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Jammu News: ''कफन'' में दिखे मानवीय मूल्य, कलाकारों ने करवाया आभास
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टांगे वाली गली स्थित नटरंग स्टूडियो में नाटक कफन के एक दृश्य मेें प्रस्तुति देते रंगकर्मी। स्
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नटरंग की ओर से टांगे वाली गली स्थित स्टूडियो में मुंशी प्रेमचंद की प्रसिद्ध लघुकथा पर आधारित नाटक का मंचन
अमर उजाला ब्यूरो
जम्मू। शहर के टांगे वाली गली स्थित नटरंग स्टूडियो में कहानीकार व उपन्यासकार मुंशी प्रेमचंद की प्रसिद्ध लघुकथा कफन पर आधारित नाटिका का मंचन किया गया। इसमें कलाकारों ने दर्शाया कि गरीबी समाज में अभिशाप के साथ-साथ एक व्यंग्य भी है। कलाकारों ने कला के द्वारा मानवीय मूल्यों का भी आभास करवाया।
लघु नाटिका पिता-पुत्र व पुत्रवधू के इर्दगिर्द घूमती है। बेहतर संवाद के साथ नाटक का मंचन दर्शकों को झकझोर गया। इसमें दिखाया गया कि एक पिता और बेटा एक गांव में नौकरी करते हैं। बेटे की पत्नी यानि पुत्रवधू गर्भावस्था के अंतिम चरण में है और उसे चिकित्सा की आवश्यकता है। परिवार आर्थिक तौर पर कमजोर है और खर्च चलाने में असहाय महसूस कर रहा है।
बहू प्रसव दर्द से चिल्लाती है। पिता (घीसू) और बेटा (माधव) असहाय होकर बस उसे देखते रहते हैं। थोड़ी देर बाद ही बहू की मृत्यु हो जाती है। उसके बाद पिता और बेटे की समस्याएं और बढ़ जाती हैं। अत्यधिक गरीबी और निराशा में डूबे दोनों पिता-पुत्र इस कदर असहाय हैं कि उनके पास बहू के अंतिम संस्कार के लिए न तो पैसे हैं और न ही साधन है।
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बहू की लाश को देखकर घीसू व बेटा माधव गांव वालों से कुछ आर्थिक मदद मांगते हैं, जो काफी प्रयासों के बाद उन दोनों को मिलती है। जब मृत बहू के लिए कफन खरीदने की बात आती है तो दोनों अपना मन बदल लेते हैं और उस दान के पैसे से शराब खरीदते हैं।
अपनी पापी आत्माओं को समझाते हैं कि एक मृत महिला उस कपड़े के टुकड़े का क्या करेगी। उसे आशीर्वाद के अलावा कुछ नहीं चाहिए। नाटक में अभिनय व संवाद अदायगी ने भावनात्मक रूप से सभी दर्शकों को जोड़े रखा। नाटक का निर्देशन नीरज कांत ने किया। इसमें संकेत भगत, शिवम, आर्यन शर्मा, कार्तिक कुमार ने बेजोड़ अभिनय किया।
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अमर उजाला ब्यूरो
जम्मू। शहर के टांगे वाली गली स्थित नटरंग स्टूडियो में कहानीकार व उपन्यासकार मुंशी प्रेमचंद की प्रसिद्ध लघुकथा कफन पर आधारित नाटिका का मंचन किया गया। इसमें कलाकारों ने दर्शाया कि गरीबी समाज में अभिशाप के साथ-साथ एक व्यंग्य भी है। कलाकारों ने कला के द्वारा मानवीय मूल्यों का भी आभास करवाया।
लघु नाटिका पिता-पुत्र व पुत्रवधू के इर्दगिर्द घूमती है। बेहतर संवाद के साथ नाटक का मंचन दर्शकों को झकझोर गया। इसमें दिखाया गया कि एक पिता और बेटा एक गांव में नौकरी करते हैं। बेटे की पत्नी यानि पुत्रवधू गर्भावस्था के अंतिम चरण में है और उसे चिकित्सा की आवश्यकता है। परिवार आर्थिक तौर पर कमजोर है और खर्च चलाने में असहाय महसूस कर रहा है।
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बहू प्रसव दर्द से चिल्लाती है। पिता (घीसू) और बेटा (माधव) असहाय होकर बस उसे देखते रहते हैं। थोड़ी देर बाद ही बहू की मृत्यु हो जाती है। उसके बाद पिता और बेटे की समस्याएं और बढ़ जाती हैं। अत्यधिक गरीबी और निराशा में डूबे दोनों पिता-पुत्र इस कदर असहाय हैं कि उनके पास बहू के अंतिम संस्कार के लिए न तो पैसे हैं और न ही साधन है।
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बहू की लाश को देखकर घीसू व बेटा माधव गांव वालों से कुछ आर्थिक मदद मांगते हैं, जो काफी प्रयासों के बाद उन दोनों को मिलती है। जब मृत बहू के लिए कफन खरीदने की बात आती है तो दोनों अपना मन बदल लेते हैं और उस दान के पैसे से शराब खरीदते हैं।
अपनी पापी आत्माओं को समझाते हैं कि एक मृत महिला उस कपड़े के टुकड़े का क्या करेगी। उसे आशीर्वाद के अलावा कुछ नहीं चाहिए। नाटक में अभिनय व संवाद अदायगी ने भावनात्मक रूप से सभी दर्शकों को जोड़े रखा। नाटक का निर्देशन नीरज कांत ने किया। इसमें संकेत भगत, शिवम, आर्यन शर्मा, कार्तिक कुमार ने बेजोड़ अभिनय किया।