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70 साल बाद गुलामी की जंजीरों से आजाद हुए पश्चिमी पाकिस्तान के शरणार्थी, मिलेगी नागरिकता
Tue, 06 Aug 2019 05:10 PM IST
दुष्यंत शर्मा
बृजेश कुमार सिंह, जम्मू
बृजेश कुमार सिंह, जम्मू
Published by: दुष्यंत शर्मा
Updated Tue, 06 Aug 2019 05:10 PM IST
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आजादी की सुबह...
- फोटो : अमर उजाला
मिशन कश्मीर में अनुच्छेद 370 को समाप्त कर मोदी सरकार ने मास्टर स्ट्रोक के जरिये एक तीर से कई निशाने साधे। अपने ही राज्य में दोयम दर्जे की जिंदगी जी रहे वेस्ट पाकिस्तानी रिफ्यूजियों को 70 साल से अधिक समय बाद गुलामी की जंजीरों से आजाद होने का मौका मिला है। अब इन्हें राज्य की नागरिकता मिल सकेगी।
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विधानसभा तथा पंचायत व निकाय चुनाव में अपनी भागीदारी निभा सकेंगे। अब इनके बच्चों को भी राज्य सरकार की नौकरियों तथा विभिन्न सरकारी योजनाओं का लाभ मिल सकेगा।
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1947 में विस्थापन के बाद से ही लगातार रिफ्यूजियों की ओर से अपने अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ी जाती रही। पूर्ववर्ती कांग्रेस तथा अन्य दलों की सरकार में इनके लिए कोई सहूलियत नहीं मिली, लेकिन 2014 में जब मोदी की सरकार पहली बार बनी तो इनके लिए साढ़े पांच लाख रुपये मुआवजे का एलान किया गया। हालांकि, इसकी प्रक्रिया अभी चल रही है।
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अब तक किसी भी रिफ्यूजी के खाते में आर्थिक सहायता नहीं पहुंच सकी है। इनके पास राज्य का स्थायी निवास प्रमाणपत्र न होने की वजह से केंद्रीय सुरक्षा बलों तथा अर्द्धसैनिक बलों में युवाओं की नियुक्ति नहीं हो पाती थी। मोदी के पहले कार्यकाल में वेस्ट पाक रिफ्यूजियों को पहचान प्रमाणपत्र जारी किया। इसकी वजह से इन परिवार के युवाओं को अर्द्धसैनिक बलों में नियुक्ति पाने का मौका मिल सका।
वेस्ट पाकिस्तानी रिफ्यूजी एक्शन कमेटी के अध्यक्ष लब्बा राम गांधी बताते हैं कि अब तक वे केवल छले ही गए हैं। उन्हें केवल केंद्रीय योजनाओं का ही लाभ मिल पा रहा था। मोदी सरकार के इस फैसले से वे गुलामी से मुक्त हो जाएंगे।
1979 में बॉर्डर पार जाने की हुई थी कोशिश
अधिकार न मिलने से क्षुब्ध पश्चिमी पाकिस्तानी शरणार्थियों ने 1979 में बॉर्डर पार जाने की भी कोशिश की थी। वे सुचेतगढ़ तक पहुंच गए थे। इसके बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने शेख अब्दुल्ला से बात कर उन्हें अधिकार देने के लिए कहा था। शेख ने इस पर पहल करते हुए नागरिकता के लिए फार्म भी भरवाए। 2172 फार्म भरकर जमा किए गए, लेकिन अराजक तत्वों ने अफवाह फैला दी कि फार्म भरने वालों को पाकिस्तान भेज दिया जाएगा।
इसके बाद लोग फार्म भरने के लिए आगे नहीं आए। तत्कालीन डिवीजनल कमिश्नर दीनानाथ कोतवाल ने भी कई बार समझाने का प्रयास किया, लेकिन शरणार्थियों ने फार्म भरने में रुचि नहीं दिखाई। अटल सरकार ने भी इस दिशा में पहल की थी, लेकिन अधिक दिनों तक सरकार न रहने के कारण यह परवान नहीं चढ़ सका।
ज्यादातर बॉर्डर इलाकों में बसे हैं शरणार्थी
जम्मू संभाग के जम्मू, सांबा, कठुआ व उधमपुर में पश्चिमी पाकिस्तानी शरणार्थियों के परिवार रहते हैं। ज्यादातर शरणार्थियों के परिवार बॉर्डर इलाके में बसे हुए हैं। इनका कहना है कि 1947 में बॉर्डर इलाके में खाली जमीनें आवंटित की गईं तबसे वे यहीं पर टिके हुए हैं।
इसके बाद लोग फार्म भरने के लिए आगे नहीं आए। तत्कालीन डिवीजनल कमिश्नर दीनानाथ कोतवाल ने भी कई बार समझाने का प्रयास किया, लेकिन शरणार्थियों ने फार्म भरने में रुचि नहीं दिखाई। अटल सरकार ने भी इस दिशा में पहल की थी, लेकिन अधिक दिनों तक सरकार न रहने के कारण यह परवान नहीं चढ़ सका।
ज्यादातर बॉर्डर इलाकों में बसे हैं शरणार्थी
जम्मू संभाग के जम्मू, सांबा, कठुआ व उधमपुर में पश्चिमी पाकिस्तानी शरणार्थियों के परिवार रहते हैं। ज्यादातर शरणार्थियों के परिवार बॉर्डर इलाके में बसे हुए हैं। इनका कहना है कि 1947 में बॉर्डर इलाके में खाली जमीनें आवंटित की गईं तबसे वे यहीं पर टिके हुए हैं।