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ब्रेनडेड होने के बाद अब इस तरह से जिएगी दीक्षा, देश के लिए बनी मिसाल

Sat, 13 Aug 2016 02:09 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ Updated Sat, 13 Aug 2016 02:09 PM IST
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brain dead girl deeksha saves five lives
दीक्षा बनी महादानी - फोटो : amar ujala

विश्व अंगदान दिवस की पूर्व संध्या पर ‘महादानी बिटिया दीक्षा’ उन लोगों के लिए मिसाल बन गई, जो अपनों के ब्रेनडेड हो जाने के बाद उनका अंगदान कराने से हिचकते हैं। सड़क हादसे में घायल गोरखपुर निवासी दीक्षा का इलाज ट्रॉमा सेंटर में चल रहा था, जहां शुक्रवार शाम डॉक्टरों ने उसे ब्रेनडेड घोषित कर दिया। 

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बेटी की जिंदगी की डोर टूट चुकी थी, लेकिन डॉक्टरों के समझाने पर परिवारीजनों ने तय किया कि उनकी बेटी के अंगदान से दूसरों को नया जीवन मिलेगा और एक महादानी के रूप में उनकी बिटिया अमर हो जाएगी।
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कई राउंड की काउंसलिंग के बाद परिवारीजन अंगदान को राजी हुए। रात नौ बजे दीक्षा का लिवर, किडनी और आंख निकाल लिया गया। प्रत्यारोपण कर पांच लोगों को नई जिंदगी देने के लिए लिवर दिल्ली के आईएलबीएस, किडनी एसजीपीजीआई और कॉर्निया केजीएमयू के आई बैंक भेज दिया गया।
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गोरखपुर, मायाबाजार के अनिल और रेनू श्रीवास्तव की बेटी दीक्षा (22) ने अंगदान कर पांच लोगों को नई जिंदगी दी है। बीटेक कर चुकी दीक्षा गोमतीनगर स्थित वेव मॉल के पास नौ जुलाई को पिता संग सड़क पार कर रही थी।

वाहन की चपेट में आने से गई जान

brain dead girl deeksha saves five lives
दीक्षा ने दी पांच लोगों को नई ज‌िंदगी - फोटो : amar ujala

इस दौरान तेज रफ्तार वाहन की चपेट में आकर वह गंभीर रूप से घायल हो गई। लोगों ने उन्हें लोहिया अस्पताल पहुंचाया जहां से ट्रॉमा सेंटर रेफर कर दिया गया। चार दिन इलाज चलने के बाद शुक्रवार शाम साढ़े चार बजे डॉक्टरों ने दीक्षा को ब्रेन डेड घोषित कर दिया। 

डॉक्टरों ने मां रेनू, चाचा विजय और मामा शिशिर को अंगदान के बारे में जानकारी दी। इसके बाद ऑर्गन ट्रांसप्लांट यूनिट के डॉ. अभिजीत चंद्रा, डॉ. विवेक गुप्ता और वेंटिलेटर यूनिट के डॉ. जीपी सिंह ने परिवारीजनों को बताया कि एक फैसला दीक्षा के अंगों से पांच लोगों को नई जिंदगी मिल सकती है। 

शाम छह परिवारीजन दीक्षा के अंगदान के लिए राजी हुए। देर रात तक दीक्षा के अंग प्रत्यारोपण की प्रक्रिया चलती रही। दीक्षा के मौत की खबर परिवार, रिश्तेदार और दोस्तों के बीच पहुंची तो पूरा माहौल गमगीन हो गया। दीक्षा आलमबाग में रहने वाले मामा शिशिर श्रीवास्तव के साथ आलमबाग में ही एक सॉफ्टवेयर कंपनी में काम करती थी।

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