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Jammu News: बाबा चमलियाल मेले को लेकर दरगाह में रंग रोगन और अन्य तैयारियां शुरू
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सांबा। रामगढ़ सेक्टर स्थित अंतरराष्ट्रीय सीमा की जीरो लाइन के निकट दरगाह बाबा चमलियाल में 25 जून को विशाल वार्षिक मेले का आयोजन किया जाएगा। मेले को लेकर तैयारियां जोर-शोर से जारी हैं। स्थानीय लोगों और दरगाह प्रबंधन समिति की ओर से परिसर में साफ-सफाई, रंग-रोगन और अन्य व्यवस्थाओं का कार्य शुरू कर दिया गया है।
बाबा चमलियाल दरगाह भारत-पाक सीमा पर आस्था का एक बड़ा केंद्र मानी जाती है। जहां हर वर्ष हजारों श्रद्धालु पहुंचते हैं। मान्यता के अनुसार बाबा चमलियाल का वास्तविक नाम दिलीप सिंह मन्हास था, जो दग गांव के निवासी थे और चर्म रोगों का उपचार करते थे। इससे उन्हें बाबा चमलियाल के नाम से भी जाना जाता है। भारत पाकिस्तान दोनों देशों के लोग उन्हें मानते हैं। पाकिस्तान के गांव सैदांवली में भी बाबा की दरगाह है। बाबा चमलियाल की दरगाह पर हर वर्ष जून माह के अंतिम वीरवार को मेले का आयोजन किया जाता है।
यह स्थान भारत और पाकिस्तान दोनों देशों के लोगों की आस्था का केंद्र बन गया। वर्ष 1971 के युद्ध से पहले पाकिस्तान की ओर से पाकिस्तानी रेंजर और स्थानीय श्रद्धालु दरगाह पर चादर चढ़ाने आते थे। बाद में सीमा की जीरो लाइन पर आयोजित मेले में चादर चढ़ाने की रस्म निभाई जाती थी। साथ ही “शक्कर” और “शरबत” के रूप पानी व मिटटी पवित्र प्रसाद के तौर पर भी पाकिस्तानी श्रद्धालुओं तक पहुंचाया जाती था।
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हालांकि, सीमा पर लगातार बने तनावपूर्ण माहौल के चलते पिछले कई वर्षों से न तो चादर चढ़ाने की रस्म अदा हो पा रही है और न ही पाकिस्तानी श्रद्धालुओं को पवित्र प्रसाद भेजा जा रहा है। इसके बावजूद श्रद्धालुओं की आस्था आज भी बाबा चमलियाल दरगाह से गहराई से जुड़ी हुई है।
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बाबा चमलियाल दरगाह भारत-पाक सीमा पर आस्था का एक बड़ा केंद्र मानी जाती है। जहां हर वर्ष हजारों श्रद्धालु पहुंचते हैं। मान्यता के अनुसार बाबा चमलियाल का वास्तविक नाम दिलीप सिंह मन्हास था, जो दग गांव के निवासी थे और चर्म रोगों का उपचार करते थे। इससे उन्हें बाबा चमलियाल के नाम से भी जाना जाता है। भारत पाकिस्तान दोनों देशों के लोग उन्हें मानते हैं। पाकिस्तान के गांव सैदांवली में भी बाबा की दरगाह है। बाबा चमलियाल की दरगाह पर हर वर्ष जून माह के अंतिम वीरवार को मेले का आयोजन किया जाता है।
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यह स्थान भारत और पाकिस्तान दोनों देशों के लोगों की आस्था का केंद्र बन गया। वर्ष 1971 के युद्ध से पहले पाकिस्तान की ओर से पाकिस्तानी रेंजर और स्थानीय श्रद्धालु दरगाह पर चादर चढ़ाने आते थे। बाद में सीमा की जीरो लाइन पर आयोजित मेले में चादर चढ़ाने की रस्म निभाई जाती थी। साथ ही “शक्कर” और “शरबत” के रूप पानी व मिटटी पवित्र प्रसाद के तौर पर भी पाकिस्तानी श्रद्धालुओं तक पहुंचाया जाती था।
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हालांकि, सीमा पर लगातार बने तनावपूर्ण माहौल के चलते पिछले कई वर्षों से न तो चादर चढ़ाने की रस्म अदा हो पा रही है और न ही पाकिस्तानी श्रद्धालुओं को पवित्र प्रसाद भेजा जा रहा है। इसके बावजूद श्रद्धालुओं की आस्था आज भी बाबा चमलियाल दरगाह से गहराई से जुड़ी हुई है।