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तीन तरफ से घेरा डाल दुश्मन पर की चढ़ाई, टाइगर हिल को कराया आजाद
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जम्मू। कारगिल युद्ध में टाइगर हिल का ऑपरेशन सबसे निर्णायक मोड़ था। 16608 फुट की ऊंचाई वाली इस चोटी से श्रीनगर-लेह राष्ट्रीय मार्ग के 30 से 35 किलोमीटर तक नजर रखी जा सकती है। यहां दुश्मन के सभी बड़े युद्ध भंडार मौजूद थे। सभी बंकर भी कंक्रीट के बने थे। इससे पहले हमारा एक युद्ध भंडार जो इसी रोड पर कारगिल में था, उसे नष्ट कर दिया गया था। यहीं से पाकिस्तानी घुसपैठिये पीछे स्थित तोपखाने से गोले दगवा कर भारतीय सेना की गाड़ियों का रास्ता रोक रहे थे।
पाकिस्तानी सेना के कब्जे से टाइगर हिल को छुड़ाने की जिम्मेदारी 18 ग्रनेडियर्स के जवानों को दी गई थी। नागा और सिख बटालियन पहले से ही वहां थी। तीन तरफ उत्तर, पूर्व और उत्तर पूर्व दिशा से आक्रमण की योजना बनाई गई। बाएं से 18 सिख तो दाएं से 2 नागा और मध्य से सबसे कठिन सीधी चढ़ाई से 18 ग्रनेडियर्स के जवान थे। तब 18 ग्रनेडियर्स की कमांड कर्नल खुशाल ठाकुर के पास थी। घातक प्लाटून की कमांड लेफ्टिनेट बलवान सिंह को सौंपी गई।
3 जुलाई की रात 8 बजे सेना ने ऑपरेशन टाइगर हिल शुरू किया। रात 1:30 बजे तक टाइगर हिल की तीनों तरफ से घेराबंदी कर दी गई थी। ऊपर से हैवी फायर आ रहा था। इस बीच कुछ देर बड़े पत्थरों के पीछे ओट लेकर बादल आने तक रुकना पड़ा। आगे लगभग एक किलोमीटर सीधी चढ़ाई थी। इसको रात को ही रस्सों के जरिये पार किया जा सकता था। हालांकि यह असंभव काम भी घातक प्लाटून ने आखिरकार हवलदार मदन लाल के नेतृत्व में कर डाला।
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दूसरी तरफ हेल्मेट एरिया वेस्टर्न स्पर और इंडिया गेट चौकियां थीं, जहां से दुश्मन की सप्लाई लाइन नजर आ रही थी। इसको अवरुद्घ करने के लिए 18 सिख के रिजर्व दल को भेजा गया, जिन्होंने 5 जुलाई की सुबह तक सीधी चढ़ाई करते हुए सफलता प्राप्त कर ली थी। 6 जुलाई की सुबह तक 18 सिख ने अपना भारी नुकसान उठाते हुए दुश्मन की सभी सप्लाई लाइन पूरी तरह से बंद कर दी थी और पूरा हेल्मेट एरिया अपने कब्जे में ले लिया था।
इसी ऑपरेशन में ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव को लगी थीं 14 गोलियां
इधर ग्रेनेडियर की घातक प्लाटून के के एक दल का नेतृत्व अब ग्रेनेडयर योगेंद्र सिंह यादव सकुशल कर रहे थे। 7-8 जुलाई की रात को ये निर्णायक हमला शुरू कर चुके थे। उधर 18 सिख बटालियन के बहुत से सैनिक शहीद हो चुके थे, लेकिन उन्होंने मोर्चा संभाले रखा था। अब तोपखाने की सहायता भी उपलब्ध हो चुकी थी। 8 जुलाई की दोपहर तक टाइगर हिल की रिवर्स स्लोप, रॉकी नोब, वी कट व कॉलर पोस्टें अब हमारे कब्जे में आ चुकी थीं और विजय का प्रतीक तिरंगा फहराया जा चुका था। इसी ऑपरेशन में ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव जिन्हें 14 गोलियां लगीं थीं, उन्हें परमवीर चक्र से नवाजा गया। इसके अलावा लेफ्टिनेंट (अब कर्नल) बलवान सिंह को महावीर चक्र और हवलदार मदन लाल को मरणोपरांत वीर चक्र व 18 ग्रनेडियर्स को यूनिट साइटेसन से अलंकृत किया गया।
