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Hindi News ›   Jammu and Kashmir ›   Jammu News ›   On paper, the studies are complete, but the learning in the classroom is incomplete.

शिक्षा का असली हाल: कागजों में तो पढ़ाई पूरी पर कक्षा में सीख अधूरी, गुणवत्ता पर फोकस जरूरी

Wed, 31 Dec 2025 06:11 PM IST
निकिता गुप्ता गौरव रावत अमर उजाला नेटवर्क, जम्मू
गौरव रावत अमर उजाला नेटवर्क, जम्मू Published by: निकिता गुप्ता Updated Wed, 31 Dec 2025 06:11 PM IST
सार

जम्मू-कश्मीर के स्कूलों में बच्चों का नामांकन और पढ़ाई के साल बढ़े हैं, लेकिन कक्षा 8 तक भी उनकी बुनियादी पढ़ाई और गणित की समझ कमजोर बनी हुई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि शिक्षा सुधार का अगला चरण केवल संख्या नहीं, बल्कि सीख की गुणवत्ता पर केंद्रित होना चाहिए।

 

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On paper, the studies are complete, but the learning in the classroom is incomplete.
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : AI generated

विस्तार

जम्मू-कश्मीर में बीते वर्षों के दौरान स्कूलों की संख्या, नामांकन और पढ़ाई के वर्षों में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की गई है। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि अधिक बच्चे स्कूलों तक पहुंच रहे हैं और औपचारिक रूप से पढ़ाई के साल पूरे कर रहे हैं। जब इन आंकड़ों से आगे बढ़कर यह देखा गया कि बच्चे वास्तव में क्या सीख पा रहे हैं, तो शिक्षा की तस्वीर उतनी मजबूत नहीं दिखती।

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सेंटर फॉर सोशल एंड इकोनॉमिक प्रोग्रेस की एक हालिया रिसर्च में सामने आया है कि शिक्षा की गुणवत्ता को आधार बनाते ही जम्मू-कश्मीर का शिक्षा सूचकांक कमजोर हो जाता है। रिपोर्ट के मुताबिक शिक्षा से जुड़े कागजी आंकड़े जरूर बेहतर हुए हैं, लेकिन बच्चों की बुनियादी पढ़ाई और गणित की समझ उसी अनुपात में आगे नहीं बढ़ पाई है।

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पढ़ाई के साल नहीं, सीख को बनाया गया पैमाना
यह अध्ययन वर्ष 2011-12, 2017-18 और 2021-22 के आंकड़ों पर आधारित है। इस रिसर्च की खास बात यह है कि इसमें शिक्षा का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं किया गया कि बच्चे कितने साल स्कूल गए, बल्कि यह भी देखा गया कि कक्षा 8 तक पहुंचने के बाद वे वास्तव में कितना सीख पाए। इसके लिए रिपोर्ट में शिक्षा गुणवत्ता सूचकांक का इस्तेमाल किया गया है।इसका सीधा मतलब यह है कि बच्चा स्कूल में बैठकर वास्तव में क्या सीख रहा है। इसे तय करने के लिए कक्षा 8 के बच्चों की दो बुनियादी क्षमताओं को आधार बनाया गया। पहली, क्या बच्चा शुरुआती कक्षा का साधारण पाठ सही ढंग से पढ़ सकता है। दूसरी, क्या वह भाग जैसे बुनियादी गणित के सवाल हल कर सकता है। इन मानकों के आधार पर बच्चों की वास्तविक सीख का आकलन किया गया।

सूचकांक में साफ गिरावट, सीख पीछे रह गई
रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2021-22 में जम्मू-कश्मीर का परंपरागत शिक्षा सूचकांक लगभग 0.6 रहा, लेकिन जब इसमें सीख की गुणवत्ता को जोड़ा गया तो यह घटकर करीब 0.48 पर आ गया। इसी तरह वर्ष 2017-18 में यह सूचकांक लगभग 0.55 से घटकर करीब 0.41 रह गया, जबकि वर्ष 2011-12 में यह लगभग 0.53 से घटकर करीब 0.38 पर आ गया। इन आंकड़ों से साफ संकेत मिलता है कि पढ़ाई के साल पूरे होने के बावजूद बच्चों की सीख उस रफ्तार से आगे नहीं बढ़ पाई, जैसी उम्मीद की जाती है। रिपोर्ट यह भी बताती है कि कक्षा 8 तक पहुंचने के बाद भी बड़ी संख्या में बच्चे न तो अपेक्षित स्तर पर पाठ पढ़ पा रहे हैं और न ही बुनियादी गणित में सहज हैं।

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नीति और नतीजों के बीच बढ़ता फासला
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति नीतियों और जमीन पर दिख रहे नतीजों के बीच बढ़ते फासले की ओर इशारा करती है। जम्मू विश्वविद्यालय के शिक्षा विभाग में प्रोफेसर सुशांत पांडा के अनुसार पहाड़ी और दूरदराज इलाकों में शिक्षकों की कमी, नियमित निगरानी का अभाव और बुनियादी कक्षाओं पर अपेक्षित ध्यान न मिलना इस समस्या को और गंभीर बना देता है। वहीं जम्मू विश्वविद्यालय से जुड़े शिक्षाविद राजीव शर्मा का कहना है कि शिक्षा सुधार का अगला चरण अब संख्या पर नहीं, बल्कि गुणवत्ता पर केंद्रित होना चाहिए। उनके अनुसार प्राथमिक और माध्यमिक स्तर पर बच्चों की बुनियादी पढ़ाई मजबूत किए बिना शिक्षा के बेहतर नतीजे हासिल करना मुश्किल होगा।

रिपोर्ट ने दिया साफ संदेश
रिसर्च का निष्कर्ष स्पष्ट है कि स्कूल खोलना, नामांकन बढ़ाना और पढ़ाई के साल पूरे कराना जरूरी तो है, लेकिन यही शिक्षा की सफलता की पूरी तस्वीर नहीं है। असली कसौटी यह है कि बच्चा कक्षा में बैठकर क्या सीख रहा है। जब तक बुनियादी पढ़ना और गणित मजबूत नहीं होंगे, तब तक शिक्षा के बेहतर नतीजों की उम्मीद करना मुश्किल रहेगा।

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