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J&K New Govt: जम्मू-कश्मीर में बदलाव की उम्मीद, रोजगार, सुरक्षा, नशा - नई सरकार के आगे ये तीन बड़ी चुनौतियां

Sun, 06 Oct 2024 02:37 PM IST
निकिता गुप्ता राहुल दुबे अमर उजाला, जम्मू
राहुल दुबे अमर उजाला, जम्मू Published by: निकिता गुप्ता Updated Sun, 06 Oct 2024 02:37 PM IST
सार

जम्मू-कश्मीर में नई सरकार के गठन के साथ ही कई चुनौतियां सामने खड़ी होंगी। रोजगार, सुरक्षा, नशा और विकास जैसे मुद्दे सरकार के लिए बड़ी परीक्षा होंगे।

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J&K New Govt: Hope of change in Jammu and Kashmir, employment, security, drug addiction - these three big chal
जम्मू कश्मीर विधानसभा चुनाव - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

आठ सितंबर को चुनावी परिणाम के साथ नई सरकार सामने होगी। बहुमत का जादुई आंकड़ा यदि कोई पार्टी नहीं छू सकी तो गठबंधन के साथ सत्ता में कोई न कोई दल काबिज होगा। सत्ता के जश्न के साथ चुनौतियों का ताज भी राज्य के नए मुख्यमंत्री, नौकरशाहों और सुरक्षा एजेंसियों के लिए होगा। सुरक्षा के साथ रोजगार का इंतजाम करना और निवेश राज्य में लाने के लिए सरकार को कड़ा संघर्ष करना होगा। राज्य में जो स्थितियां अब तक रहीं हैं, उसे देखते हुए कोई राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय कंपनी कश्मीर संभाग में निवेश नहीं करना चाहती है।

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पिछले कुछ सालों में पर्यटकों की संख्या बढ़ी है लेकिन उनके लिए अच्छे होटल और सुविधाएं अभी भी नहीं है। इसके लिए लगातार पर्यटक फीडबैक के जरिए मांग भी करते रहे हैं। वहीं पूरे राज्य में अब आतंकवाद पर तो नकेल कसी जा चुकी है, लेकिन नारको टेररिज्म नाम से एक नई चुनौती पहाड़ बनकर सामने खड़ी है। पाकिस्तान से आने वाली हेरोईन जिसे स्थानीय लोग चिट्टे कहते हैं, के नशे में जम्मू-कश्मीर का युवा जकड़ता जा रहा है। नशा चुनावों में मुख्य चर्चा में भी रहा। नशे के नेटवर्क को तोड़ना आने वाली सरकार के लिए बड़ी चुनौती रहने वाला है।
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बदलाव के इस दौर में राज्य के सामने चुनौतियां कम नहीं हुई हैं। पिछले कुछ सालों में विकास ने रफ्तार पकड़ी, लेकिन जिस तरह के कायाकल्प की जरूरत इस राज्य को है, उसके लिए यह रफ्तार नाकाफी है। युवाओं के सामने सबसे बड़ा मुद्दा रोजगार का है। सरकारी नौकरी के साथ जरूरत है बाहरी निवेश की। कंपनियों की, जो यहां के युवाओ को रोजगार दें। बाड़ी ब्राह्मणा में इंडस्ट्री लगाने वाले एक कारोबारी कहते हैं कि राज्य के साथ हुई बड़ी बैठकों में कंपनियों को कई बार कश्मीर संभाग में यूनिट लगाने के प्रस्ताव दिए गए, उन्होंने मना कर दिया। कारण एक ही है और वो है सुरक्षा।
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ऐसे में बाहरी निवेश लाना अभी सरकार के लिए बड़ी चुनौती रहेगा। उद्यमियों के दिमाग से श्रीनगर में होने वाली पत्थरबाजी और आगजनी की घटनाएं अभी तक निकली नहीं है। वहीं पिछले कुछ सालों में हताश आतंकी संगठनों ने अब जम्मू संभाग में हिंसा को बढ़ावा देना शुरू कर दिया है। इससे निपटने के लिए भी अलग रणनीति बनाने की जरूरत है। वहीं घाटी में आतंकवाद व नशे के गठजोड़ की चुनौती भी सामने आई है। इस पर व्यापक तरीके से सरकार को काम करना होगा।
पर्यटक और बढ़ाना, उन्हें सुविधाएं मुहैया कराना

अनुच्छेद 370 हटने के बाद पर्यटकों की आमद जम्मू और कश्मीर में तेजी से बढ़ी है। पिछले साल लगभग तीन करोड़ पर्यटक घाटी में पहुंचे। देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों के अनुरूप अभी प्रदेश में अच्छे होटलों की कमी है। यहां नए होटल शुरू नहीं हो सके। होटल इंडस्ट्री के मामले में कश्मीर का पूरा इलाका ही पिछड़ा हुआ है। इसके लिए सरकार तरह-तरह की योजनाएं भी लाई है ताकि होटल इंडस्ट्री में निवेश करने वालों को रियायत दी जा सके, लेकिन उसके बाद भी इस क्षेत्र में निवेश लगभग ठंडा पड़ा हुआ है।

