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Lucknow News: कॉस्मेटिक कृत्रिम अंगों से बदलेगी जिंदगी, पुनर्वास विवि में विशेष प्रशिक्षण शुरू

Tue, 07 Apr 2026 02:42 AM IST
Lucknow Bureau लखनऊ ब्यूरो
Updated Tue, 07 Apr 2026 02:42 AM IST
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Cosmetic Prosthetics to Transform Lives; Special Training Begins at Rehabilitation University
डॉ. शकुंतला मिश्रा राष्ट्रीय पुनर्वास विश्वविद्यालय
लखनऊ। कॉस्मेटिक कृत्रिम अंगों की मदद से अब दिव्यांगों और अंग खो चुके लोगों के लिए सामान्य जीवन जीना और आसान होगा। डॉ. शकुंतला मिश्रा राष्ट्रीय पुनर्वास विश्वविद्यालय में ऐसे कृत्रिम अंगों के निर्माण का विशेष प्रशिक्षण शुरू किया गया है, जो बिल्कुल प्राकृतिक अंगों जैसे प्रतीत होते हैं। इस संबंध में पांच दिवसीय कार्यशाला सोमवार से शुरू हुई।
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विवि के प्रोस्थेटिक्स एवं ऑर्थोटिक्स विभाग की ओर से कृत्रिम अंग एवं पुनर्वास केंद्र में ''कॉस्मेटिक रिस्टोरेशन प्रोस्थेसिस फॉर एंप्यूटी'' विषय पर प्रशिक्षण आयोजित किया जा रहा है। इसमें प्रतिभागियों को कॉस्मेटिक तकनीक के जरिये कृत्रिम उंगली, कान और नाक तैयार करने की जानकारी दी जा रही है। इन अंगों की विशेषता यह है कि ये देखने में लगभग वास्तविक अंगों जैसे लगते हैं।
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सात राज्यों के प्रतिभागी ले रहे हिस्सा

कार्यशाला में उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान सहित सात राज्यों से विद्यार्थी और आरसीआई लाइसेंस प्राप्त प्रोस्थेटिस्ट व ऑर्थोटिस्ट भाग ले रहे हैं। प्रशिक्षण में आधुनिक तकनीकों की सहायता से कस्टमाइज्ड कॉस्मेटिक प्रोस्थेसिस तैयार करने की बारीकियां सिखाई जा रही हैं। बता दें कि कस्टमाइज्ड कॉस्मेटिक प्रोस्थेसिस सिलिकॉन या अन्य उन्नत सामग्रियों से बने कृत्रिम अंग हैं, जो प्राकृतिक अंगों की तरह दिखने (त्वचा का रंग, नसें, नाखून) के लिए तैयार किए जाते हैं। ये मुख्य रूप से आत्मविश्वास बढ़ाने, आराम और बेहतर सौंदर्य प्रदान करने के लिए होते हैं।
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गहन निरीक्षण पर ही समझ आएगा अंतर
प्रशिक्षण की निगरानी कर रहे डॉ. रंजीत कुमार के अनुसार, इन कृत्रिम अंगों को इतनी सूक्ष्मता से तैयार किया जा रहा है कि बहुत ध्यान से देखने पर ही इनके कृत्रिम होने का पता चलता है। ये अंग उन लोगों के लिए अत्यंत उपयोगी हैं, जिन्होंने किसी दुर्घटना में अपने अंग खो दिए हैं। इनका उद्देश्य न केवल कार्यक्षमता प्रदान करना है, बल्कि अंगों की प्राकृतिक बनावट और सौंदर्य को भी पुनर्स्थापित करना है।


तकनीक से बढ़ेगा आत्मविश्वास

आधुनिक दौर में सिलिकॉन और थ्रीडी प्रिंटिंग तकनीक के जरिये ऐसे कृत्रिम अंग बनाए जा रहे हैं, जिनमें त्वचा का रंग, बनावट और नसों तक का आभास शामिल होता है। इससे उपयोगकर्ता का आत्मविश्वास बढ़ता है और वह बिना झिझक समाज में अपनी उपस्थिति दर्ज करा सकता है। विश्वविद्यालय का प्रयास है कि इस तकनीक का लाभ विद्यार्थियों के साथ-साथ बाहरी लोगों को भी मिल सके।
- आचार्य संजय सिंह, डॉ. शकुंतला मिश्रा राष्ट्रीय पुनर्वास विवि
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