जम्मू की झांसी की रानी महामाया कौन थी?: कहानी 1400 साल पुरानी, प्रमाण अब भी गायब; वीरांगना का इतिहास गया कहां
जम्मू की वीरांगना महामाया की 1400 वर्ष पुरानी गाथा लोक-स्मृतियों में आज भी जीवित है, लेकिन उनके ऐतिहासिक अस्तित्व के ठोस दस्तावेजी और प्रमाण अब तक सामने नहीं आए हैं। महामाया मंदिर की उपेक्षा के बीच इतिहासविदों और पुरातत्व विशेषज्ञों ने व्यापक शोध व उत्खनन की जरूरत बताई है, ताकि इस विरासत को प्रमाणिक पहचान और जम्मू के पर्यटन मानचित्र पर उचित स्थान मिल सके।
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विस्तार
तवी नदी के पावन कूलों और सत्ता की प्रतीक बाहू किले की भव्यता के बीच, सामने वाली पहाड़ी पर खामोश खड़ा 'महामाया मंदिर' केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि जम्मू के उस स्वाभिमान का प्रतीक है जिसे वक्त की धुंध ने धुंधला कर दिया है। लगभग 1400 वर्ष पूर्व विदेशी आक्रांताओं के छक्के छुड़ा देने वाली डोगरा वीरांगना महामाया की गाथा आज भी जन-जन की स्मृतियों में पैबस्त है लेकिन सरकारी फाइलों और ऐतिहासिक दस्तावेजों में उनका नाम एक अदद पन्ने के लिए तरस रहा है। इन्हें आज तक वह हक नहीं मिल पाया जिसकी वह हकदार हैं। मंदिर परिसर में बिखरे हुए पत्थर आज भी अपने भीतर छिपे इतिहास के उजागर होने का इंतजार कर रहे हैं।
सातवीं शताब्दी की वीरांगना का जिक्र
प्रसिद्ध विद्वान ज्योतिश्वर पथिक की कृति 'कल्चरल हेरिटेज ऑफ द डोगराज' में महामाया को एक ऐसी योद्धा रानी बताया गया है जिन्होंने सातवीं शताब्दी के आसपास अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए प्राणों का उत्सर्ग किया। लोक-मान्यताओं में उन्हें ‘जम्मू की झांसी की रानी’ का दर्जा प्राप्त है। पर हैरत की बात यह है कि जम्मू विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग और धनवंतरी लाइब्रेरी में की गई गहन पड़ताल में पता चला कि —इतने बड़े ऐतिहासिक व्यक्तित्व पर आज तक कोई ठोस 'फर्स्ट-हैंड' शोध उपलब्ध ही नहीं है।
1400 वर्षों की जन-श्रुति को अब तक किसी ठोस दस्तावेजी या पुरातात्विक उत्खनन का आधार नहीं मिला है। यही वह रिक्त स्थान है जिसे भरने की जिम्मेदारी अब इतिहासविदों,एएसआई और हुकूमत की है।
महामाया मंदिर केवल पूजा स्थल नहीं, बल्कि जम्मू की अस्मिता और विदेशी आक्रांताओं के विरुद्ध प्रतिरोध का प्रतीक है। जब सूर्य की अंतिम किरणें तवी के शांत जल को स्पर्श करती हैं, तो जम्मू की पहाड़ियों पर एक मौन पसर जाता है। इसी सन्नाटे के बीच, बाहू किले के ठीक सामने वाली पहाड़ी पर एक मंदिर खड़ा है महामाया।
बावे वाली माता की रौनक के सामने महामाया की गुमनामी
यह केवल पत्थर और गारे से बना कोई सामान्य सा ढांचा नहीं बल्कि एक वीरांगना के त्याग और स्वाभिमान की गाथा है।जहां 'बावे वाली माता' का दरबार भक्तों की भीड़ से गुंजायमान रहता है, वहीं उसकी बहन के समान पूजनीय 'महामाया' आज भी एक एकांत तपस्विनी की भांति प्रशासन की अनदेखी और पर्यटकों की विस्मृति के बीच अपनी ऐतिहासिकता को सहेजने का संघर्ष कर रही है।
यह उस वीरांगना का घर है जिसने सदियों पहले अपनी माटी के लिए लहू बहाया था, मगर विडंबना देखिए, आज वह माटी ही अपने रक्षक के अस्तित्व से अनजान है। हैरत की बात यह है कि जिम्मेदारों में इसका कोई मलाल भी नहीं दिखता। यह मंदिर स्त्री शक्ति और प्रतिरोध का प्रतीक है। यह एक कर्मकांडीय मंदिर नहीं जहां लोग मन्नतें मागने और मत्था टेकने आते हैं बल्कि यह बलिदान की भूमि है जो अपने प्रामाणिक पहचान के संकट से जूझ रही है।
