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कल्हण की 'राजतरंगिणी' का दुनिया में बजा डंका: यूनेस्को के रिकॉर्ड में दर्ज हुई कश्मीर की विरासत, मिला सम्मान

Fri, 06 Nov 2026 03:01 PM IST
Nikita Gupta अभिषेक राज, अमर उजाला नेटवर्क,जम्मू
अभिषेक राज, अमर उजाला नेटवर्क,जम्मू Published by: Nikita Gupta Updated Fri, 06 Nov 2026 03:01 PM IST
सार

यूनेस्को की एशिया-प्रशांत क्षेत्रीय स्मृति सूची में महाभारत, कल्हण की राजतरंगिणी और कौटिल्य के अर्थशास्त्र की पांडुलिपियों को शामिल किया गया है। इस उपलब्धि से कश्मीर की प्राचीन ज्ञान परंपरा और शारदा लिपि में लिखी दुर्लभ पांडुलिपियों को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली है।

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Kalhana’s Rajatarangini gains global recognition Kashmir’s heritage finds a place in UNESCO records
कल्हण की राजतरंगिणी - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

कश्मीर की ऐतिहासिक और बौद्धिक विरासत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिली है। भारत के तीन महत्वपूर्ण ग्रंथों-महाभारत, कल्हण की राजतरंगिणी और कौटिल्य के अर्थशास्त्र की पांडुलिपियों को यूनेस्को के मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड एशिया-पैसिफिक रीजनल रजिस्टर में शामिल किया गया है। इनमें राजतरंगिणी व महाभारत का सीधा संबंध कश्मीर की ज्ञान परंपरा, शारदा लिपि और पांडुलिपि विरासत से है।

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12वीं शताब्दी में कल्हण रचित राजतरंगिणी की दुर्लभ पांडुलिपि श्रीनगर की ओरिएंटल रिसर्च लाइब्रेरी में संरक्षित है। वहीं, महाभारत की लगभग 400 साल पुरानी भोजपत्र पांडुलिपि भी कश्मीर से प्राप्त हुई थी। यह उपलब्धि कश्मीर को केवल प्राकृतिक सुंदरता और पर्यटन के लिए ही नहीं, बल्कि भारत की प्राचीन लेखन और ज्ञान परंपरा के महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में भी सामने लाती है।

कश्मीर के इतिहास का दस्तावेज है राजतरंगिणी
शारदा लिपि पर काम कर रहे अनूप काैल कहते हैं कि कल्हण की राजतरंगिणी को भारतीय साहित्य में इतिहास लेखन की महत्वपूर्ण कृतियों में गिना जाता है। 12वीं शताब्दी में संस्कृत में रचित इस ग्रंथ में कश्मीर के राजाओं, राजवंशों, राजनीतिक घटनाक्रमों और सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन का क्रमबद्ध विवरण है। कल्हण ने केवल राजाओं की उपलब्धियों का वर्णन नहीं किया। उन्होंने ऐतिहासिक विवरण भी प्रस्तुत करने का प्रयास किया।

महाभारत की पांडुलिपि का भी कश्मीर से नाता
दूसरा महत्वपूर्ण कश्मीरी जुड़ाव महाभारत की दुर्लभ पांडुलिपि है। लगभग 400 वर्ष पुरानी यह पांडुलिपि भोजपत्र पर शारदा लिपि में लिखी गई है। वर्तमान में यह पुणे स्थित भंडारकर ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट में संरक्षित है। यूनेस्को के अनुसार जॉर्ज बुहलर ने वर्ष 1875 में कश्मीर से इसे प्राप्त किया था। यह महाभारत के पुराने कश्मीरी पाठ का महत्वपूर्ण प्रमाण मानी जाती है। इस तरह कश्मीर की शारदा लिपि और भोजपत्र पर लिखने की परंपरा ने भारतीय महाकाव्य की एक महत्वपूर्ण पांडुलिपि को संरक्षित रखने में भूमिका निभाई।

शारदा लिपि की अपनी समृद्ध विरासत
शारदा लिपि कश्मीर और उत्तर-पश्चिमी भारतीय उपमहाद्वीप में संस्कृत लेखन की महत्वपूर्ण लिपि रही है। भोजपत्र और पुराने कश्मीरी कागज पर लिखी गई पांडुलिपियां इस क्षेत्र की विद्वत्ता, साहित्य और ज्ञान के संरक्षण की परंपरा की गवाही देती हैं। ऐसे में राजतरंगिणी और महाभारत की पांडुलिपियों को मिली मान्यता कश्मीर की ऐतिहासिक भूमिका को नए सिरे से रेखांकित करती है। यह पूरे जम्मू-कश्मीर के लिए गर्व का क्षण है।

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