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ईश्वर रूपी लक्ष्य के लिए प्रयासरत रहे प्रत्येक व्यक्ति: सरोज भारती
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दिव्य ज्योति जागृति संस्थान में श्री हरि कथा सुनने उमड़ी भीड़
संवाद न्यूज एजेंसी
राजोरी। दिव्य ज्योति जागृति संस्थान द्वारा क्षेत्रवासियों के सौजन्य से तहसील त्रियाठ के मथ्यानी क्षेत्र में जारी पांच दिवसीय श्री हरि कथा के दूसरे दिन मंगलवार को सभा में साध्वी सरोज भारती ने प्रभु कथा का रसपान करवाया। कहा कि बुद्धिमान व्यक्ति वह है जो ईश्वर प्राप्ति के लिए प्रयासरत रहता है। और सफल व्यक्ति वह है जो ईश्वर रूपी जीवन के लक्ष्य की प्राप्ति कर लेता है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को ईश्वर रूपी लक्ष्य को प्राप्त करने हेतु प्रयासरत एवं गतिमान रहना चाहिए।
कहा कि भक्ति समस्त सुखों की खान कही गई है। रामचरितमानस में कहा गया है कि ईश्वर की भक्ति सुखों की खान है, जिसे बिना सत्संग प्राप्त नहीं किया जा सकता। सत और संग दो शब्दों के सुमेल से सत्संग शब्द बना है, जिसका अर्थ होता है ईश्वर दर्शन प्राप्त कर ईश्वर प्राप्ति हेतु अग्रसर होना। कथा के दौरान साध्वी ने संत नामदेव जी के जीवन चरित्र को प्रस्तुत किया। बताया कि संत नामदेव जी अनेक बार प्रभु विट्ठल को भोग लगाते हैं और भगवान विट्ठल ही नामदेव को संत विशोबा खेचर जी की शरण में जाकर ब्रह्म ज्ञान दीक्षा प्राप्त करने के लिए भेजते हैं। नामदेव ब्रह्म ज्ञान के मार्ग पर अग्रसर हो और संसार को भी ब्रह्म ज्ञान के मार्ग का संदेश प्रदान करता हुआ अपने जीवन को व्यतीत और सफल करता है। कथा का समापन आरती के साथ हुआ।
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संवाद न्यूज एजेंसी
राजोरी। दिव्य ज्योति जागृति संस्थान द्वारा क्षेत्रवासियों के सौजन्य से तहसील त्रियाठ के मथ्यानी क्षेत्र में जारी पांच दिवसीय श्री हरि कथा के दूसरे दिन मंगलवार को सभा में साध्वी सरोज भारती ने प्रभु कथा का रसपान करवाया। कहा कि बुद्धिमान व्यक्ति वह है जो ईश्वर प्राप्ति के लिए प्रयासरत रहता है। और सफल व्यक्ति वह है जो ईश्वर रूपी जीवन के लक्ष्य की प्राप्ति कर लेता है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को ईश्वर रूपी लक्ष्य को प्राप्त करने हेतु प्रयासरत एवं गतिमान रहना चाहिए।
कहा कि भक्ति समस्त सुखों की खान कही गई है। रामचरितमानस में कहा गया है कि ईश्वर की भक्ति सुखों की खान है, जिसे बिना सत्संग प्राप्त नहीं किया जा सकता। सत और संग दो शब्दों के सुमेल से सत्संग शब्द बना है, जिसका अर्थ होता है ईश्वर दर्शन प्राप्त कर ईश्वर प्राप्ति हेतु अग्रसर होना। कथा के दौरान साध्वी ने संत नामदेव जी के जीवन चरित्र को प्रस्तुत किया। बताया कि संत नामदेव जी अनेक बार प्रभु विट्ठल को भोग लगाते हैं और भगवान विट्ठल ही नामदेव को संत विशोबा खेचर जी की शरण में जाकर ब्रह्म ज्ञान दीक्षा प्राप्त करने के लिए भेजते हैं। नामदेव ब्रह्म ज्ञान के मार्ग पर अग्रसर हो और संसार को भी ब्रह्म ज्ञान के मार्ग का संदेश प्रदान करता हुआ अपने जीवन को व्यतीत और सफल करता है। कथा का समापन आरती के साथ हुआ।
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