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गीता के श्लोकों की अनवर जलालपुरी ने ऐसे बनाई शायरी, यहां पढ़ें

Tue, 02 Jan 2018 02:37 PM IST
यूपी डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
यूपी डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ Updated Tue, 02 Jan 2018 02:37 PM IST
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geeta shlok in urdu shayari by anwar jalalpuri
गीता एक ऐसी पाक किताब जिसे जितनी बार पढ़ा जाए, रूह को सुकून और ताजगी मिलती है। इसके फलसफे का आवाम पर गहरा असर है। दुनिया को हसीन और नेक बनाते हुए आत्मा को परमात्मा से मिलाने की बात करता है। मशहूर शायर अनवर जलालपुरी ने श्रीमद्भगवद्गीता को उर्दू शायरी का लिबास पहना दिया था।
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गीता के 701 श्लोकों को 1761 उर्दू अशआर में ढाल कर एक नए पाठक वर्ग को गीता  की गहराइयों से रूबरू होने का मौका दिया। लखनऊ की गंगा-जमुनी तहजीब को दर्शाती 'उर्दू शायरी में गीता' नाम की इस किताब, इसके मकसद और प्रयोग के बारे में अनवर जलालपुरी ने अमर उजाला से तफसील से बताया था।
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शायर अनवर जलालपुरी ने कहा था कि हजारों साल पहले शकों-शुबहात में घिरे अर्जुन यह फैसला नहीं कर पा रहे थे कि हक क्या है और बातिल क्या। तब श्रीकृष्ण ने बेहद साफ लहजे में जिंदगी के राज समझा कर उन्हें मंजिले मकसूद तक पहुंचा दिया। इंसान को इंसान बनाने की उनकी इस कामयाब कोशिश से मैं शुरुआत से ही बहुत प्रभावित था।
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35 साल पहले संजोया था सपना

geeta shlok in urdu shayari by anwar jalalpuri
बकौल अनवर 'आज के दौर में जब इंसान-इंसान के खून का प्यासा हो रहा है, समाज में संवेदनशीलता खत्म होती जा रही है तब गीता की शिक्षा बेहद प्रासंगिक है। मुझे लगता था कि अगर शायरी के तौर पर इसे आवाम के सामने पेश करूं तो एक नया पाठक वर्ग इसकी तालीम से फायदा उठा सकेगा।

जलालपुरी ने कहा था कि तकरीबन पैंतीस बरस पहले मैंने इसका ख्वाब संजोया था। 1982 में अवध यूनिवर्सिटी फैजाबाद में इस विषय पर पीएचडी का रजिस्ट्रेशन करवा लिया। व्यस्तता के चलते हालांकि इस काम को वक्त नहीं दे पा रहा था जिसका बेहद रंज था। मगर गीता की फिक्र और फलसफा मेरे दिलो दिमाग पर तारी रहे।

करीब पांच बरस पहले अपनी जिम्मेदारियों से थोड़ी फुर्सत पाकर सारा समय इस काम में लगा दिया। गीता से प्रभावित होने की वजह उन्होंने बताई कि गीता के संदेशों और उपदेशों में बेहद सादगी है। गीता ख्वाहिश और फल के बगैर अमल करते रहने की तरगीब देती है। यह किताब में ख्वाहिशात के बगैर ईश्वर की राह चलने का संदेश है।

अनवर जलालपुरी के काम की एक बानगी

geeta shlok in urdu shayari by anwar jalalpuri
य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम् ।
उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते ॥

न जायते म्रियते वा कदाचि- न्नायं भूत्वा भविता वा न भूय: ।
अजो नित्य: शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥


वह जाहिल हैं ऐसा समझते हैं जो
वह अहमक भी हैं ऐसा कहते हैं जो
न यह आत्मा कत्ल करती कभी
न यह आत्मा कत्ल होती कभी
जनम और मरन से है यह बालातर
यही इस की तरीफ है मुख्तसर
हमेशा से है और हमेशा रहे
चिराग ऐसा जिस की न लौ बुझ सके
बदन कत्ल होता है हो जाने दो
सदा के लिए इस को सो जाने दो
मगर आत्मा है अजर और अमर
यह ब्राह्मïांड सारा ही है उस का घर


वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृöाति नरोऽपराणि ।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही ॥

नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावक: ।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुत: ॥


बदन रूह की सिर्फ पोशाक है
वगरना यह तन तो फकत खाक है
लिबासे कुहन तो बदलना ही है
नया पैरहन फिर पहनना ही है
बदन त्याग कर जाने जाती कहां
नया ढूंढ लेती है कोई मकां
न हथियार करते हैं जख्मी इसे
न तो आग ही है जलाती इसे
भिगोने की ताकत न पानी में है
अजब बात इस की कहानी में है
हवा भी इसे खुश्क करती नहीं
अजल से अबद तक यह मरती नहीं

कि रूहानियत तेरा ईमान हो

geeta shlok in urdu shayari by anwar jalalpuri
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ।।  


सतो गुन सदा तेरी पहचान हो
कि रूहानियत तेरा ईमान हो
कुआं तू न बन बल्कि सैलाब बन
जिसे लोग देखें वही ख्वाब बन
तुझे वेद की कोई हाजत न हो
किसी को तुझ से कोई चाहत न हो

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥


फराएज से इंसा हो बेजार जब
हो माहौल सारा गुनाहगार जब
बुरे लोगों का बोल बाला रहे
न सच बात को कहने वाला रहे
कि जब धर्म का दम भी घुटने लगे
शराफत का सरमाया लुटने लगे
तो फिर जग में होना है जाहिर मुझे
जहां भर मेंं रहना है हाजिर मुझे
बुरे जो हैं उनका करूं खात्मा
जो अच्छे हैं उनका करूं मैं भला
धरम का जमाने में हो जाए राज
चलो नेक रास्ते पे सारा समाज
इसी वास्ते जन्म लेता हूं मैं
नया एक संदेश देता हूं मैं

वही मेरा अपना है यह जान लो

geeta shlok in urdu shayari by anwar jalalpuri
श्रद्धावाल्लभते ज्ञानं तत्पर: संयतेन्द्रिय: ।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति ॥


जो योगी है काबू में रखे हवास
कि गंभीरता ही है उसकी असास
यह अज्ञान जिसके भी हिस्से में है
वह श्रृद्धा रहित और शुबहे में है
तो फिर लोक उसका न परलोक ही
गुजर जाएगी यूं ही फिर जिंदगी
जो कर्मों का फल त्याग दे वाकई
समझ लो कि है अस्ल योगी वही


यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति ।
शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्य: स मे प्रिय: ॥

सम: शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयो: ।
शीतोष्णसुखदु:खेषु सम: सङ्गविवर्जित: ॥


खुशी से जो मगरूर होता नहीं
जो गम सहता है और रोता नहीं
नतीजों की परवाह करता नहीं
किसी चीज की चाह करता नहीं
जिसे फिक्र ए सर्दी व गर्मी नहीं
कि बदनामी व नेकनामी नहीं
जो दुश्मन को भी यार कहता रहे
जो कांटों को गुलजार कहता रहे
हमेशा जो सब्रो तहम्मुल रखे
जो दुश्मन के भी वास्ते गुल रखे
जो नफरत मोहब्बत को यकसां कहे
जो वीराने को भी गुलिस्तां कहे
उसे मोक्ष पाना है यह जान जो
वही मेरा अपना है यह जान लो।
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