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लोकपाल अधिनियम के अधिकार रियासत में भी हों: जस्टिस खान
ब्यूरो, अमर उजाला/जम्मू
Updated Wed, 30 Mar 2016 09:17 PM IST
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स्टेट एकाउंटबिलटी कमीशन के चेयरपर्सन हैं जस्टिस बीए खान
- फोटो : अमर उजाला
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स्टेट एकाउंटबिलटी कमीशन (एसएसी) के चेयरपर्सन जस्टिस बीए खान ने कहा है कि लोकपाल अधिनियम के अधिकार रियासत में भी लागू किए जाएं, ताकि भ्रष्टाचार के केसों की जांच में आयोग को ज्यादा अधिकार मिल सकें।
जेएंडके हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश रहे जस्टिस खान ने कहा कि भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के लिए वर्ष 2002 में आयोग का गठन किया गया, लेकिन राज्य की सभी सरकारों ने इसके अधिकारों को काटने का प्रयास किया। हम चाहते हैं कि लोकपाल अधिनियम को देश के अन्य राज्यों की तरह यहां भी लागू किया जाना चाहिए।
एसएसी के अधिकार क्षेत्र में सरकारी विभाग, नौकरशाह, विश्वविद्यालयों जैसे संस्थान आदि थे, लेकिन सरकारों ने इसके अधिकार को सिर्फ राजनीतिक वर्ग तक सीमित कर दिया। आयोग की जिम्मेदारी भी सिर्फ सिफारिश देने तक सीमित कर दी गई। वह किसी तरह की कार्रवाई नहीं कर सकता। हालात यह है कि आयोग की सिफारिशें सचिवालय में धूल फांक रही हैं।
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खान के अनुसार उन्हें यह कहते हुए कोई शर्म नहीं है कि पिछले छह माह में उन्हें किसी के खिलाफ एक भी शिकायत नहीं मिली है। जस्टिस खान ने कहा कि सांसद और विधायक कानून बनाते हैं और उसमें संशोधन कर देते हैं। इसके लिए कानून के जानकारों की मदद नहीं ली जाती। यही कारण है कि ज्यादातर संशोधित कानून उद्देश्य को पूरा नहीं कर पाते।
विधायिका में किसी भी कानून के संशोधन का प्रस्ताव लाने के पहले कानून के जानकारों से राय ली जानी चाहिए, तभी कानून का लाभ मिल पाएगा। संसद और विधानसभा में किसी भी विधेयक को बिना वाद-विवाद या विचार के पारित कर दिया जाता है।
वर्ष 2011 में एसएसी एक्ट में संशोधन कर नौकरशाहों को इसमें से बाहर निकाल दिया गया, जबकि आयोग की जिम्मेदारी है कि वह भ्रष्टाचार, पक्षपात, रिश्वतखोरी जौसे मामलों की जांच कर सके। उन्होंने कहा कि उम्मीद है कि रियासत की नई सरकार आयोग को ज्यादा अधिकार सौंपेगी, ताकि भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाया जा सके।
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जेएंडके हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश रहे जस्टिस खान ने कहा कि भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के लिए वर्ष 2002 में आयोग का गठन किया गया, लेकिन राज्य की सभी सरकारों ने इसके अधिकारों को काटने का प्रयास किया। हम चाहते हैं कि लोकपाल अधिनियम को देश के अन्य राज्यों की तरह यहां भी लागू किया जाना चाहिए।
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एसएसी के अधिकार क्षेत्र में सरकारी विभाग, नौकरशाह, विश्वविद्यालयों जैसे संस्थान आदि थे, लेकिन सरकारों ने इसके अधिकार को सिर्फ राजनीतिक वर्ग तक सीमित कर दिया। आयोग की जिम्मेदारी भी सिर्फ सिफारिश देने तक सीमित कर दी गई। वह किसी तरह की कार्रवाई नहीं कर सकता। हालात यह है कि आयोग की सिफारिशें सचिवालय में धूल फांक रही हैं।
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खान के अनुसार उन्हें यह कहते हुए कोई शर्म नहीं है कि पिछले छह माह में उन्हें किसी के खिलाफ एक भी शिकायत नहीं मिली है। जस्टिस खान ने कहा कि सांसद और विधायक कानून बनाते हैं और उसमें संशोधन कर देते हैं। इसके लिए कानून के जानकारों की मदद नहीं ली जाती। यही कारण है कि ज्यादातर संशोधित कानून उद्देश्य को पूरा नहीं कर पाते।
विधायिका में किसी भी कानून के संशोधन का प्रस्ताव लाने के पहले कानून के जानकारों से राय ली जानी चाहिए, तभी कानून का लाभ मिल पाएगा। संसद और विधानसभा में किसी भी विधेयक को बिना वाद-विवाद या विचार के पारित कर दिया जाता है।
वर्ष 2011 में एसएसी एक्ट में संशोधन कर नौकरशाहों को इसमें से बाहर निकाल दिया गया, जबकि आयोग की जिम्मेदारी है कि वह भ्रष्टाचार, पक्षपात, रिश्वतखोरी जौसे मामलों की जांच कर सके। उन्होंने कहा कि उम्मीद है कि रियासत की नई सरकार आयोग को ज्यादा अधिकार सौंपेगी, ताकि भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाया जा सके।