क्या कहते हैं विशेषज्ञ -
पुरातत्व विभाग (ASI) के निदेशक सिद्धा से हुई चर्चा में इस स्थल के सामरिक महत्व पर तो सहमति बनी, किंतु लिखित साक्ष्यों के अभाव को एक बड़ी चुनौती माना गया। जम्मू विश्वविद्यालय में इतिहास विभाग की विभागाध्यक्ष सुमन जामवाल के अनुसार, जम्मू के स्थानीय इतिहास में ऐसे कई 'मिसिंग लिंक्स' हैं जिन्हें अब तक अकादमिक चर्चा का हिस्सा नहीं बनाया गया। वे महामाया मंदिर पर व्यापक शोध और उत्खनन की आवश्यकता पर बल देती हैं।
डोगरा आर्ट म्यूजियम के प्रभारी श्री मगोत्रा के साथ हुई बातचीत इस ओर इशारा करती है कि.इस पहाड़ी का सामरिक महत्व तो निर्विवाद है, लेकिन लिखित साक्ष्यों का अभाव एक शोधपरक चुनौती है। इतिहास केवल कागजों पर नहीं, लोगों के दिलों में भी जिंदा रहता है, और महामाया इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं। जहां इतिहास मौन होता है वहां जनश्रुतियां मशाल बनकर पथ प्रदर्शन करती हैं। पर महामाया का वनवास तो तब खत्म होगा जब इतिहास उसे स्वर्णाक्षरों में दर्ज करे।
इतिहासविद प्रोफेसर पूनम चौधरी डा. अशोक जेरथ की पुस्तक डोगरा लीजेंड्स ऑफ आर्ट एंड कल्चर और द स्प्लेंडर ऑफ हिमालयन आर्ट एंड कल्चर का उल्लेख करते हुए बताती हैं कि इस पुस्तक में जेरथ ने महामाया को एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व के रूप में वर्णित किया है। डॉ जेरथ लिखते हैं कि महामाया एक डोगरा वीरांगना थीं जिन्होंने लगभग 1400 वर्ष पूर्व विदेशी आक्रांताओं के विरुद्ध युद्ध किया था। डा. जेरथ इसे केवल एक मिथक नहीं बल्कि एक क्षेत्रीय रक्षक की लोक स्मृति मानते हैं।
ASI डायरेक्टर के अनुसार, इस पहाड़ी की भौगोलिक स्थिति प्राचीन काल में रक्षा पंक्ति का हिस्सा हो सकती है पर यह दावे के साथ नहीं कहा जा सकता। इसके लिए शोध की आवश्यकता है।
प्रामाणिक निर्माण
वर्तमान मंदिर की संरचना अपेक्षाकृत नई है। कहा जाता है कि महाराजा गुलाब सिंह (19वीं शताब्दी) को स्वप्न में देवी के दर्शन हुए थे, जिसके बाद उन्होंने तवी नदी के किनारे पड़ी प्राचीन मूर्तियों को पर्वत पर स्थापित करवाकर मंदिर का निर्माण करवाया।
जीर्णोद्धार
मंदिर के वर्तमान पुजारी शिवाचंद कहते हैं कि मंदिर की पिंडी बहुत प्राचीन है। इसका समय नहीं बताया जा सकता। इसका कालखंड निर्धारित करने के लिए जिम्मेदार संस्थाओं को शोध करना चाहिए। वे बताते हैं, 1986 में भारी वर्षा के कारण पुराना ढांचा क्षतिग्रस्त हो गया था, जिसके बाद इसका पुनः निर्माण और सौंदर्यीकरण किया गया।
जम्मू रेलवे स्टेशन से दिशा और दूरी
यह मंदिर जम्मू तवी रेलवे स्टेशन से लगभग 4 से 5 किमीउत्तर-पूर्व की दिशा में जम्मू कटड़ा मार्ग पर स्थित है। यह मंदिर तवी नदी के दूसरे छोर पर बाहू किले के पीछे एक ऊंची पहाड़ी पर बना है।
शिव-शक्ति का सेतु: पीर खो और महामाया का अंतर्संबंध:
