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उच्च सुरक्षा प्रणाली की एकल विक्रेता से खरीद पर कैग गंभीर
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जम्मू। कैग ने अपनी रिपोर्ट में उच्च स्तरीय सुरक्षा प्रणाली की खरीद में दरों और व्यय का पता लगाए बिना गृह विभाग की एकल विक्रेता खरीद को गंभीरता से लिया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि पीएमडीपी के तहत केंद्र सरकार ने 2016-2017 में कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए उच्च सुरक्षा प्रणाली की खरीद के लिए 500 करोड़ रुपये से अधिक की मंजूरी दी थी, जिसमें से 2019 तक केवल 52 प्रतिशत धन का उपयोग किया गया था। 2016 से 2019 की अवधि के दौरान जम्मू-कश्मीर सरकार ने 501.86 करोड़ रुपये जारी किए, जिसमें से गृह विभाग द्वारा 261.96 करोड़ रुपये (52 प्रतिशत) खर्च किया गया। इस अवधि के दौरान उपलब्ध धन की तुलना में व्यय का प्रतिशत क्रमश: 50 और 85 प्रतिशत के बीच था। व्यय की गई शेष राशि अप्रैल 2017 तक 2.77 करोड़ रुपये से बढ़कर मार्च 2019 के अंत में 79.78 करोड़ रुपये हो गई। इसके अलावा 2019-20 के दौरान परियोजना के तहत भारत सरकार द्वारा 119 करोड़ रुपये की राशि स्वीकृत की गई थी और विभाग द्वारा 29.77 करोड़ रुपये खर्च किए गए थे। शेष 89.23 करोड़ रुपये 31 मार्च 2020 तक बिना प्रयोग के रह गए। कैग ने कहा कि वर्ष 2020-21 (अगस्त 2020 तक) के दौरान केंद्र सरकार द्वारा 25.15 करोड़ रुपये की राशि जारी की गई थी, जिसमें से अगस्त 2020 तक कोई खर्च नहीं किया गया था।
विशेष फर्मों से खरीददारी में 9.20 करोड़ का अधिक व्यय
कैग ने यह भी बताया कि अभिलेखों की लेखापरीक्षा जांच से पता चला कि विभाग ने विशेष फ र्मों और एकल विक्रेता से खरीदारी की थी जिसके परिणामस्वरूप 9.20 करोड़ रुपये का अतिरिक्त व्यय हुआ। विभाग ने अशोक लीलैंड लिमिटेड से उच्च दरों पर सात एमबीपी वाहन खरीदे जिससे अतिरिक्त खर्च हुआ। एमबीपी वाहनों के लिए टाटा मोटर्स लिमिटेड द्वारा कम दरों की पेशकश के बावजूद वाहनों को अशोक लीलैंड डिफेंस सिस्टम्स लिमिटेड से उच्च दरों पर खरीदा गया। हालांकि विभाग ने दलील दी थी कि दोनों फ र्मों के साथ आपूर्ति आदेश देने की प्रक्रिया स्वयं विरोधाभासी थी। इस तरह की खरीद में तात्कालिकता की प्रकृति को देखते हुए विभाग उच्च सुरक्षा प्रणाली की खरीद में एक सुव्यवस्थित प्रक्रिया अपना सकता था।
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विशेष फर्मों से खरीददारी में 9.20 करोड़ का अधिक व्यय
कैग ने यह भी बताया कि अभिलेखों की लेखापरीक्षा जांच से पता चला कि विभाग ने विशेष फ र्मों और एकल विक्रेता से खरीदारी की थी जिसके परिणामस्वरूप 9.20 करोड़ रुपये का अतिरिक्त व्यय हुआ। विभाग ने अशोक लीलैंड लिमिटेड से उच्च दरों पर सात एमबीपी वाहन खरीदे जिससे अतिरिक्त खर्च हुआ। एमबीपी वाहनों के लिए टाटा मोटर्स लिमिटेड द्वारा कम दरों की पेशकश के बावजूद वाहनों को अशोक लीलैंड डिफेंस सिस्टम्स लिमिटेड से उच्च दरों पर खरीदा गया। हालांकि विभाग ने दलील दी थी कि दोनों फ र्मों के साथ आपूर्ति आदेश देने की प्रक्रिया स्वयं विरोधाभासी थी। इस तरह की खरीद में तात्कालिकता की प्रकृति को देखते हुए विभाग उच्च सुरक्षा प्रणाली की खरीद में एक सुव्यवस्थित प्रक्रिया अपना सकता था।
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