पेनकिलर आपके लिए हो सकते हैं जानलेवा साबित
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
बिना डाक्टरी परामर्श के नियमित दर्द निवारक और एंटीबायोटिक दवाइयों का सेवन लोगों की सेहत बिगाड़ रहा है। इन दवाइयों को बेवजह लेने से किडनी, फेफड़ों और पेट पर प्रभाव पड़ता है।
सुपर स्पेशलिटी के डायलसिस यूनिट में पहुंच रहे 15-20 फीसदी मामले ऐसे पाए गए हैं। इनमें पीड़ित 2-3 माह से नियमित ऐसी दवाइयां ले रहे थे, जिससे उनकी शारीरिक क्षमता पर सीधा असर पड़ा।
नेफरोलाजी यूनिट के एचओडी डॉ. एसके बाली का कहना है कि ताजा एक्यूट किडनी फेलियर मामलों में पाया गया है कि पीड़ित पिछले कुछ माह से दर्द निवारक और एंटीबायोटिक दवाइयां ले रहे थे, जबकि उनकी बीमारी और शारीरिक क्षमता के हिसाब से ऐसी दवाइयों की जरूरत ही नहीं थी।
इन्हें नान स्टेरीडायल एंटी इंफामेट्री ड्रग (एनएसएआईडीएस) कहते हैं। एंटीबायोटिक दवाइयों में एमिनो ग्लाइकोसाइड ग्रुप शारीरिक क्षमता को कमजोर करने के लिए जिम्मेदार होता है।
मध्यम वर्ग के लोग हो रहे हैं शिकार
समाज का मध्यम वर्ग में सामान्य दांत, घुटने, कमर और सिरदर्द को मिटाने के लिए बिना डाक्टर की सलाह लिए नियमित दर्द निवारक दवाइयों का प्रयोग किया जा रहा है, जो उनके शरीर के अहम अंगों को खराब कर रहा है।
ऐसे लोगों में ज्यादातर 35 वर्ष से अधिक उम्र वाले लोग हैं। कई मामलों में बच्चे भी प्रभावित हो रहे हैं। डायलसिस यूनिट में हर साल किडनी के मरीजों की संख्या बढ़ रही है।
मौजूदा समय में सुपर स्पेशलिटी में आठ मशीनों पर रोजाना दो शिफ्टों में करीब 16 डायलसिस हो रहे हैं। प्रति एक डायलसिस पर 3-4 घंटे का समय लगता है। इसके अलावा पेरिटोनियल आटोमेटिक मशीनों पर अलग से डायलसिस हो रहे हैं।
बाजार में दर्द निवारक और एंटीबायोटिक दवाइयां आसानी से उपलब्ध हो रही हैं, जिससे लोग डाक्टरों तक पहुंचने के बजाय दवाइयों की दुकानों से ही बिना डाक्टरी परामर्श सीधे दवाइयां ले रहे हैं।