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Jammu News: पिता के सपने और त्याग की पिच पर बेटी ने खेली सफलता की पारी
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जम्मू-कश्मीर क्रिकेट एसोसिएशन की महिला क्रिकेट की प्रमुख चयनकर्ता हैं अनुराधा शर्मा
संवाद न्यूज एजेंसी
जम्मू। बच्चों की सफलता के पीछे अक्सर एक पिता का त्याग, संघर्ष और समर्पण छिपा होता है। ऐसी ही एक प्रेरणादायक मिसाल अनुराधा शर्मा और उनके पिता की है जिसमें एक पिता के सपने को बेटी ने अपने परिश्रम और लगन से साकार किया।
अनुराधा शर्मा आज जम्मू-कश्मीर क्रिकेट एसोसिएशन की महिला क्रिकेट की प्रमुख चयनकर्ता हैं। इस मुकाम तक पहुंचने के पीछे उनके पिता का वर्षों का संघर्ष, विश्वास और अथक परिश्रम रहा है।
अनुराधा बताती हैं कि पिता का सपना था कि उनके बच्चों में से कोई एक क्रिकेट की दुनिया में नाम बनाए। जब उन्होंने बचपन में अनुराधा के भीतर खेल के प्रति लगन देखी, तो उसी समय ठान लिया कि बेटी के सपने को हर हाल में पूरा करेंगे। उस दौर में जब लड़कियों का घर से निकलकर खेलों में भाग लेना आसान नहीं था, तब पिता ने समाज की सोच की परवाह किए बिना हर कदम पर साथ दिया।
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सुबह-शाम पार्क में अभ्यास करवाना, फिर खेल मैदान तक लेकर जाना, हर आवश्यक सुविधा उपलब्ध कराना और हर कठिनाई को अपने दम पर दूर करना, यह सब पिता के समर्पण की मिसाल रहा। अनुराधा कहती हैं कि पिता स्वयं खेल जगत से नहीं जुड़े थे लेकिन खेल के प्रति उनकी सोच और अपने बच्चों के लिए उनका सपना बहुत बड़ा था। चार बहनों और दो भाइयों वाले परिवार का पालन-पोषण और एक खिलाड़ी की जरूरतों को पूरा करना मध्यमवर्गीय परिवार के लिए चुनौतीपूर्ण रहा है। इसके बावजूद पिता के अटूट विश्वास, पूरे परिवार के सहयोग और वर्षों के संघर्ष से यह सब मुमकिन हो सका है।
अनुराधा मानती हैं कि आज वह जिस मुकाम पर हैं, उसमें पिता की सबसे बड़ी भूमिका है। उन्होंने कहा, पिता ने केवल मेरा साथ नहीं दिया, बल्कि मुझे स्वयं पर विश्वास करना सिखाया। आज वह हमारे बीच नहीं है पर यह उनके सपने की जीत है।
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संवाद न्यूज एजेंसी
जम्मू। बच्चों की सफलता के पीछे अक्सर एक पिता का त्याग, संघर्ष और समर्पण छिपा होता है। ऐसी ही एक प्रेरणादायक मिसाल अनुराधा शर्मा और उनके पिता की है जिसमें एक पिता के सपने को बेटी ने अपने परिश्रम और लगन से साकार किया।
अनुराधा शर्मा आज जम्मू-कश्मीर क्रिकेट एसोसिएशन की महिला क्रिकेट की प्रमुख चयनकर्ता हैं। इस मुकाम तक पहुंचने के पीछे उनके पिता का वर्षों का संघर्ष, विश्वास और अथक परिश्रम रहा है।
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अनुराधा बताती हैं कि पिता का सपना था कि उनके बच्चों में से कोई एक क्रिकेट की दुनिया में नाम बनाए। जब उन्होंने बचपन में अनुराधा के भीतर खेल के प्रति लगन देखी, तो उसी समय ठान लिया कि बेटी के सपने को हर हाल में पूरा करेंगे। उस दौर में जब लड़कियों का घर से निकलकर खेलों में भाग लेना आसान नहीं था, तब पिता ने समाज की सोच की परवाह किए बिना हर कदम पर साथ दिया।
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सुबह-शाम पार्क में अभ्यास करवाना, फिर खेल मैदान तक लेकर जाना, हर आवश्यक सुविधा उपलब्ध कराना और हर कठिनाई को अपने दम पर दूर करना, यह सब पिता के समर्पण की मिसाल रहा। अनुराधा कहती हैं कि पिता स्वयं खेल जगत से नहीं जुड़े थे लेकिन खेल के प्रति उनकी सोच और अपने बच्चों के लिए उनका सपना बहुत बड़ा था। चार बहनों और दो भाइयों वाले परिवार का पालन-पोषण और एक खिलाड़ी की जरूरतों को पूरा करना मध्यमवर्गीय परिवार के लिए चुनौतीपूर्ण रहा है। इसके बावजूद पिता के अटूट विश्वास, पूरे परिवार के सहयोग और वर्षों के संघर्ष से यह सब मुमकिन हो सका है।
अनुराधा मानती हैं कि आज वह जिस मुकाम पर हैं, उसमें पिता की सबसे बड़ी भूमिका है। उन्होंने कहा, पिता ने केवल मेरा साथ नहीं दिया, बल्कि मुझे स्वयं पर विश्वास करना सिखाया। आज वह हमारे बीच नहीं है पर यह उनके सपने की जीत है।