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Jammu News: संकल्प की रोशनी से दूर किया जिंदगी का अंधेरा
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गुलशन ग्राउंड जम्मू में चल रहे दिव्य कला मेले में अपने स्टाल पर मौजूद श्रीनगर से आईं सुमार्ती।
दिव्य कला मेले में ऐसे-ऐसे हुनरमंद, जो हैं हम सभी के लिए मिसाल
अमर उजाला ब्यूरो
जम्मू। दिव्यांगता उनके लिए अभिशाप नहीं, कमियों की उन्हें परवाह नहीं। उनमें हुनर है, दृढ़ इच्छाशक्ति है और इसी के दम पर उन्होंने अपनी ही नहीं बल्कि औरों की जिंदगी को भी रोशन किया है। हौसलों से भरे ऐसे लोगों का जमावड़ा इन दिनों गुलशन ग्राउंड में चल रहे दिव्य कला मेले में है। नगरोटा की रहने वाली सीता देवी, किश्तवाड़ की सनम डोलमा और कश्मीर के जावेद ऐसे ही कुछ उदाहरण हैं। अमर उजाला ने उनसे जानने की कोशिश की कि दिव्यांगता के बावजूद उन्होंने खुद को इस मुकाम तक कैसे पहुंचाया।
बचपन में ही चली गई थी एक आंख की रोशनी
नगरोटा के प्रकालदा गांव की रहने वाली सीता देवी घर पर ही सूट-शॉल स्वेटर बनाकर उन्हें बेचती हैं और यही उनकी आजीविका का साधन है। कहती हैं कि वह बहुत छोटी थीं, उन्हें मालूम ही नहीं था कि उन्हें एक आंख से नहीं दिख रहा। परिवार वालों ने जांच कराई तो पता चला कि मेरी एक आंख हमेशा ऐसी ही रहेगी। बड़ी हुई तो आजीविका का प्रश्न सामने था। लड़कियों में कमियां तो समाज भी स्वीकार नहीं करता है। अब कर भी कुछ नहीं सकते थे। अपने आपको समझाया, खुद को बेचारी समझना बंद किया और तय कर लिया कि अपना सहारा खुद ही बनूंगी। हैंडीक्राफ्ट का प्रशिक्षण लिया और अपना काम घर से ही शुरु किया। धीरे-धीरे उत्पाद बढ़ाए। गुलशन ग्राउंड में वे अपने बनाए सामान बिक्री के लिए लेकर आई हैं। कहती हैं कि आज मेरे इस काम के कारण 30 अन्य महिलाओं को रोजगार मिला हुआ है। पांच साल पहले काम शुरू किया था, पहली बार मेले में स्टाॅल लगाया है। कहती है कि ताने भी खूब मिले थे, पर घबराई नहीं खुद। कहती हैं कि समाज के तानों से किसी महिला को घबराना नहीं चाहिए। खुद को हमेशा नए कार्य के लिए तैयार रखने में ही प्रगति का रास्ता निकलता है।
एक दुर्घटना में पैर खराब हुआ...पर जिंदगी के सफर पर दौड़ पड़ीं
किश्तवाड़ में रहने वाली सनम डलमा बताती हैं कि बचपन में ही पैर दुर्घटनाग्रस्त हो गया। आर्टफिशियल ज्वैलरी का काम सीखा सिखाया। घर पर पापा हैंडीक्राफ्ट का काम करते थे, बड़ी हुई तो उनके ही काम को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया है। कहती हैं कि उनके स्टॉल पर शाॅल,मोजे, स्वेटर व महिलाओं के श्रंगार से संबंधित चीजें हैं। वह बचपन में गिर गई थीं, जिससे उनको चलने में परेशानी है। दूसरी महिलाओं को भी रोजगार दिया है। अभी काफी छोटा काम है जिसे और आगे बढ़ाना है।
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तीन वर्ष की उम्र में पोलियो ने छीन लीं खुशियां
कश्मीर के रहने वाले जोवद अहमद शेख करीब 20 वर्ष से अधिक समय से हैंडीक्राफ्ट, कश्मीरी पशमीना शाल पर परंपरागत बुनाई का काम करते हैं। कहते हैं कि तीन वर्ष की उम्र में पोलियोग्रस्त हुए। वर्ष 2002 से काम कर रहे हैं। इसके पहले इंडिया गेट, प्रगति मैदान नई दिल्ली, सूजरकुंड मेला हरियाणा में भी लगाई गई प्रदर्शनी में भाग ले चुके हैं। यहां पर दिव्य कला मेले में पहली बार आए हैं। दो दिन में बिक्री का माहौल बन गया है। ग्राहक आ रहे हैं और कश्मीर के बने शाल व सूट पसंद कर रहे हैं।
जावेद अहमद शेख को वर्ष 2022 में यूटी हैंडीक्राफ्ट अवार्ड से उपराज्यपाल ने सम्मानित किया था। जिसमें 20 हजार रुपये व सरकार की तरफ से आजीवन आठ हजार रुपये की पेंशन मिल रही है। वह इस प्रतियोगिता में तीसरे स्थान पर रहे थे। उनके पास तीन लाख रुपये तक की पशमीना शाल है। जिसे वह अभी तैयार कर रहे हैं। हर महीने 30 हजार रुपये कमा लेते हैं। कुल 17 लोगों को रोजगार से जोड़ा है, कोशिश है कि दिव्यांग लोगों की संख्या और बढ़े जो स्वरोजगार को अपना सकें। बचपन में ही तीन वर्ष की उम्र में वह पोलियो की चपेट में आए थे। जिससे उनको चलने में काफी परेशानी होती है।
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अमर उजाला ब्यूरो
