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Hindi News ›   Jammu and Kashmir ›   Jammu News ›   New formula for thieves to escape: Even today there is a fear of Lankapati, will thieves not come from the woo

चोर भागने का नया फार्मूला: आज भी लंकापति का है खौफ, क्या रावण पुतले की लकड़ी से नहीं आएंगे चोर

Sat, 12 Oct 2024 07:31 PM IST
निकिता गुप्ता निकिता गुप्ता, अमर उजाला नेटवर्क, जम्मू
निकिता गुप्ता, अमर उजाला नेटवर्क, जम्मू Published by: निकिता गुप्ता Updated Sat, 12 Oct 2024 07:31 PM IST
सार

जम्मू-कश्मीर में दशहरा पर रावण दहन के बाद लोगों ने जली हुई लकड़ियों को घर में रखने की अनोखी परंपरा निभाई, जिसे वे सुख-शांति और बरकत का प्रतीक मानते हैं।

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New formula for thieves to escape: Even today there is a fear of Lankapati, will thieves not come from the woo
जम्मू कश्मीर रावण दहन - फोटो : अभिषेक बड़ू

विस्तार

चुनावी माहौल के बाद, इस बार जम्मू कश्मीर में दशहरा बेहद धूमधाम से मनाया गया। घाटी में दशहरे का यह जश्न न केवल धार्मिक उत्साह का प्रतीक था, बल्कि यह संकेत देता है कि केंद्र शासित प्रदेश विकास की दृष्टि से काफी आगे बढ़ रहा है और वहां शांति का वातावरण स्थापित हो रहा है। इस अवसर पर सैकड़ों कश्मीरी पंडितों और हिंदुओं ने एक साथ मिलकर दशहरा मनाया, जो सामाजिक एकता और सांस्कृतिक विविधता का उदाहरण प्रस्तुत करता है।

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जम्मू के गवर्नमेंट बॉयज़ स्कूल में रावण के विशाल पुतले का दहन किया गया, जो दर्शकों के लिए एक शानदार दृश्य था। रावण दहन के साथ ही आतिशबाजी का आयोजन भी किया गया, जिससे वातावरण और भी खुशनुमा हो गया। भारी संख्या में लोग रावण को देखने के लिए एकत्रित हुए थे, और प्रशासन ने सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए थे। चारों ओर सुरक्षाकर्मियों की तैनाती ने लोगों को आश्वस्त किया कि वे सुरक्षित माहौल में अपने त्योहार का आनंद ले सकते हैं।
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इस साल का दशहरा एक अनोखी परंपरा के लिए भी चर्चा का विषय बना। जैसे ही रावण का पुतला जल गया, लोग बिना किसी डर के उसकी जलती लकड़ियों की ओर भागने लगे। यह एक जोखिम भरी परंपरा है, जिसमें लोग जलते हुए लकड़ी को अपने घर ले जाते हैं। स्थानीय लोगों का मानना है कि रावण की अस्थियां घर में रखने से बरकत होती है, धन की कमी नहीं होती और घर में लक्ष्मी का वास होता है। इसके अलावा, यह विश्वास भी है कि घर में कलेश नहीं होता और बुरी नजरों से सुरक्षा मिलती है।

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हालांकि, यह परंपरा कुछ लोगों के लिए विवादास्पद भी रही है। कुछ का मानना है कि यह अंधविश्वास है और इसके पीछे कोई वास्तविकता नहीं है। वे इसे पुरानी बात मानते हैं, जबकि दूसरों का कहना है कि यह परंपरा प्राचीन समय से चली आ रही है और इस पर विश्वास रखना लोगों की धार्मिक आस्था का हिस्सा है।

दशहरे के इस उत्सव में भाग लेने वाले लोगों से बात करने पर पता चला कि कई लोग इस परंपरा का पालन करते हुए अपने घरों में जलती हुई लकड़ियों को ले जाने के लिए जोखिम उठाते हैं। उनका मानना है कि यह बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है, और घर में लकड़ी रखने से बुराई समाप्त होती है, जिससे सुख और शांति बनी रहती है।

जम्मू कश्मीर में यह परंपरा विशेष रूप से प्रचलित है, लेकिन पंजाब जैसे अन्य क्षेत्रों में भी इसे अपनाया जाता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि त्योहारों का आनंद केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समाज में एकजुटता, सांस्कृतिक पहचान और प्राचीन परंपराओं के संरक्षण का भी माध्यम है।

इस बार का दशहरा न केवल एक धार्मिक उत्सव था, बल्कि यह जम्मू कश्मीर में एक नई दिशा में बढ़ते कदमों का प्रतीक भी था। यह उत्सव न केवल स्थानीय समुदाय के लिए, बल्कि पूरे क्षेत्र के लिए एक सकारात्मक संदेश लेकर आया है,शांति, एकता और विकास के पथ पर आगे बढ़ने का।

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