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शादी के श्रृंगार से लेकर वटुक पूजा की आस्था दिखी
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जम्मू। चारों ओर खुशनुमा माहौल, अपनों के बीच चहल-पहल, चेहरों पर उमंग और उत्साह। मौका था वीरवार को जगती टाउनशिप में शुरू हुए कश्मीरी पंडित फूड, कल्चर व क्राफ्ट उत्सव का। कश्मीरी पंडितों ने दिखाया कि तीस साल के आतंकवाद और अन्य विकट परिस्थितियों में भी उन्होंने अपनी कश्मीरियत को खुद से अलग नहीं किया है। वही हसीन वादियों वाली संस्कृति और विरासत की बखूबी झलक दिखी। खासतौर पर उत्सव में विरासती बर्तनों को देखकर पंडितों को अपनों की याद आ गई। इन बर्तनों की नक्काशी में उनकी संस्कृति छिपी हुई थी। उत्सव में पंडितों के शादी समारोह से लेकर वटुक पूजा की आस्था दिखाई गई।
जगती के लेन 14 स्थित सामुदायिक हाल में हुए उत्सव में कश्मीरी बर्तनों और उनकी संस्कृति से जुड़ी चित्रकारी प्रदर्शनी आकर्षण का केंद्र रही। इसमें कई ऐसे प्रमुख बर्तन रखे गए थे जो कश्मीर में उनकी जीवनचर्या और जीवन से जुड़े रहे। संध्या चोग से पंडित संध्या में चिराग जलाते थे। इसी तरह कांज को मसाले कूटने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। सामावार पंडितों के घरों में चाय और काहवा बनाने के लिए प्रमुख और विरासती बर्तन रहा है। खोस में चाय डालकर दी जाती है। पंडितों के प्रमुख त्योहार महाशिवरात्रि की वटुक पूजा की सामग्री को भी दर्शाया गया था। शिवरात्रि पर पंडित समुदाय के घरों में कई दिन तक वटुक पूजा की जाती है। इसके अलावा मानन माल और टिकटाल में पंडितों के घरों में महिलाओं द्वारा श्रृंगार की सामग्री को प्रदर्शित किया गया। इसी तरह तुंबक नार पारंपरिक वाद्य यंत्र शादी समारोह में बजाए जाते हैं। कश्मीर में अधिकांश ठंड का जीवन व्यतीत करने वाले पंडित समुदाय में जजीर यानी हुक्का भी प्रमुख भूमिका निभाता रहा है। कांगड़ी भी पंडितों के जीवन से जुड़ी रही है। इसके अलावा चित्रकारी में कश्मीरी पंडितों की संस्कृति और देवी देवताओं को दर्शाया गया।
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जगती के लेन 14 स्थित सामुदायिक हाल में हुए उत्सव में कश्मीरी बर्तनों और उनकी संस्कृति से जुड़ी चित्रकारी प्रदर्शनी आकर्षण का केंद्र रही। इसमें कई ऐसे प्रमुख बर्तन रखे गए थे जो कश्मीर में उनकी जीवनचर्या और जीवन से जुड़े रहे। संध्या चोग से पंडित संध्या में चिराग जलाते थे। इसी तरह कांज को मसाले कूटने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। सामावार पंडितों के घरों में चाय और काहवा बनाने के लिए प्रमुख और विरासती बर्तन रहा है। खोस में चाय डालकर दी जाती है। पंडितों के प्रमुख त्योहार महाशिवरात्रि की वटुक पूजा की सामग्री को भी दर्शाया गया था। शिवरात्रि पर पंडित समुदाय के घरों में कई दिन तक वटुक पूजा की जाती है। इसके अलावा मानन माल और टिकटाल में पंडितों के घरों में महिलाओं द्वारा श्रृंगार की सामग्री को प्रदर्शित किया गया। इसी तरह तुंबक नार पारंपरिक वाद्य यंत्र शादी समारोह में बजाए जाते हैं। कश्मीर में अधिकांश ठंड का जीवन व्यतीत करने वाले पंडित समुदाय में जजीर यानी हुक्का भी प्रमुख भूमिका निभाता रहा है। कांगड़ी भी पंडितों के जीवन से जुड़ी रही है। इसके अलावा चित्रकारी में कश्मीरी पंडितों की संस्कृति और देवी देवताओं को दर्शाया गया।
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