सर्विस सेक्टर से हटकर इंडस्ट्री पर बढ़ानी होगी निर्भरता
आजादी के बाद से ही जम्मू-कश्मीर में सरकारें अस्थिर रही हैं। आतंकवाद, अलगाववाद की आग में अधिकतर हिस्सा झुलसता रहा है। यही कारण है कि यहां की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा सिर्फ सर्विस सेक्टर पर ही टिका रहा। एक आंकड़े के मुताबिक राज्य की अर्थव्यवस्था में करीब 30 फीसदी हिस्सा तो सर्विस सेक्टर का रहा है। ऐसे में जरूरी है कि राज्य सरकार को स्टार्टअप को आगे बढ़ाना होगा। युवाओ को नौकरी की जगह उद्योगों के लिए प्रोत्साहित करना होगा और उन्हें शुरूआती रियायतें भी देनी होंगी। राज्य में अलग-अलग सेक्टरों से पैसा आना शुरू होगा तो किसी एक क्षेत्र में निर्भरता खत्म हो जाएगी। इसके साथ ही घटते राजकोष को भी इसी से संभाला जा सकता है।

बड़े काश्तकारों के साथ छोटों को भी खेती के आधुनिक तरीकों से जोड़ना होगा
पिछले कुछ सालों में बड़े काश्तकार तो खेती के आधुनिक तरीकों से जुड़ गए लेकिन छोटे काश्तकार अभी भी पारंपरिक तरीके से खेती कर रहे हैं। एक विश्विद्यालय के सेवानिवृत्त प्रोफेसर के मुताबिक सेब, अखरोट या दलहन की फसलें पैदान करने वाले कुछ बड़े काश्तकारों को छोड़ दें तो अधिकतर अभी भी पुराने पारंपरिक तरीके से ही काम कर रहे हैं। कारण, सरकार ने खेती को लेकर यहां कभी बड़ी योजनाएं उस तरह से नहीं बनाईं जिस तरह से पोड़ोसी राज्य पंजाब या फिर हरियाणा में हैं। उन्होंने कहा कि सरकार यदि खेती के क्षेत्र में योजनाएं लाएं और किसानों को प्रशिक्षण देकर आधुनिक तरीके से खेती कराए तो अखरोट का रकबा एक लाख हेक्टयेर तक पहुंच सकता है और फलों की पैदावार दोगुनी हो सकती है।

कश्मीर में लाना होगा बाहरी निवेश
जम्मू में बड़ी छोटी मिलाकर करीब 600 से अधिक यूनिट हैं। यह इस राज्य की अर्थव्यवस्था की धुरी हैं, लेकिन इसका एक चौथाई निवेश भी कश्मीर में नहीं है। 100 के करीब छोटी-बड़ी यूनिट हैं भी तो वे सभी स्थानीय लोगों की हैं। कई पुश्तैनी काम तो बंद होने की कगार पर हैं जिनमें कालीन की कारीगरी प्रमुख है। श्रीनगर के उस्मान ने बताया कि श्रीनगर में गुलाब जल का बड़े स्तर पर एक ही व्यक्ति काम कर रहा है, लेकिन उसे भी सरकार ने आगे नहीं बढ़ाया। नतीजा यह निकला कि उस परिवार की नई पीढ़ी अब इस व्यवसाय से नहीं जुड़ी है। यह कारोबार भी अब बंद होने को है जबकि कश्मीर में फूलों की खेती बड़े स्तर पर होती है और इत्र का काम भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर है। इस इंडस्ट्री से भी सरकार को अर्थव्यवस्था में बड़ा योगदान मिल सकता है।

नशा-आतंकवाद-अलगाववाद के गठजोड़ को तोड़ना जरूरी
राज्य में अस्थिरता और बेरोजगारी के बीच पिछले दो दशक में एक और बड़ी चुनौती इस राज्य के सामने बनकर उभरी है। वह है, इसके अलगाववाद-आतंकवाद-नशे का गठजोड़। इससे निपटना इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि अभी भी कश्मीर में गाहे-बगाहे कश्मीर विवाद का मुद्दा उठता है। अनुच्छेद 370 की बहाली की मांग तो क्षेत्रीय दल भी कर रहे हैं। ऐसे में नशे के रास्ते से युवाओं को भटकाने की चाल चली जाती है। वही युवा इनके आंदोलन का हिस्सा बनते हैं।

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