आतंकी होने के शक में 'बर्बाद' हुए बेकसूरों की दर्दनाक दास्तां
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नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के ताजा आंकड़ों के मुताबिक भारत की जेलों में क्षमता से काफी ज्यादा कैदियों को रखा गया है और इनमें से अधिकतर विचाराधीन कैदी ही हैं।
विचाराधीन कैदियों पर बीबीसी हिन्दी की विशेष सिरीज में कहानी कश्मीर के उन युवाओं की जिनकी जिंदगी के बेशकीमती साल जेलों में गुजर गए।
भारत प्रशासित कश्मीर में आतंकवादी होने के शक में पकड़े गए कई नौजवान बाद में बेकसूर साबित हुए, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
पढ़िए, इमरान की दिल दहला देने वाली कहानी
भारत प्रशासित कश्मीर के हंदवाड़ा इलाके के रहने वाले 34 वर्षीय इमरान किरमानी को 2006 में दिल्ली पुलिस की एक विशेष सेल ने राजधानी के मंगोलपुरी इलाके से गिरफ्तार किया था।
इमरान पर आरोप था कि वह दिल्ली में आत्मघाती हमला करने की योजना बना रहे थे। मगर पौने पांच साल बाद अदालत ने इमरान को सभी आरोपों से बरी कर दिया।
इमरान ने जयपुर से 'एयरक्राफ्ट मैकनिकल' इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की है। जब उन्हें दिल्ली में गिरफ्तार किया गया तो वो एक निजी कंपनी में नौकरी कर रहे थे।
जेल में बिताए अपने जीवन के पांच सालों को याद करते हुए वह कहते हैं, 'बरी तो अदालत ने कर दिया लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि मेरे पाँच साल, जो जेल में बीत गए उन्हें कौन वापस करेगा?'
इमरान को इस बात का भी काफी सदमा है कि जिस वक़्त वह अपना भविष्य बनाने निकले थे, उसी वक़्त उन्हें जेल में डाल दिया गया और वह भी बिना किसी कसूर के। वह कहते हैं, 'जो मेरे साथ पढ़ाई करते थे, काम करते थे वे आज बहुत तरक्की कर चुके हैं। मैं भी करता लेकिन, मेरा कीमती समय जेल में ही बर्बाद हो गया।'
इमरान अब अपने गाँव में एक स्कूल में पढ़ाते हैं। उन्हें सरकार से किसी मदद की उम्मीद नहीं है और न ही वह इसके लिए सरकार के पास जाने के लिए तैयार हैं।
क्यों फारूक अहमद के 19 साल गुजरे काल कोठरी में
हाल ही में इंजीनियर फारूक अहमद खान को भी 19 साल बाद अदालत ने सभी आरोपों से बरी कर दिया है। खान पर भी दिल्ली में विस्फोट करने की योजना बनाने का आरोप लगा था।
अनंतनाग के रहने वाले फारूका को स्पेशल टास्क फोर्स ने 23 मई 1996 को उनके घर से गिरफ्तार किया था। गिरफ्तारी के वक्त 30 साल के फारूक पब्लिक हेल्थ इंजीनियरिंग महकमे में जूनियर इंजीनियर के पद पर काम करते थे।
दिल्ली हाई कोर्ट ने चार साल बाद उन्हें लाजपत नगर विस्फोट मामले से बरी कर दिया था लेकिन उसके बाद उन्हें जयपुर और गुजरात में हुए बम धमाकों के मामले में जयपुर सेंट्रल जेल में रखा गया।
जयपुर के एडिशनल डिस्ट्रिक्ट कोर्ट ने भी उन्हें रिहा करने का आदेश दिया और उनके खिलाफ लगाए गए सभी आरोपों को खारिज कर दिया। जिंदगी के 20 साल खोने के अलावा फारूक को अपने मुक़दमे के खर्च के तौर पर एक मोटी रकम भी गंवानी पड़ी।
उनका कहना है कि दिल्ली में मुक़दमे के खर्च में 20 लाख रुपए लगे, जबकि जयपुर में 12 लाख रुपए का खर्च उठाना पड़ा। ह कहते हैं कि 2000 में जब उनके पिता का निधन हुआ तो उन्हें पैरोल पर भी नहीं छोड़ा गया।
फारूक की मां कहती हैं, 'जिस दिन फारूक के अब्बा ने बेटे की जेल की तस्वीर देखी थी तो उन्हें दिल का दौरा पड़ा और उनकी मौत हो गई। अब बेटा तो घर आ गया लेकिन उसके खोए हुए 19 साल कौन लौटाएगा।'
क्या थी मकबूल शाह की गलती
भारत प्रशासित कश्मीर के श्रीनगर के लाल बाज़ार के रहने वाले मकबूल शाह साल 2010 में 14 साल बाद जेल से रिहा हुए तो उन्हें लगा कि उन्हें एक नई जिंदगी मिल गई है।
उन्हें भी दिल्ली में विस्फोट का षड्यंत्र रचने के आरोप में 1996 में गिरफ्तार किया गया था। उस वक़्त उनकी उम्र सिर्फ 14 साल थी। मकबूल को भी अदालत ने आरोपों से बरी कर दिया।
मगर मकबूल को लगता है कि जिन लोगों ने उन्हें फर्जी मुकदमे में फंसाया था उनके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए।
वह कहते हैं, 'समाज में ज़िंदगी गुज़ारनी मुश्किल हो गई है। हर कोई समझता है कि मैं आतंकवादी हूं क्योंकि मैं 14 साल तक जेल में रहा। कोई नहीं मानता कि मैं बेगुनाह हूँ। मेरे पास अब कुछ नहीं बचा है। अब अपनी बेगुनाही का सबूत किसको दूं और कैसे दूं?'
उन्हें अफसोस इस बात का है कि जब वह जेल से बाहर आए थे तो राज्य के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्लाह ने उन्हें यकीन दिलाया था कि वह उनके लिए कुछ न कुछ करेंगे। मगर कुछ भी नहीं हुआ और उनके पुनर्वास के लिए किसी ने पहल तक नहीं की।