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Hindi News ›   Jammu and Kashmir ›   Jammu News ›   Pulwama attack Seven years Security agencies have increased coordination following Pulwama terror attack

पुलवामा हमले के 7 साल: आतंक के बदलते चेहरे की चुनौती, बदली सुरक्षा व्यवस्था से नकेल; अब संयुक्त रणनीति पर काम

Sat, 14 Feb 2026 10:34 AM IST
शाहरुख खान अरुण कुमार, अमर उजाला, जम्मू
अरुण कुमार, अमर उजाला, जम्मू Published by: शाहरुख खान Updated Sat, 14 Feb 2026 10:34 AM IST
सार

पुलवामा हमले के सात साल हो गए हैं। बदली सुरक्षा व्यवस्था से आतंक पर नकेल कसी गई है। पुलवामा आतंकी हमले के बाद सुरक्षा एजेंसियों में समन्वय बढ़ा है। पुलवामा के बाद घाटी में आतंकवाद की रणनीति भी बदली। 

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Pulwama attack Seven years Security agencies have increased coordination following Pulwama terror attack
पुलवामा में 14 फरवरी 2019 को हुए हमले के बाद की दर्दनाक तस्वीर - फोटो : ANI

विस्तार

पुलवामा हमले के बाद सुरक्षा एजेंसियों के बीच समन्वय को बेहतर बनाने पर फोकस किया गया। पांच अगस्त 2019 को अनुच्छेद 370 और 35-ए हटने के बाद प्रदेश की सुरक्षा व्यवस्था में व्यापक बदलाव हुए। पुलिस सीधे गृह मंत्रालय के अधीन आई। पहले जहां अलग-अलग रणनीतियां बनती थीं, वहीं अब संयुक्त रणनीति पर काम शुरू हुआ। 
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पुलिस, सेना और अर्धसैनिक बलों के बीच इनपुट साझा करने और ऑपरेशन की संयुक्त योजना पर जोर दिया गया। बढ़ते समन्वय का असर ही है कि पुलवामा जैसे हमले को दोहराने की 16 साजिशों को एक वर्ष के भीतर नाकाम किया जा सका। आईईडी हमलों की कई कोशिशें विफल की गईं और आतंकी नेटवर्क पर शिकंजा कसा गया।
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सेवानिवृत्त ब्रिगेडियर डॉ. विजय सागर धीमान बताते हैं कि पुलवामा हमले और अनुच्छेद 370 हटने के बाद जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली में बड़ा बदलाव आया। स्थानीय स्तर पर हस्तक्षेप कम हुआ और ओजीडब्ल्यू नेटवर्क व आतंक समर्थकों पर कार्रवाई तेज हुई। संपत्तियों की जब्ती और कुर्की जैसे कदम उठाए गए। सुरक्षा एजेंसियों के बीच तालमेल मजबूत हुआ है और पाकिस्तान की गतिविधियों पर पैनी नजर रखी जा रही है। 
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अब बड़े समूहों के बजाय दो या तीन के छोटे दलों में घुसपैठ की कोशिश
हाल के वर्षों में आतंकी अब बड़े समूहों के बजाय दो या तीन के छोटे दलों में घुसपैठ की कोशिश कर रहे हैं। ब्रिगेडियर धीमान के मुताबिक अब सबसे बड़ी चुनौती कट्टरपंथ है। सुरक्षा रणनीति के साथ वैचारिक स्तर पर भी काम करना जरूरी है ताकि आतंकवाद की जड़ों को कमजोर किया जा सके।

आतंक के बदलते चेहरे की चुनौती
पुलवामा के बाद घाटी में आतंकवाद की रणनीति भी बदली। अंतरराष्ट्रीय दबाव के चलते पाकिस्तान समर्थित प्रतिबंधित संगठनों जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-ताइबा ने नए नामों से गतिविधियां शुरू कीं। जैश ने लश्कर-ए-मुस्तफा और लश्कर ने द रेजिस्टेंस फ्रंट (टीआरएफ) बनाकर वारदात को अंजाम देना शुरू किया। सुरक्षा एजेंसियों की सख्त कार्रवाई से घाटी में स्थानीय भर्ती में कमी आई। 

 

लगातार ऑपरेशनों के कारण आतंकियों को इलाका बदलने पर मजबूर होना पड़ा। वर्ष 2022 में उन्होंने पुंछ-राजोरी का रुख किया जबकि 2024 में कठुआ, सांबा, उधमपुर, डोडा और किश्तवाड़ जैसे क्षेत्रों में सक्रियता बढ़ाने की कोशिश की। हालांकि इन क्षेत्रों में भी सुरक्षा बलों की कार्रवाई जारी है और कई आतंकी मारे जा चुके हैं।

पुलवामा हमले के बाद 2019 में आतंकी हमले की कोशिशें
10 मार्च 2019 : जम्मू के खौड़ इलाके में खौड़-पलांवाला सड़क पर टिफिन में आईईडी लगाकर रखी गई।
30 मार्च 2019 : बनिहाल के पास सीआरपीएफ के काफिले से पुलवामा जैसी टक्कर मारने की कोशिश। कार में रखा विस्फोटक नहीं फटा, वाहन क्षतिग्रस्त हुआ।
31 जनवरी 2019 : नगरोटा के पास हाईवे पर शक्तिशाली आईईडी बरामद।
जून 2019 : शोपियां में सेना की 44 आरआर के काफिले पर आईईडी लगे वाहन से हमला। दो जवान बलिदान, नौ घायल।
19 नवंबर 2019 : पुंछ हाईवे पर आईईडी बरामद।
26 नवंबर : अनंतनाग में ‘बैक टू विलेज’ कार्यक्रम स्थल के पास आईईडी विस्फोट, दो लोगों की मौत।
नवंबर में ही काजीगुंड में प्रेशर कुकर में छिपाकर रखी गई दो आईईडी बरामद, सेना की पैट्रोलिंग पार्टी को निशाना बनाने की साजिश नामाक हुई।
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