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पर्वतीय इलाकों में चिता बन जाते हैं लकड़ी के ढांचे

Wed, 02 Mar 2016 10:11 AM IST
Updated Wed, 02 Mar 2016 10:11 AM IST
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Wooden houses dangerous
गरमी की आहट के साथ ही आग की घटनाओं का सिलसिला शुरू हो गया है, लेकिन हर बार की तरह पर्वतीय इलाकों में आग इस बार भी जानलेवा साबित होने लगी हैं।
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डोडा जिले की बागवा तहसील के गाडान इलाके में एक ही परिवार के चार सदस्यों की मौत पर्वतीय इलाके में सीजन से जुड़े कालचक्र की तसदीक करती है।

जम्मू संभाग में हर साल औसतन सत्रह सौ से अधिक आग की घटनाएं होती हैं, लेकिन पर्वतीय इलाकों में उठने वाली लपटें न सिर्फ संपत्ति को राख कर देती हैं, बल्कि जानलेवा भी साबित होती हैं।

फायर एंड इमरजेंसी विभाग के रिकार्ड के अनुसार पर्वतीय इलाकों में लकड़ी के ढांचे माली नुकसान के साथ-साथ अमूमन इंसानी जानों को भी लील लेते हैं।

पूरे जम्मू संभाग में बीते चार वर्ष का रिकार्ड खंगालें तो हर साल औसतन 1700 से अधिक आग की घटनाएं होती हैं। वर्ष 2012 में राहत और बचाव के लिए आई कुल 2107 घटनाएं दर्ज हुईं। पूरे वर्ष में 48 लोगों की जान गई और साढ़े दस करोड़ की संपत्ति राख हो गई। वर्ष 2013 में 2041 घटनाएं दर्ज हुईं।
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1700 से अधिक साल में हो रहीं औसतन आग की घटनाएं

Wooden houses dangerous

त्रासदी से जुड़ी घटनाओं में 39 लोगों की जान चली गई। साढ़े सोलह करोड़ की संपत्ति का नुकसान हुआ। वर्ष 2014 में 1787 घटनाएं दर्ज की गईं, जिसमें 123 जानें गईं। संपत्ति नुकसान का आंकड़ा साढ़े तेरह करोड़ रुपये के करीब रहा।

वर्ष 2015 में 1240 आग की घटनाओं में 36 लोग मारे गए। संपत्ति नुकसान का पैमाना साढ़े बत्तीस करोड़ रुपये आंका गया। भागीय रिकार्ड बताता है कि जानलेवा आग की घटनाओं के लिहाज से राजोरी, रामबन, डोडा और उधमपुर जिले सबसे संवेदनशील रहे हैं।

पर्वतीय इलाकों में मकान और अन्य इमारती ढांचों में लकड़ी का ज्यादा इस्तेमाल होता है, जिससे आग की लपटों को काबू करना मुश्किल हो जाता है।

फायर एंड इमरजेंसी विभाग के डायरेक्टर जनरल इंजीनियर आरएस सोढी के अनुसार पर्वतीय इलाकों में लकड़ी के ढांचे बनाए जाते हैं।

ज्वलनशील सामग्री होने की वजह से आग लगने और तेजी से फैलने का खतरा रहता है। विभाग ने अपनी सेवाओं में विस्तार और लोगों में जागरूकता बढ़ाने के लगातार प्रयास किए हैं, लेकिन त्रासदी फिर भी हो जाती है।

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