जम्मू। दिव्यांगता उनके लिए अभिशाप नहीं, कमियों की उन्हें परवाह नहीं। उनमें हुनर है, दृढ़ इच्छाशक्ति है और इसी के दम पर उन्होंने अपनी ही नहीं बल्कि औरों की जिंदगी को भी रोशन किया है। हौसलों से भरे ऐसे लोगों का जमावड़ा इन दिनों गुलशन ग्राउंड में चल रहे दिव्य कला मेले में है। नगरोटा की रहने वाली सीता देवी, किश्तवाड़ की सनम डोलमा और कश्मीर के जावेद ऐसे ही कुछ उदाहरण हैं। अमर उजाला ने उनसे जानने की कोशिश की कि दिव्यांगता के बावजूद उन्होंने खुद को इस मुकाम तक कैसे पहुंचाया।
बचपन में ही चली गई थी एक आंख की रोशनी
नगरोटा के प्रकालदा गांव की रहने वाली सीता देवी घर पर ही सूट-शॉल स्वेटर बनाकर उन्हें बेचती हैं और यही उनकी आजीविका का साधन है। कहती हैं कि वह बहुत छोटी थीं, उन्हें मालूम ही नहीं था कि उन्हें एक आंख से नहीं दिख रहा। परिवार वालों ने जांच कराई तो पता चला कि मेरी एक आंख हमेशा ऐसी ही रहेगी। बड़ी हुई तो आजीविका का प्रश्न सामने था। लड़कियों में कमियां तो समाज भी स्वीकार नहीं करता है। अब कर भी कुछ नहीं सकते थे। अपने आपको समझाया, खुद को बेचारी समझना बंद किया और तय कर लिया कि अपना सहारा खुद ही बनूंगी। हैंडीक्राफ्ट का प्रशिक्षण लिया और अपना काम घर से ही शुरु किया। धीरे-धीरे उत्पाद बढ़ाए। गुलशन ग्राउंड में वे अपने बनाए सामान बिक्री के लिए लेकर आई हैं। कहती हैं कि आज मेरे इस काम के कारण 30 अन्य महिलाओं को रोजगार मिला हुआ है। पांच साल पहले काम शुरू किया था, पहली बार मेले में स्टाॅल लगाया है। कहती है कि ताने भी खूब मिले थे, पर घबराई नहीं खुद। कहती हैं कि समाज के तानों से किसी महिला को घबराना नहीं चाहिए। खुद को हमेशा नए कार्य के लिए तैयार रखने में ही प्रगति का रास्ता निकलता है।
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एक दुर्घटना में पैर खराब हुआ...पर जिंदगी के सफर पर दौड़ पड़ीं
किश्तवाड़ में रहने वाली सनम डलमा बताती हैं कि बचपन में ही पैर दुर्घटनाग्रस्त हो गया। आर्टफिशियल ज्वैलरी का काम सीखा सिखाया। घर पर पापा हैंडीक्राफ्ट का काम करते थे, बड़ी हुई तो उनके ही काम को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया है। कहती हैं कि उनके स्टॉल पर शाॅल,मोजे, स्वेटर व महिलाओं के श्रंगार से संबंधित चीजें हैं। वह बचपन में गिर गई थीं, जिससे उनको चलने में परेशानी है। दूसरी महिलाओं को भी रोजगार दिया है। अभी काफी छोटा काम है जिसे और आगे बढ़ाना है।
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तीन वर्ष की उम्र में पोलियो ने छीन लीं खुशियां
कश्मीर के रहने वाले जोवद अहमद शेख करीब 20 वर्ष से अधिक समय से हैंडीक्राफ्ट, कश्मीरी पशमीना शाल पर परंपरागत बुनाई का काम करते हैं। कहते हैं कि तीन वर्ष की उम्र में पोलियोग्रस्त हुए। वर्ष 2002 से काम कर रहे हैं। इसके पहले इंडिया गेट, प्रगति मैदान नई दिल्ली, सूजरकुंड मेला हरियाणा में भी लगाई गई प्रदर्शनी में भाग ले चुके हैं। यहां पर दिव्य कला मेले में पहली बार आए हैं। दो दिन में बिक्री का माहौल बन गया है। ग्राहक आ रहे हैं और कश्मीर के बने शाल व सूट पसंद कर रहे हैं।
जावेद अहमद शेख को वर्ष 2022 में यूटी हैंडीक्राफ्ट अवार्ड से उपराज्यपाल ने सम्मानित किया था। जिसमें 20 हजार रुपये व सरकार की तरफ से आजीवन आठ हजार रुपये की पेंशन मिल रही है। वह इस प्रतियोगिता में तीसरे स्थान पर रहे थे। उनके पास तीन लाख रुपये तक की पशमीना शाल है। जिसे वह अभी तैयार कर रहे हैं। हर महीने 30 हजार रुपये कमा लेते हैं। कुल 17 लोगों को रोजगार से जोड़ा है, कोशिश है कि दिव्यांग लोगों की संख्या और बढ़े जो स्वरोजगार को अपना सकें। बचपन में ही तीन वर्ष की उम्र में वह पोलियो की चपेट में आए थे। जिससे उनको चलने में काफी परेशानी होती है।

गुलशन ग्राउंड जम्मू में चल रहे दिव्य कला मेले में अपने स्टाल पर मौजूद श्रीनगर से आईं सुमार्ती।

गुलशन ग्राउंड जम्मू में चल रहे दिव्य कला मेले में अपने स्टाल पर मौजूद श्रीनगर से आईं सुमार्ती।

गुलशन ग्राउंड जम्मू में चल रहे दिव्य कला मेले में अपने स्टाल पर मौजूद श्रीनगर से आईं सुमार्ती।