जम्मू सदियों से आस्था केंद्र रहा हैं। जम्मू की भौगोलिक बनावट केवल पहाड़ों का उतार-चढ़ाव नहीं, बल्कि आध्यात्म का एक चुंबकत्व क्षेत्र भी है। इसके जर्रे जर्रे में आध्यात्मिक ऊर्जा प्रवहमान है। तवी के तट पर स्थित पीर खो और महामाया मंदिर के बीच का जुड़ाव 'पाताल' और 'आकाश' के मिलन जैसा प्रतीत होता है। जहाँ पीर खो (जामवंत गुफा) धरती की गहराइयों में समाया एक साधना का केंद्र है, वहीं उसके ठीक सामने पहाड़ी की सर्वोच्च चोटी पर स्थित महामाया मंदिर एक जाग्रत प्रहरी की भांति खड़ा है। यह शिव (पीर खो) और शक्ति (महामाया) का वह मौन संवाद है, जो सदियों से तवी की लहरों के ऊपर चलता आ रहा है।
प्राचीन काल में भक्त तवी की धारा को पार कर इन दोनों छोरों को अपनी आस्था से जोड़ते थे, जिसे आज आधुनिक 'रोपवे' से जोड़ा गया है। यह केबल कार केवल दो पहाड़ियों को नहीं जोड़ती, बल्कि पीर खो की शांत गुफा से महामाया के शौर्य शिखर तक की उस यात्रा को सुगम बनाती है, जो जम्मू के सांस्कृतिक और सामरिक इतिहास का आधार रही है। यदि पीर खो जम्मू की रहस्यात्मक गहराई है, तो महामाया उसकी ऊंचाई है, और इन दोनों के बीच बहती तवी इस 'आध्यात्मिक संगम' की गौरवगाथा अपनी शांत लहरों में समेटे हुए मौन साक्षी बनी हुई है। उसे इंतजार है ऐसे कद्रदानों और जिज्ञासुओं की जो इस समृद्ध विरासत को अतीत के धुंध से बाहर लाए।
उपेक्षा का शिकार पर्यटन
पीर खो से रोपवे के जरिए सीधे जुड़े होने के बावजूद, महामाया मंदिर पर्यटन मानचित्र पर वह स्थान नहीं पा सका जिसका यह हकदार है। बावे वाली माता मंदिर के ठीक सामने स्थित होने के बाद भी यहाँ सन्नाटा पसरा रहता है। बुनियादी सुविधाओं का अभाव और ऐतिहासिक शोध की कमी इस उपेक्षा को और गहरा करती है।
महामाया उर्फ मोह माया जे जुड़ी हमारी पड़ताल में कुछ सवाल उठे हैं। एक - क्या हम अपनी विरासत को केवल किंवदंतियों के सहारे छोड़ देंगे? महामाया मंदिर के पत्थर आज गवाही और अपनी पुख्ता पहचान मांग रहे हैं। यदि प्रशासन और पुरातत्व विभाग इस ओर ध्यान दें, तो तवी का यह तट न केवल एक बड़ा पर्यटन केंद्र बन सकता है, बल्कि जम्मू को अपनी उस खोई हुई वीरांगना की पहचान भी वापस मिल सकती है।
केवल मंदिर नहीं, हमारी विरासत का वजूद है महामाया:
आज जब हम जम्मू को 'स्मार्ट सिटी' और 'टूरिज्म हब' बनाने की बात करते हैं, तो महामाया जैसे ऐतिहासिक स्थल की उपेक्षा हमारी सांस्कृतिक चेतना पर एक प्रश्नचिह्न लगाती है। यह केवल पत्थर की दीवारों और एक शिखर का मामला नहीं है, यह उस वीरांगना के प्रति हमारे कृतघ्न होने का प्रमाण है जिसने इस माटी के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया।
यदि बाहू किला जम्मू का 'मस्तक' है, तो महामाया उसकी 'आत्मा' है। तवी के एक तट पर रौनक बसेराऔर दूसरे पर गुमनामी का सन्नाटा यह असंतुलन समाप्त होना चाहिए। महामाया मंदिर में वह सामर्थ्य है कि वह न केवल जम्मू के पर्यटन मानचित्र पर एक नया अध्याय लिख सके, बल्कि नई पीढ़ी को डोगरा शौर्य की उस गाथा से भी जोड़ सके जो किताबी पन्नों से गायब है।
समय आ गया है कि सरकार और प्रशासन इस 'सुप्त धरोहर' को जागृत करें। रोपवे की ऊंचाई से केवल शहर का विहंगम नजारा देखना काफी नहीं है, जरूरत है उस गहराई में उतरने की जहां हमारा गौरवशाली इतिहास दबा पड़ा है। यदि आज हम अपनी इस 'रणनीतिक और आध्यात्मिक विरासत' को सहेजने में विफल रहे, तो आने वाली पीढ़ियां हमें इस बात के लिए गुनहगार ठहराएंगी कि हमने देश के लिए अपना प्राण उत्सर्ग करने वाली वीरांगना को गुमनामी के अंधेरे में क्यों छोड़ दिया?
