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लद्दाख से सटे कब्बन गांव ने जैविक खेती में पेश की नजीर
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जम्मू। जम्मू से 400 किलोमीटर की दूरी पर स्थित किश्तवाड़ के पाडर का कब्बन गांव खेती में अलग पहचान बना रहा है। एक तरफ लद्दाख का जंस्कार और दूसरी तरफ हिमाचल की पांगी घाटी से सटे कब्बन गांव के ग्रामीण मटर और आलू की जैविक खेती करते हैं। दोनों फसलों की बाजार में भारी मांग है। महज 200 घरों वाले गांव ने बीते वर्ष 1500 क्विंटल जैविक मटर जम्मू की मंडी तक पहुंचाया, जिससे ग्रामीणों की अच्छी आमदनी हुई। यह मटर तब बाजार में आता है, जब मैदानी इलाके में मटर का सीजन नहीं होता। बौद्ध आबादी वाले इस दूरदराज गांव में पैदा होने वाला मटर मीठा और स्वादिष्ट है, जिससे यह हाथों हाथ बिक रहा है। एक ही फसल सीजन वाले इलाके में मटर की खेती को बढ़ावा देने के लिए अब बागवानी, योजना एवं विपणन विभाग किसानों को और अच्छे दाम दिलाने की व्यवस्था करने जा रहा है।
कब्बन गांव के किसानों का मटर जम्मू में मंडी तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे टशी सुमतोन के अनुसार कब्बन का मटर पूरी तरह से जैविक है। इसमें किसी तरह के रसायन का इस्तेमाल नहीं किया जाता। हालांकि आधिकारिक रूप से इसका जैविक प्रमाणिकरण नहीं हुआ है, लेकिन मटर की गुणवत्ता ही इसकी सबसे बड़ी खासियत है। टशी ने बताया कि जम्मू से 400 किलोमीटर दूर गांव तक 21 किलोमीटर लंबी सड़क बन रही है। सड़क बनने के बाद कुछ आसानी होगी। गांव में एक परिवार अनुसूचित जाति और अन्य सभी बौद्ध समुदाय से हैं। यहां 70 फीसदी क्षेत्र में मटर और 30 फीसदी में आलू उगाया जाता है। दोनों ही फसलों की उपज जैविक होने की वजह से बाजार में झट से बिक जाती है। ढाई माह के सीजन में बीते वर्ष कब्बन के ग्रामीणों ने 25 रुपये प्रति किलो के हिसाब से गांव में ही 1500 क्विंटल मटर बेचा, जिसे मंडी और रिटेल बाजार में भी अच्छा भाव मिला।
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पाडर के कब्बन गांव का मटर मीठा और बेहद स्वादिष्ट है। छोटे से गांव ने मटर की जैविक खेती में नजीर पेश की है। विभाग किसानों को बेहतर बाजार उपलब्ध करवाने के लिए आगामी सीजन में व्यवस्था करेगा।
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- विशेष पाल महाजन, निदेशक बागवानी, योजना एवं विपणन जम्मू-कश्मीर
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कब्बन गांव के किसानों का मटर जम्मू में मंडी तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे टशी सुमतोन के अनुसार कब्बन का मटर पूरी तरह से जैविक है। इसमें किसी तरह के रसायन का इस्तेमाल नहीं किया जाता। हालांकि आधिकारिक रूप से इसका जैविक प्रमाणिकरण नहीं हुआ है, लेकिन मटर की गुणवत्ता ही इसकी सबसे बड़ी खासियत है। टशी ने बताया कि जम्मू से 400 किलोमीटर दूर गांव तक 21 किलोमीटर लंबी सड़क बन रही है। सड़क बनने के बाद कुछ आसानी होगी। गांव में एक परिवार अनुसूचित जाति और अन्य सभी बौद्ध समुदाय से हैं। यहां 70 फीसदी क्षेत्र में मटर और 30 फीसदी में आलू उगाया जाता है। दोनों ही फसलों की उपज जैविक होने की वजह से बाजार में झट से बिक जाती है। ढाई माह के सीजन में बीते वर्ष कब्बन के ग्रामीणों ने 25 रुपये प्रति किलो के हिसाब से गांव में ही 1500 क्विंटल मटर बेचा, जिसे मंडी और रिटेल बाजार में भी अच्छा भाव मिला।
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पाडर के कब्बन गांव का मटर मीठा और बेहद स्वादिष्ट है। छोटे से गांव ने मटर की जैविक खेती में नजीर पेश की है। विभाग किसानों को बेहतर बाजार उपलब्ध करवाने के लिए आगामी सीजन में व्यवस्था करेगा।
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- विशेष पाल महाजन, निदेशक बागवानी, योजना एवं विपणन जम्मू-कश्मीर