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Jammu News: 14 वर्ष के बेटे को संघर्ष में भेजा, सुशीला देवी ने खुद भी मुसीबतों में काटीं रातें
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अयोध्या में प्रभु श्रीराम के लिए किए संघर्ष को याद कर रही हैं 75 वर्षीय कारसेवक सुशीला देवी अबरोल
महिला कारसेवकों के साथ स्कूल में अव्यवस्थाओं और मच्छरों के बीच काटने पड़ा था समय
अमर उजाला ब्यूरो
जम्मू। अयोध्या में रामलला के भव्य मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा को लेकर रामभक्तों में भारी उत्साह है। उनका कहना है कि सनातन समाज के करीब 500 साल के संघर्ष और कारसेवकों के बलिदान से उन्हें अयोध्या में प्रभु श्रीराम के दर्शन करने का सौभाग्य मिलेगा। लेकिन, 1990 में अयोध्या में हुई गोलीबारी और कारसेवकों पर अत्याचार को यादकर उनकी आंखें भी नम हो जाती हैं। इस संघर्ष में शामिल हुई विश्व हिंदू परिषद की प्रांत उपाध्यक्ष पंजतीर्थी निवासी 75 वर्षीय सुशीला देवी अबरोल ने कुछ ऐसे ही अनुभव साझा किए।
उन्होंने बताया कि 1990 में अयोध्या के संघर्ष में उन्होंने अपने 14 साल के एक बेटे को टोली के साथ कार सेवा के लिए भेज दिया था। तब उन्होंने उसके छोटे होने की परवाह नहीं की और बोला कि आगे बढ़कर प्रभु श्रीराम के लिए सब कुछ न्यौछावर कर देना है। तब अयोध्या जाने के लिए जम्मू में शाखा से आह्वान किया गया था। हिंसक घटनाओं के बीच बेटे को अयोध्या से थोड़ा पहले रास्ते में रोक दिया गया और अदालत लगाकर उसे अस्थायी जेल भेज दिया। तब विहिप ने संघर्ष में शामिल हुए बच्चों की झांकी निकालकर उन पर पुष्प वर्षा की थी। इसके बाद सुशीला देवी को 1992 में अयोध्या जाने का मौका मिला। उन्होंने बताया कि तब वह विहिप की मातृ शक्ति की प्रांत संयोजक थीं। उन्होंने महिला टोली का नेतृत्व किया। लेकिन तत्कालीन मुलायम सरकार ने उन्हें अयोध्या से पहले लखनऊ में रोक दिया।
सुशीला देवी कहती हैं कि उनके साथ 7 से 8 नारियां थीं। उन्हें हिरासत में लेकर एक स्कूल में रखा गया। वहां अव्यवस्था और मच्छर ही मच्छर थे। वह रात मुसीबत में गुजरी। खाने के लिए मोटे चावल और आलू की पानी जैसे सब्जी दी गई। इसके बाद भी प्रभु श्रीराम के लिए जज्बा कम नहीं हुआ। उन्होंने बताया कि उन्हें लौटने के लिए कहा गया था। लेकिन, उन्होंने डटने का फैसला लिया। इसके बाद उन्हें जबरन ट्रेनों में बैठाकर वापस जम्मू भेज दिया गया। सुशीला देवी ने बताया कि इस दौरान उन्होंने पुलिस छावनी के बीच, अयोध्या करती है आह्वान, ठाट से कर मंदिर निर्माण, शिला की जगह लगा दे प्राण, बैठा दे वहां राम भगवान..., गीत गाकर साथियों में जोश भरा था। सुशीला देवी बोलीं, आज मेरा अयोध्या में प्रभु श्रीराम के दर्शन के लिए बहुत मन कर रहा है। लेकिन घुटनों में समस्या होने के कारण मैं असमर्थ हूं। मैंने अपने बच्चों से कहा है कि वह मेरी तरफ से प्रभु के चरणों तक दान पहुंचा दें।
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उन्होंने अयोध्या में भगवान श्रीराम के मंदिर निर्माण के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का आभार जताया। कहा कि देश को ऐसे प्रधानमंत्री बार-बार मिलने चाहिए, जो कुछ करने का जज्बा रखते हैं। यह देश के लिए ऐतिहासिक है और उन सभी कारसेवकों के लिए सच्ची श्रद्धांजलि है, जिन्होंने अयोध्या संघर्ष में बलिदान दिया। वहीं, प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में विहिप, आरएसएस और दूसरे हिंदू संगठनों की ओर से अयोध्या में प्राण प्रतिष्ठा को लेकर प्रभु श्रीराम का निमंत्रण और अक्षत दिया जा रहा है। लोगों को आसपास के मंदिरों में पहुंचकर 22 जनवरी को होने वाले प्राण प्रतिष्ठा समारोह का गवाह बनने और दीप मालाएं करने को कहा जा रहा है।