लेखक की पड़ताल, क्या कहते हैं रिकॉर्ड्स?
पुस्तकालय: केवल द्वितीयक स्रोतों में सीमित उल्लेख।
विश्वविद्यालय: किसी विस्तृत शोध या थीसिस का अभाव।
पुरातत्व विभाग: पहाड़ी का सामरिक महत्व निर्विवाद, पर आधिकारिक उत्खनन की प्रतीक्षा।
वर्तमान स्थिति और उपेक्षा
जम्मू कश्मीर की इतनी विशिष्ट धरोहर का जैसा रख-रखाव होना चाहिए वैसा दिखता नहीं। यहां पर्यटकों के लिहाज से मूलभूत ढांचा तो खड़ा कर दिया गया है मगर मेंटिनेंस के अभाव में बिखर रहा है। कैंटीन के लिए बना भवन टूट रहा है। उसे ठीक कराने के बजाय बाहर लिख दिया गया है , यहां प्रवेश वर्जित है। ऐसा करने के पीछे अपनी कमियों पर पर्दा डालना ही मकसद प्रतीत होता है। बिजली के तार और खंभे तो हैं मगर बल्ब नहीं नजर आते। ऐसे में शाम के समय यहां लोग आने से कतराते हैं। बंदरों से बचें - जम्मू कटड़ा हाइवे से कटकर मंदिर के लिए बनी लिंक रोड पर बंदरों का बसेरा है। सावधानी न होने पर ये सामान छीन सकते हैं।
पर्यटन के लिहाज से विकास की आवश्यकताएं
महामाया मंदिर को 'बावे वाली माता के समकक्ष विकसित करने के लिए निम्नलिखित बुनियादी ढांचे और नीतियों की आवश्यकता है
कनेक्टिविटी और पहुंच रोपवे शुरू हो गई है, लेकिन मंदिर तक जाने वाली सड़क संकरी है। इसे चौड़ा करने और पार्किंग की बेहतर व्यवस्था की जरूरत है।
लाइट एंड साउंड शो
चूंकि महामाया एक वीरांगना थीं, इसलिए उनकी कहानी को दिखाने के लिए शाम के समय 'लाइट एंड साउंड शो' (जैसा कि बाहू किले में प्रस्तावित है) शुरू किया जाना चाहिए।
सौंदर्यीकरण और लैंडस्केपिंग
तवी नदी के किनारे होने के कारण यहां से 'सनसेट पॉइंट' और 'रिवर फ्रंट व्यू' बहुत सुंदर दिखता है। यहां बैठने के लिए बेंच, बगीचे और वॉकिंग पाथ का विकास होना चाहिए।
प्रचार-प्रसार
मंदिर को 'जम्मू सर्किट' (बाहु फोर्ट, महामाया, पीर खो अमर महल) के प्रमुख हिस्से के रूप में विकसित किया जाना चाहिए।
सुविधाएं
पेयजल, शौचालय, और भक्तों के लिए विश्राम गृह की स्थिति सुधारने की आवश्यकता है।
बावे वाली माता मंदिर के साथ इसका ऐतिहासिक संबंध होने के बाद भी यह स्थान उपेक्षित है। जनश्रुतियों के मुताबिक बावे वाली माता के दर्शन के बाद महामाया का दर्शन शुभ माना जाता है।
सुझाव
महामाया मंदिर को एक 'उपेक्षित स्मारक' से उठाकर जम्मू की 'सांस्कृतिक राजधानी' के रूप में स्थापित करने के लिए एक सशक्त प्रयास की आवश्यकता है।