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Jammu Kashmir Election: जम्मू कश्मीर का चुनावी इतिहास, नेकां की जीत और विवाद, 1951 से लेकर आज तक

Mon, 23 Sep 2024 01:26 PM IST
निकिता गुप्ता अमर उजाला नेटवर्क, जम्मू
अमर उजाला नेटवर्क, जम्मू Published by: निकिता गुप्ता Updated Mon, 23 Sep 2024 01:26 PM IST
सार

जम्मू-कश्मीर के चुनावों का इतिहास 1951 से लेकर अब तक अनूठा और विवादास्पद रहा है, जिसमें नेकां के निर्विरोध चुनाव और प्रजा परिषद के बहिष्कार जैसे घटनाक्रम शामिल हैं।

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Jammu Kashmir Election: Election history of Jammu and Kashmir, NC's victory and controversies, from 1951 till
जम्मू कश्मीर का चुनावी इतिहास - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनावों का इतिहास अद्वितीय और विवादास्पद रहा है। 1951 में संविधान सभा के चुनावों में, नेशनल कॉन्फ्रेंस (नेकां) के सभी 73 प्रत्याशी निर्विरोध चुन लिए गए थे, जो किसी भी राज्य के लिए एक मिसाल है। उस समय, प्रजा परिषद ने चुनावों का बहिष्कार करते हुए अनैतिक गतिविधियों और प्रशासनिक हस्तक्षेप का आरोप लगाया था।

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चुनाव आयोग के रिकॉर्ड के अनुसार, 1957 में हुए पहले विधानसभा चुनाव में कुल 75 सीटों में से 47 प्रत्याशी निर्विरोध चुने गए, जिसमें नेकां ने 69 सीटें हासिल कीं। इसके बाद, 1962 में 33 प्रत्याशी निर्विरोध हो गए और नेकां के खाते में 68 सीटें आईं। 1967 में कांग्रेस के गुलाम मोहम्मद सादिक मुख्यमंत्री बने और इस चुनाव में पहली बार 118 प्रत्याशियों के पर्चे खारिज होने का रिकॉर्ड बना।
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1972 के चुनावों में, निर्दलीय उम्मीदवारों का सिलसिला थमा और कांग्रेस के सैयद मीर कासिम 58 सीटों के साथ मुख्यमंत्री बने। इस चुनाव में जनमत संग्रह मोर्चा पर प्रतिबंध लगाया गया था। 1987 में, भाजपा ने पहली बार विधानसभा में दो विधायक जीतकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। 1996 में, विधानसभा की सीटें 76 से बढ़कर 87 हो गईं, और भाजपा की ताकत बढ़कर आठ विधायकों तक पहुंच गई। इस चुनाव में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ने भी चार सीटों पर जीत हासिल की।

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2002 के चुनाव में पहली बार ऐसा हुआ कि किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिला। नेकां सबसे बड़ा दल बनकर उभरी, लेकिन कांग्रेस के सहयोग से पीडीपी के मुफ्ती मोहम्मद सईद मुख्यमंत्री बने। इसके बाद, 2014 तक किसी भी पार्टी को पूर्ण बहुमत नहीं मिल पाया।

रेखा चौधरी, राजनीतिक मामलों की विशेषज्ञ, कहती हैं कि 13 पर्चे खारिज होने के बाद प्रजा परिषद ने कुछ नाम खुद ही वापस लेकर चुनाव का बहिष्कार कर दिया था। इसके परिणामस्वरूप नेकां सत्ता में आई और सदन में विपक्ष की कमी का लाभ उठाया। इस दौरान, प्रजा परिषद ने सड़कों पर विरोध प्रदर्शन किया और शेख अब्दुल्ला पर डोगरा विरोधी होने का आरोप लगाया। विवाद बढ़ने पर, केंद्र सरकार ने 1953 में शेख अब्दुल्ला को पद से हटाकर जेल भेज दिया। इस प्रकार, जम्मू-कश्मीर के चुनावों का इतिहास केवल चुनावों का नहीं, बल्कि राजनीतिक और सामाजिक बदलाव का भी गवाह है।

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