J&K: लाखों के खर्च के बावजूद बदहाली की स्थिति में जा रही हैं रेलवे की सुविधाएं
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जम्मू स्टेशन के नवीनीकरण का मुद्दा लोकसभा में स्थानीय सांसद की ओर से उठाया जाता है। उम्मीद है कि जल्द ही इस पर काम भी शुरू कर दिया जाएगा। रेलवे प्रशासन की ओर से पूर्व में शुरू की गई परियोजनाओं की ओर सरकार का ध्यान नहीं जाता है।
पिछले बजट सत्र में 180 करोड़ की लागत से जम्मू स्टेशन के सौंदर्यकरण की बात थी, लेकिन जमीनी धरातल पर कुछ भी उतरता नहीं दिख रहा है। इसकी बानगी जम्मू स्टेशन पर आम जनता को खुद ब खुद देखने को मिल जाएगी।
रेलवे का तीन बहुआयामी उद्देश्य टिकट वेंडिंग मशीन, वाटर वेंडिंग मशीन और बायो टायलेट की सुुविधाएं देने की बात रेलवे की ओर से रखी गई। इसमें से दो उद्देश्य लगभग पूरे भी कर दिए गए, लेकिन इनकी उचित देखभाल नहीं हो पा रही है। वहीं एक परियोजना सिर्फ सड़क से उठती धूल को फांकने पर मजबूर है।
टिकट वेंडिंग मशीन का ठीक से नहीं हो पा रहा संचालन
जहां पहले दो उद्देश्य टिकट वेंडिंग मशीन और वाटर वेंडिंग मशीन तो रेलवे प्रशासन की ओर से लगा दिए गए, लेकिन उनको सुचारु ढंग से चलाया नहीं जा रहा है। टिकट वेंडिंग मशीन लगाते वक्त इस बात को तय किया गया था कि हर वेंडिंग मशीन पर एक शख्स की तैनाती होगी, जो ग्रामीण क्षेत्रों से आए लोगों को टिकट निकालने के तरीके से अवगत कराएगा, लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ।
नाम मात्र के लोग इस वेंडिग मशीन का उपयोग कर टिकट लेते हैं। यह सुविधा उन यात्रियों के लिए थी, जिन्हें कम दूरी का सफर तय करना था। वहीं दूसरी योजना वाटर वेंडिग मशीन की है।
जिसे प्लेटफार्म पर लगा तो दिया गया, लेकिन इसमें खानापूर्ति के लिए एक कर्मचारी की तैनाती कर दी गई। इसके साथ ही प्रशासन की ओर से आटोमैटिक वेंडिग मशीन का हवाला देते हुए कहा गया कि जिसको पानी की जरूरत हो वो खुद ही निकाल लें।
प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान
ऐसे में सवाल उठता है कि यदि आदमी खुद ही सिक्का डालकर पानी निकाल सकता है तो एक भी व्यक्ति की तैनाती क्यों। ऐसे में प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान खड़ा होता है कि महज आठ घंटे की तैैनाती के बाद ही कर्मचारी नदारद हो जाता है।
विभाग की कार्यप्रणाली पर सबसे अधिक सवालिया निशान बायो टायलेट स्कीम खड़ा करती है। लाखों रुपये की लागत से दो बायो टायलेट जम्मू स्टेशन पर स्थापित किए गए, लेकिन पिछले छह महीनों से इन्हें चालू नहीं किया जा सका है।
विभागीय अधिकारी भी इस विषय में सवाल पूछने पर गोलमोल जवाब देकर आगे निकल जाते हैं। तीन प्रोजेक्ट, लेकिन फायदे के नाम पर आम जनता को कुछ भी नहीं मिल रहा है।