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तृष्णा का कोई अंत नहीं, संतोष ही सबसे बड़ा धन : सुभाष शास्त्री
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नाई वाला चक आश्रम में श्रीमद्भागवत कथा सुनाकर बांटा ज्ञान
संवाद न्यूज एजेंसी
अखनूर। नाई वाला चक मोड़ स्थित गुरु आश्रम में श्रीमद्भागवत कथा के छठे दिन सोमवार को सुभाष शास्त्री ने श्रद्धालुओं को जीवन में संतोष, संयम और तृष्णा से मुक्ति का संदेश दिया। कथावाचक ने कहा कि अज्ञानी मनुष्य की लालसा का कोई अंत नहीं होता। मन की तृष्णा का कोई अंत नहीं है। संतोष ही जीवन का सबसे बड़ा धन है। उन्होंने कहा कि मन का स्वभाव ही ऐसा है कि वह प्राप्त वस्तु में रुचि खो देता है और अप्राप्त वस्तु की ओर आकर्षित होता है। वास्तव में अप्राप्त को पाने की निरंतर इच्छा ही लालसा है। इसका कभी अंत नहीं होता। यदि मनुष्य ईश्वर की ओर से दिए गए जीवन और परिस्थितियों में संतोष करना सीख ले तो उसके अधिकांश दुख और कष्ट स्वतः दूर हो सकते हैं। कथा के अंत में कथावाचक ने आदि शंकराचार्य के प्रसिद्ध वचन संतोषम् परमं सुखम् का उल्लेख करते हुए कहा कि वास्तविक धन वही है, जिसके मन में पूर्ण संतोष हो। उन्होंने कहा कि मनुष्य का मन जब विषय-वासनाओं में फंस जाता है तब वही बंधन का कारण बनता है। ब्रह्म में मन को लीन करने से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।
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संवाद न्यूज एजेंसी
अखनूर। नाई वाला चक मोड़ स्थित गुरु आश्रम में श्रीमद्भागवत कथा के छठे दिन सोमवार को सुभाष शास्त्री ने श्रद्धालुओं को जीवन में संतोष, संयम और तृष्णा से मुक्ति का संदेश दिया। कथावाचक ने कहा कि अज्ञानी मनुष्य की लालसा का कोई अंत नहीं होता। मन की तृष्णा का कोई अंत नहीं है। संतोष ही जीवन का सबसे बड़ा धन है। उन्होंने कहा कि मन का स्वभाव ही ऐसा है कि वह प्राप्त वस्तु में रुचि खो देता है और अप्राप्त वस्तु की ओर आकर्षित होता है। वास्तव में अप्राप्त को पाने की निरंतर इच्छा ही लालसा है। इसका कभी अंत नहीं होता। यदि मनुष्य ईश्वर की ओर से दिए गए जीवन और परिस्थितियों में संतोष करना सीख ले तो उसके अधिकांश दुख और कष्ट स्वतः दूर हो सकते हैं। कथा के अंत में कथावाचक ने आदि शंकराचार्य के प्रसिद्ध वचन संतोषम् परमं सुखम् का उल्लेख करते हुए कहा कि वास्तविक धन वही है, जिसके मन में पूर्ण संतोष हो। उन्होंने कहा कि मनुष्य का मन जब विषय-वासनाओं में फंस जाता है तब वही बंधन का कारण बनता है। ब्रह्म में मन को लीन करने से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।