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महिला कारसेवकों के साथ स्कूल में अव्यवस्थाओं और मच्छरों के बीच काटने पड़ा था समय
अमर उजाला ब्यूरो
जम्मू। अयोध्या में रामलला के भव्य मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा को लेकर रामभक्तों में भारी उत्साह है। उनका कहना है कि सनातन समाज के करीब 500 साल के संघर्ष और कारसेवकों के बलिदान से उन्हें अयोध्या में प्रभु श्रीराम के दर्शन करने का सौभाग्य मिलेगा। लेकिन, 1990 में अयोध्या में हुई गोलीबारी और कारसेवकों पर अत्याचार को यादकर उनकी आंखें भी नम हो जाती हैं। इस संघर्ष में शामिल हुई विश्व हिंदू परिषद की प्रांत उपाध्यक्ष पंजतीर्थी निवासी 75 वर्षीय सुशीला देवी अबरोल ने कुछ ऐसे ही अनुभव साझा किए।
उन्होंने बताया कि 1990 में अयोध्या के संघर्ष में उन्होंने अपने 14 साल के एक बेटे को टोली के साथ कार सेवा के लिए भेज दिया था। तब उन्होंने उसके छोटे होने की परवाह नहीं की और बोला कि आगे बढ़कर प्रभु श्रीराम के लिए सब कुछ न्यौछावर कर देना है। तब अयोध्या जाने के लिए जम्मू में शाखा से आह्वान किया गया था। हिंसक घटनाओं के बीच बेटे को अयोध्या से थोड़ा पहले रास्ते में रोक दिया गया और अदालत लगाकर उसे अस्थायी जेल भेज दिया। तब विहिप ने संघर्ष में शामिल हुए बच्चों की झांकी निकालकर उन पर पुष्प वर्षा की थी। इसके बाद सुशीला देवी को 1992 में अयोध्या जाने का मौका मिला। उन्होंने बताया कि तब वह विहिप की मातृ शक्ति की प्रांत संयोजक थीं। उन्होंने महिला टोली का नेतृत्व किया। लेकिन तत्कालीन मुलायम सरकार ने उन्हें अयोध्या से पहले लखनऊ में रोक दिया।
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सुशीला देवी कहती हैं कि उनके साथ 7 से 8 नारियां थीं। उन्हें हिरासत में लेकर एक स्कूल में रखा गया। वहां अव्यवस्था और मच्छर ही मच्छर थे। वह रात मुसीबत में गुजरी। खाने के लिए मोटे चावल और आलू की पानी जैसे सब्जी दी गई। इसके बाद भी प्रभु श्रीराम के लिए जज्बा कम नहीं हुआ। उन्होंने बताया कि उन्हें लौटने के लिए कहा गया था। लेकिन, उन्होंने डटने का फैसला लिया। इसके बाद उन्हें जबरन ट्रेनों में बैठाकर वापस जम्मू भेज दिया गया। सुशीला देवी ने बताया कि इस दौरान उन्होंने पुलिस छावनी के बीच, अयोध्या करती है आह्वान, ठाट से कर मंदिर निर्माण, शिला की जगह लगा दे प्राण, बैठा दे वहां राम भगवान..., गीत गाकर साथियों में जोश भरा था। सुशीला देवी बोलीं, आज मेरा अयोध्या में प्रभु श्रीराम के दर्शन के लिए बहुत मन कर रहा है। लेकिन घुटनों में समस्या होने के कारण मैं असमर्थ हूं। मैंने अपने बच्चों से कहा है कि वह मेरी तरफ से प्रभु के चरणों तक दान पहुंचा दें।
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उन्होंने अयोध्या में भगवान श्रीराम के मंदिर निर्माण के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का आभार जताया। कहा कि देश को ऐसे प्रधानमंत्री बार-बार मिलने चाहिए, जो कुछ करने का जज्बा रखते हैं। यह देश के लिए ऐतिहासिक है और उन सभी कारसेवकों के लिए सच्ची श्रद्धांजलि है, जिन्होंने अयोध्या संघर्ष में बलिदान दिया। वहीं, प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में विहिप, आरएसएस और दूसरे हिंदू संगठनों की ओर से अयोध्या में प्राण प्रतिष्ठा को लेकर प्रभु श्रीराम का निमंत्रण और अक्षत दिया जा रहा है। लोगों को आसपास के मंदिरों में पहुंचकर 22 जनवरी को होने वाले प्राण प्रतिष्ठा समारोह का गवाह बनने और दीप मालाएं करने को कहा जा रहा है।