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जम्मू-कश्मीर: सरस मेले में राजस्थान-हिमाचल के शिल्पकारों के उत्पाद कर रहे आकर्षित, लगातार बढ़ रही रौनक

Wed, 08 Feb 2023 07:04 PM IST
विमल शर्मा अमर उजाला नेटवर्क, जम्मू
अमर उजाला नेटवर्क, जम्मू Published by: विमल शर्मा Updated Wed, 08 Feb 2023 07:04 PM IST
सार

सरस आजीविका मेले में स्वयं सहायता समूह की इन महिलाओं द्वारा हस्तशिल्प उत्पाद लोगों के आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। इनमें मिट्टी के बर्तन, पश्मीना शॉल, हैंड बैग, अचार, कपड़े, डायरी और अन्य हस्तशिल्प उत्पाद शामिल हैं।

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Jammu-Kashmir: products craftsmen of Rajasthan-Himachal are attracting attention in Saras fair
जम्मू सरस मेला - फोटो : संवाद

विस्तार

जम्मू शहर के बाग-ए-बाहु पार्क में आयोजित सरस मेले में प्रदेश सहित देश के विभिन्न राज्यों की महिला उद्यमियों ने हस्तशिल्प उत्पादों के साथ भाग लिया है। यहां महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक बेहतर प्रयास नजर आता है, जहां महिलाएं अपने हुनर के दम पर अपनी पहचान बनाने में जुटी हैं।

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इससे साफ है कि जीविका इन महिलाओं की आजीविका के लिए वरदान साबित हो सकती है। जीविका के स्वयं सहायता समूह की ये महिलाएं न केवल अपना और अपने परिवार, बल्कि देश की आर्थिक स्थिति मजबूत करने में अपना योगदान दे रही हैं।
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स्वयं सहायता समूह की की मदद से महिलाएं रोजगार दाता बन रही हैं। मेले में 15 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की महिला स्वयं सहायता समूहों का जमावड़ा है। यहां राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, मध्यप्रदेश, पंजाब, हरियाणा सहित अन्य राज्यों की महिला शिल्पकारों के उत्पाद लोगों को आकर्षित कर रहे हैं।
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सरस आजीविका मेले में स्वयं सहायता समूह की इन महिलाओं द्वारा हस्तशिल्प उत्पाद लोगों के आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। इनमें मिट्टी के बर्तन, पश्मीना शॉल, हैंड बैग, अचार, कपड़े, डायरी और अन्य हस्तशिल्प उत्पाद शामिल हैं। इसके साथ ही मेले में लोगों के खाने-पीने के लिए स्थानीय व्यंजन के साथ-साथ अन्य राज्यों के व्यंजन भी उपलब्ध हैं।

राजस्थान से आई कोमल शर्मा स्वयं सहायता समूह से पांच साल पहले जुड़ी हैं। वह डायरी, लिफाफे, फोटोफ्रेम और अन्य हस्तशिल्प उत्पाद बनाती हैं। वह बताती हैं कि राजस्थान में महिलाएं घर से बाहर निकलकर काम नहीं कर सकती थी।

स्वयं सहायता समूह ने महिलाओं के उत्थान में अहम भूमिका निभाई है। हमारी शुरूआत दस हजार से हुई थी और आज अगर किसी प्रदर्शनी में दो लाख का सामान लेकर जाते हैं तो कम से कम 50 से 60 हजार तक का लाभ होता है।

बडगाम के चडूरा गांव की रहने वाली रूख़शाना रसूल का कहना है कि जीविका ने उनकी जिंदगी बदल दी है। उनका पश्मीना शॉल, ड्राई फ्रूट्स, कश्मीरी कहवा और सैफ्रॉन का स्टाल है। वह पांच साल पहले स्वयं सहायता समूह से जुड़ी थीं।


उस समय पश्मीना शॉल बनाने नहीं आता था। पहले माता-पिता पर निर्भर थी। अब वह खुद कमाती हूं। हरियाणा के नुह जिले की सावित्री बताती हैं कि वह टेराकोटा रेड स्टोन को पीस कर मिट्टी को गूंथते हैं और उनसे गमले, मूर्तियां और अन्य बर्तन बनाते हैं। इन्हें बनने में दो दिन लगता है।

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