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बेहद शातिर क्लर्क ने बैंक खातों से उड़ाये 17 लाख रुपये, गिरफ्तार

Sat, 16 Apr 2016 02:22 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ Updated Sat, 16 Apr 2016 02:22 AM IST
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Fraud by a clerk in Lucknow.
पकड़े गए आरोपी - फोटो : amar ujala

जरा सोचिए। आपके परिवार का कोई सदस्य हादसे का शिकार हो जाता है और उसके दो या तीन बैंक खातों में चार से सात लाख रुपये जमा हैं। इन खातों के बारे में आपको जानकारी नहीं है। परिवार के सदस्य के न रहने के चलते यह खाते निष्क्रिय पड़े रहते हैं।

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दो, चार या पांच साल तक इन्हें न तो इन्हें अपडेट किया गया न ही कोई ट्रांजेक्शन हुआ। ऐसे खातों पर बैंककर्मी नजरें गड़ाए रहते हैं और चोरी-छिपे इन खातों के रुपये उड़ा रहे हैं। यह चौंकाने वाला खुलासा शुक्रवार को हुआ जब एसटीएफ ने नूरमंजिल तिराहे से बैंक ऑफ बड़ौदा की कैसरबाग हीवेट रोड शाखा के क्लर्क गोल्डी श्रेष्ठ और उसके साथी अभिषेक सिंह को गिरफ्तार किया। गोल्डी ने तीन निष्क्रिय खातों से सत्रह लाख 39 हजार 350 रुपये उड़ाए हैं।
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एसटीएफ के एएसपी डॉ. त्रिवेणी सिंह का कहना है कि बैंक ऑफ बड़ौदा की हीवेट रोड शाखा में आलमबाग के महेश मिश्रा का ऐसा ही एक निष्क्रिय खाता था। महेश मिश्रा की अक्तूबर 2001 को मौत हो गई थी। लंबे समय से उनके खाते में कोई अपडेट नहीं हुआ था।
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गोल्डी की नजर इस खाते पर थी। उसने मई 2013 में फर्जीवाड़ा कर खाते में जमा चौदह लाख 59 हजार 850 रुपये साथी अभिषेक के यूनियन बैंक ऑफ इंडिया की डालीगंज शाखा में आरटीजीएस के जरिए ट्रांसफर कर दिए।

ब्रांच मैनेजर निर्भय नारायन पांडेय ने बीते मार्च में कैसरबाग कोतवाली में निष्क्रिय खाते से रुपये गायब होने की एफआईआर दर्ज कराई थी।

2013 में भी किया था ये कारनामा

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इसके अलावा 2013 में गोल्डी ने दो अन्य निष्क्रिय खातों से एक लाख 75 हजार रुपये और एक लाख 4500 रुपये अपने साथी शैलेष के एचडीएफसी बैंक  खाते में आरटीजीएस किए थे। शैलेष की तलाश की जा रही है।

कैसरबाग इंस्पेक्टर आईपी सिंह ने बताया कि दोनों शातिरों को जेल भेज दिया गया है। कई और लोग इस गोरखधंधे में लिप्त हैं। जांच की जा रही है। जल्द और गिरफ्तारियां होंगी।

खातों को री-एक्टीवेट करने को यह होती है प्रक्रिया
अगर किसी खाते में दो वर्ष तक कोई लेन-देन नहीं होता है तो बैंक उसे बंद कर देता है। इसे री-एक्टीवेट कराने के लिए खाताधारक को बैंक को प्रार्थनापत्र देना होता है। एएसपी डॉ. त्रिवेणी सिंह ने बताया कि बैंक का नया खाता खोलने, पुराना खाता बंद करने, रुपया ट्रांसफर करने या खाता री-एक्टीवेट करने के लिए सभी कर्मचारियों को अपनी यूजर आईडी और पासवर्ड दिया जाता है।

निष्क्रिय खाते को इसे री-एक्टीवेट करने के लिए खाताधारक बैंक को प्रार्थनापत्र देता है। उसका प्रार्थनापत्र संबंधित क्लर्क अपनी यूजर आईडी और पासवर्ड का इस्तेमाल कर सीनियर मैनेजर को भेजता है, जहां से निवेदन ब्रांच मैनेजर को भेजा जाता है। ब्रांच मैनेजर इसी प्रक्रिया से खाते को इसे री-एक्टीवेट करने की संस्तुति करता है।

खातों में जमा हैं अरबों रुपये, सत्यापन को लिखेंगे पत्र

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देश के सभी बैंकों में लाखों निष्क्रिय खाते हैं जिनके बारे में खाताधारकों के परिवारीजनों को नहीं पता। इन खातों में अरबों-खरबों रुपये जमा होने का अनुमान है। यह रकम विदेशी बैंकों में जमा कालेधन से किसी भी सूरत में कम नहीं है।

