित रूंगटा ने बताया कि रैगिंग तो हमारे समय में भी होती थी मगर उसकी कुछ मर्यादा थी। रैगिंग के नाम पर सीनियर कभी बदसुलूकी नहीं करते थे। गीत सुनने से लेकर डांस तक की फरमाइश होती थी। जूनियर को यह करना भी पड़ता था मगर सलीके से। हॉस्टल से लेकर मेस तक कहीं भी रैगिंग हो सकती थी लेकिन दायरे में रहकर। इस मौके पर प्रति कुलपति डॉ. अपजीत कौर के साथ माइक्रोबायोलॉजी विभाग की डॉ. अमिता जैन, डॉ. अशोक चन्द्रा, डॉ. डीआर सिंह, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, डॉ. संजीव मिश्र समेत कई शिक्षक मौजूद रहे।
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एप्रेन के तीसरे बटन पर नजर रहेगी
रेस्पाइरेटरी मेडिसिन विभाग के डॉ. अजय वर्मा ने भी अपनी दास्तां सुनाई। बताया कि प्रवेश पाने के बाद पहले दिन वह हॉस्टल गए। सीनियर ने आदेश दिया कि सभी छात्र दाढ़ी-मूंछ कटवा लें। घुटनों तक एप्रेन ही पहनकर बाहर निकलें और आंखें एप्रेन के तीसरे बटन पर ही रहें। ऐसा न करने वाले को उसके परिणाम भुगतने होंगे। यह सुनकर मेरे साथी डॉ. प्रतीक सिंह काफी घबरा गए थे। बीस दिनों तक ऐसा ही चला। सीनियर्स की दहशत ऐसी थी कि अगर कोई जोर से आवाज सुनाई देती थी तो लगता था कि सीनियर डांट रहे हैं।
फिर मिलने के वादे के साथ हुई विदाई
सम्मेलन में शामिल हुए छात्र अपने दाेस्तों के साथ बैठकर पुरानी बातें करते नजर आए। उन्होंने क्लास रूम से लेकर हॉस्टल में बिताए दिनों को याद करके खूब ठहाके लगाए। पढ़ाई के दौरान होने वाली घटनाएं और किस्से भी एक-दूसरे को खूब सुनाए गए। सभी ने एक-दूसरे से वादा किया कि वह जल्द फिर मिलेंगे। दुबई से आईं डॉ. आकांक्षा गांधी, डॉ. अमित गुप्ता, अमेरिका में बसे डॉ. गौरव जैन और फ्लोरिडा से आईं डॉ. श्वेता श्रीवास्तव ने अपने पुराने दिनों की याद की तो सब भावुक हो गए।