{"_id":"67897a79cc7373a74c0aa6e8","slug":"jammu-culture-katha-pounichak-jammu-news-c-385-1-ja21004-105214-2025-01-17","type":"story","status":"publish","title_hn":"निस्काम भाव से प्रभु को स्मरण करने से मिटते हैं कष्ट : शास्त्री","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
निस्काम भाव से प्रभु को स्मरण करने से मिटते हैं कष्ट : शास्त्री
Fri, 17 Jan 2025 03:00 AM IST
जम्मू और कश्मीर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, जम्मू
संवाद न्यूज एजेंसी, जम्मू
Updated Fri, 17 Jan 2025 03:00 AM IST
विज्ञापन
श्रीराधा-कृष्ण मंदिर में श्रीमद्भागवत कथा का तीसरा दिन
संवाद न्यूज एजेंसी
दोमाना। निस्काम भाव से प्रभु का स्मरण करने से जहां सभी कष्ट मिट जाते हैं वहीं, लोग अपना जन्म और मरण दोनों सुधार लेते हैं। यह ज्ञान कथावाचक मृदुल मोहन शास्त्री ने वीरवार को श्रीराधा-कृष्ण मंदिर पौनीचक में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के तीसरे दिन संगत को दिया।
मनुष्यों का क्या कर्तव्य है। इसका बोध श्रीमद्भागवत कथा सुनकर ही होता है। विडंबना है कि मृत्यु निश्चित होने के बाद भी हम उसे स्वीकार नहीं करते हैं। प्रभु जब अवतार लेते हैं तो माया के साथ आते हैं।
साधारण मनुष्य माया को शाश्वत मान लेता है और अपने शरीर को प्रधान मान लेता है, जबकि शरीर नश्वर है। उन्होंने कहा कि श्रीमद्भागवत बताता है कि कर्म ऐसा करो जो निस्काम हो और जहां सच्ची भक्ति है। श्रीमद्भागवत कथा जीवन के सत्य का ज्ञान कराने के साथ ही धर्म और अधर्म के बीच के फर्क को बताती है।
विज्ञापन
विज्ञापन
संवाद न्यूज एजेंसी
दोमाना। निस्काम भाव से प्रभु का स्मरण करने से जहां सभी कष्ट मिट जाते हैं वहीं, लोग अपना जन्म और मरण दोनों सुधार लेते हैं। यह ज्ञान कथावाचक मृदुल मोहन शास्त्री ने वीरवार को श्रीराधा-कृष्ण मंदिर पौनीचक में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के तीसरे दिन संगत को दिया।
मनुष्यों का क्या कर्तव्य है। इसका बोध श्रीमद्भागवत कथा सुनकर ही होता है। विडंबना है कि मृत्यु निश्चित होने के बाद भी हम उसे स्वीकार नहीं करते हैं। प्रभु जब अवतार लेते हैं तो माया के साथ आते हैं।
विज्ञापन
साधारण मनुष्य माया को शाश्वत मान लेता है और अपने शरीर को प्रधान मान लेता है, जबकि शरीर नश्वर है। उन्होंने कहा कि श्रीमद्भागवत बताता है कि कर्म ऐसा करो जो निस्काम हो और जहां सच्ची भक्ति है। श्रीमद्भागवत कथा जीवन के सत्य का ज्ञान कराने के साथ ही धर्म और अधर्म के बीच के फर्क को बताती है।
विज्ञापन