एएसपी डॉ. त्रिवेणी सिंह का कहना है कि जिस तरह बैंक ऑफ बड़ौदा के ग्राहक महेश मिश्रा और बाकी लोगों के खातों से गोल्डी ने रकम निकाली थी, अन्य बैंकों में भी यह गड़बड़झाला चल रहा होगा।

निष्क्रिय खातों को पूछने वाला कोई नहीं होता न ही शिकायत होती है। इसलिए बैंककर्मी कभी पकड़े नहीं जाते। बैंककर्मियों के लिए ऐसे खातों से रुपये गायब करना सबसे सुरक्षित और आसान तरीका है।

उन्होंने कहा कि सभी बैंक अधिकारियों को निष्क्रिय खातों का सत्यापन करने के लिए पत्र लिखा जाएगा। साथ ही उन्होंने बैंक से बीते दस साल के निष्क्रिय खातों का रिकॉर्ड मांगा है। कितने खातों को री-एक्टीवेट करने के लिए प्रार्थनापत्र दिया गया? कितने खाते बिना प्रार्थनापत्र दिए ही री-एक्टीवेट कर दिए गए? यह जानकारी जुटाई जा रही है।

ब्रांच मैनेजर की यूजर आईडी व पासवर्ड का किया इस्तेमाल

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महेश की मौत के कई साल बाद उनकी बहू को बैंक अकाउंट के बारे में जानकारी मिली। उन्होंने दौड़भाग की तो बैंक में खाता मिल गया। उस वक्त तक गोल्डी अकाउंट से रुपये निकाल चुका था। इसलिए बैंक की तरफ से अकाउंट खाली बताया गया।

इसके बाद बैंक ने अपना लॉग खंगाला तो पता चला कि गोल्डी ने अपने कंप्यूटर सिस्टम में ब्रांच मैनेजर की यूजर आईडी और पासवर्ड का इस्तेमाल किया है।

छानबीन में खुलासा हुआ कि उसने कोई अकाउंट एक्सेस करने की कोशिश की है। गहन जांच में पता चला कि ब्रांच मैनेजर और अपनी यूजर आईडी और पासवर्ड के जरिए महेश मिश्रा के खाते को री-एक्टीवेट करने की कोशिश की लेकिन, सफलता नहीं मिली। हालांकि, उसका यह प्रयास बैंक के लॉग में रिकॉर्ड हो गया।

कंप्यूटर का मास्टर था, इसलिए मालूम थे पासवर्ड
गोल्डी को कंप्यूटर की काफी जानकारी थी। उसने कंप्यूटर कोर्स भी किया था। बैंक के जोनल हेडक्वार्टर में उसे सबसे तकनीकी आदमी माना जाता था। यही वजह थी कि बैंक के अधिकारी व कर्मचारी उससे अपना काफी काम कराते थे। वह गोल्डी को अपनी यूजर आईडी और पासवर्ड भी बता देते थे। गोल्डी उनके पासवर्ड का दुरुपयोग करके निष्क्रिय अकाउंट को री-एक्टीवेट कर उसमें जमा रुपये उड़ाने का काम करता था।

...और इस तरह मिली थी गोल्डी को नौकरी

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अलीगंज के सेक्टर एल निवासी गोल्डी ने बताया कि उसके पिता बनारसी लाल बैंक ऑफ बड़ौदा की अमीनाबाद शाखा में सीनियर मैनेजर थे। 1994 में ड्यूटी के दौरान उनकी मौत हो गई। उनकी जगह गोल्डी को मृतक आश्रित कोटे में नौकरी मिली थी।

दूसरा शातिर बाराबंकी के लदाई का पुरवा निवासी अभिषेक है जो कई साल से लखनऊ के हसनगंज बाबूगंज में रह रहा था।

स्कोडा कार से चलता था गोल्डी
एएसपी डॉ. त्रिवेणी सिंह ने बताया कि  खातों से रुपये उड़ाकर गोल्डी और उसके साथी अय्याशी करते थे। गोल्डी ने ठगी की रकम से स्कोडा कार खरीदी थी। वह और उसके साथी कीमती घड़ियां, ब्रांडेड कपड़े और जूते पहनते थे तथा रोज मंहगे क्लबों में मौज-मस्ती करते थे।

गोल्डी अपनी महिला दोस्तों को अक्सर तोहफे भी दिया करता था। गिरफ्तारी के वक्त इनके पास से दो मोबाइल फोन और दो बाइक बरामद दिखाई गई हैं।

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