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पाकिस्तानी सेना के कब्जे से टाइगर हिल को छुड़ाने की जिम्मेदारी 18 ग्रनेडियर्स के जवानों को दी गई थी। नागा और सिख बटालियन पहले से ही वहां थी। तीन तरफ उत्तर, पूर्व और उत्तर पूर्व दिशा से आक्रमण की योजना बनाई गई। बाएं से 18 सिख तो दाएं से 2 नागा और मध्य से सबसे कठिन सीधी चढ़ाई से 18 ग्रनेडियर्स के जवान थे। तब 18 ग्रनेडियर्स की कमांड कर्नल खुशाल ठाकुर के पास थी। घातक प्लाटून की कमांड लेफ्टिनेट बलवान सिंह को सौंपी गई।
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3 जुलाई की रात 8 बजे सेना ने ऑपरेशन टाइगर हिल शुरू किया। रात 1:30 बजे तक टाइगर हिल की तीनों तरफ से घेराबंदी कर दी गई थी। ऊपर से हैवी फायर आ रहा था। इस बीच कुछ देर बड़े पत्थरों के पीछे ओट लेकर बादल आने तक रुकना पड़ा। आगे लगभग एक किलोमीटर सीधी चढ़ाई थी। इसको रात को ही रस्सों के जरिये पार किया जा सकता था। हालांकि यह असंभव काम भी घातक प्लाटून ने आखिरकार हवलदार मदन लाल के नेतृत्व में कर डाला।
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दूसरी तरफ हेल्मेट एरिया वेस्टर्न स्पर और इंडिया गेट चौकियां थीं, जहां से दुश्मन की सप्लाई लाइन नजर आ रही थी। इसको अवरुद्घ करने के लिए 18 सिख के रिजर्व दल को भेजा गया, जिन्होंने 5 जुलाई की सुबह तक सीधी चढ़ाई करते हुए सफलता प्राप्त कर ली थी। 6 जुलाई की सुबह तक 18 सिख ने अपना भारी नुकसान उठाते हुए दुश्मन की सभी सप्लाई लाइन पूरी तरह से बंद कर दी थी और पूरा हेल्मेट एरिया अपने कब्जे में ले लिया था।
इसी ऑपरेशन में ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव को लगी थीं 14 गोलियां
इधर ग्रेनेडियर की घातक प्लाटून के के एक दल का नेतृत्व अब ग्रेनेडयर योगेंद्र सिंह यादव सकुशल कर रहे थे। 7-8 जुलाई की रात को ये निर्णायक हमला शुरू कर चुके थे। उधर 18 सिख बटालियन के बहुत से सैनिक शहीद हो चुके थे, लेकिन उन्होंने मोर्चा संभाले रखा था। अब तोपखाने की सहायता भी उपलब्ध हो चुकी थी। 8 जुलाई की दोपहर तक टाइगर हिल की रिवर्स स्लोप, रॉकी नोब, वी कट व कॉलर पोस्टें अब हमारे कब्जे में आ चुकी थीं और विजय का प्रतीक तिरंगा फहराया जा चुका था। इसी ऑपरेशन में ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव जिन्हें 14 गोलियां लगीं थीं, उन्हें परमवीर चक्र से नवाजा गया। इसके अलावा लेफ्टिनेंट (अब कर्नल) बलवान सिंह को महावीर चक्र और हवलदार मदन लाल को मरणोपरांत वीर चक्र व 18 ग्रनेडियर्स को यूनिट साइटेसन से अलंकृत किया गया।