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Jammu Theater Festival: घाटी में 32 साल से बंद मंदिर में पूजा कर कश्मीरियत को बयां कर गया मंजूर
Mon, 27 Feb 2023 04:16 PM IST
kumar गुलशन कुमार
अमर उजाला नेटवर्क, जम्मू
अमर उजाला नेटवर्क, जम्मू
Published by: kumar गुलशन कुमार
Updated Mon, 27 Feb 2023 04:16 PM IST
सार
अभिनव थियेटर में मंचित नाटक अतीत के साक्षी में कश्मीरी मुस्लिम मंजूर खान घाटी में 32 साल से बंद पड़े मंदिर में पूजा कर मिसाल पेश करता हुआ नजर आता है।
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Jammu Therater Festival
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
कश्मीर में कश्मीरियत, धार्मिक सद्भाव आज भी जिंदा है। इसकी मिसाल कश्मीरी मुस्लिम मंजूर खान घाटी में 32 साल से बंद पड़े मंदिर में पूजा कर पेश करता है। यह कहानी रविवार को अभिनव थियेटर में मंचित नाटक अतीत के साक्षी में देखने को मिली। वोमेद ग्रुप के इस नाटक का लेखन राकेश रोशन भट और निर्देशन रोहित भट ने किया है।
नाटक कश्मीर से विस्थापित होने के बाद कश्मीरी पंडित और कश्मीरी मुस्लिम परिवार के बीच के आपसी संबंधों की कहानी पर आधारित है। इसमें कश्मीरी पंडित के घाटी से चले जाने के बाद उनके घर, जमीन और धार्मिक स्थलों को दिखाया गया है। कैसे तमाम मुश्किलों के बाद भी कश्मीरी मुस्लिम गाशजी 32 सालों से कश्मीरी पंडित के मंदिर की देखरेख कर रहे हैं।
हज पर जाने से पहले वह अपने बेटे मंजूर खान को इसकी देखभाल करने को कहते हैं। मंजूर जम्मू में रह रहे राजीव के पास जाते हैं। दोनों के बीच कश्मीर समस्या को लेकर संवाद होता है। इसमें दोनों अपने दिल के भाव को बयां करते हैं। एक समय पर दोनों को लगता है कि कश्मीर की समस्या का हल सिर्फ कश्मीरियत से ही होगा।
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मंजूर खान श्रीनगर जाते हैं, तब उन्हें उद्योगपति सदा उल्लाबख्श के मंसूबों का पता चलता है। वह मंदिर की जमीन पर कब्जा करना चाहता है। दोनों के बीच कश्मीरी पंडितों पर चर्चा होती है। इसमें सदा उल्लाबख्श कहता है कि हम आजादी की लड़ाई लड़ रहे हैं, लेकिन मंजूर इसको उसकी व्यक्तिगत लड़ाई कहता है। इसी बीच कश्मीरी पंडित राजीव जम्मू से कश्मीर में मंदिर में पूजा करने आते हैं, लेकिन दहशतगर्द उसे मंदिर के सामने गोली मार देते हैं। राजीव की मौत के बाद मंजूर खान कश्मीरियत को बयां करते हुए मंदिर में पूजा करवाता है। नाटक में भारती, अरविन टिक्कू, रविंद्र शर्मा, सन्नी, मंजू, डॉ. रमेश ने अभिनय किया।
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नाटक कश्मीर से विस्थापित होने के बाद कश्मीरी पंडित और कश्मीरी मुस्लिम परिवार के बीच के आपसी संबंधों की कहानी पर आधारित है। इसमें कश्मीरी पंडित के घाटी से चले जाने के बाद उनके घर, जमीन और धार्मिक स्थलों को दिखाया गया है। कैसे तमाम मुश्किलों के बाद भी कश्मीरी मुस्लिम गाशजी 32 सालों से कश्मीरी पंडित के मंदिर की देखरेख कर रहे हैं।
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हज पर जाने से पहले वह अपने बेटे मंजूर खान को इसकी देखभाल करने को कहते हैं। मंजूर जम्मू में रह रहे राजीव के पास जाते हैं। दोनों के बीच कश्मीर समस्या को लेकर संवाद होता है। इसमें दोनों अपने दिल के भाव को बयां करते हैं। एक समय पर दोनों को लगता है कि कश्मीर की समस्या का हल सिर्फ कश्मीरियत से ही होगा।
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मंजूर खान श्रीनगर जाते हैं, तब उन्हें उद्योगपति सदा उल्लाबख्श के मंसूबों का पता चलता है। वह मंदिर की जमीन पर कब्जा करना चाहता है। दोनों के बीच कश्मीरी पंडितों पर चर्चा होती है। इसमें सदा उल्लाबख्श कहता है कि हम आजादी की लड़ाई लड़ रहे हैं, लेकिन मंजूर इसको उसकी व्यक्तिगत लड़ाई कहता है। इसी बीच कश्मीरी पंडित राजीव जम्मू से कश्मीर में मंदिर में पूजा करने आते हैं, लेकिन दहशतगर्द उसे मंदिर के सामने गोली मार देते हैं। राजीव की मौत के बाद मंजूर खान कश्मीरियत को बयां करते हुए मंदिर में पूजा करवाता है। नाटक में भारती, अरविन टिक्कू, रविंद्र शर्मा, सन्नी, मंजू, डॉ. रमेश ने अभिनय किया।