J&K Election: न सिद्धु के चुटकले सुनाई दिए, न हुर्रियत के तल्ख बयान, प्रचारकों की यादों में संपन्न हुआ मतदान
जम्मू-कश्मीर के विधानसभा चुनाव में दिवंगत स्टार प्रचारकों की कमी महसूस की गई, जबकि पूर्व सीएम और हुर्रियत नेताओं की अनुपस्थिति ने चुनावी माहौल को प्रभावित किया।
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उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो, न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए...बशीर बद्र का यह शेर एक दशक बाद जम्मू-कश्मीर में हुए विधानसभा चुनावों की यादों पर सटीक बैठता है।
एक दशक पहले 2014 के विधानसभा चुनाव में पहुंचे स्टार प्रचारक कई नेता इस चुनाव से गायब रहे और कुछ दिवंगत हो चुके हैं। इस चुनाव में उनकी बातें जरूरी हुईं, उनके कई साथी नेताओं ने उनके बिना खालीपन भी महसूस किया। दिवंगत पीएम अटल विहारी वाजयेयी का वो ब्यान जिसमें उन्होंने कहा था कि आप दोस्त बदल सकते हैं, पड़ोसी नहीं, पक्ष-विपक्ष दोनों की जुवान पर रहा।
2014 के चुनाव में अभिनेता विनोद खन्ना, भाजपा नेता सुषमा स्वराज, अरुण जेटली, मनोहर पर्रिकर जैसे स्टार प्रचारक पहुंचे थे। पीडीपी के चुनाव की कमान मुफ्ती मोहम्मद सईद ने संभाली थी। यह सभी दिवंगत हो चुके हैं। वहीं कांग्रेस से सोनिया गांधी, बसपा सुप्रीमो मायावती, भाजपा की उमा भारती, तत्कालीन भाजपा नेता रहे नवजोत सिंह सिद्धू जैसे स्टार प्रचारकों की भूमिका इस चुनाव में सिर्फ एक दर्शक मात्र बनकर सिमट गई।
उस समय तक हुर्रियत के बड़े नेता सैयद शाह गिलानी, यासीन मलिक जैसे नेताओं की आवाज नहीं सुनी गई। गिलानी रहे नहीं और मलिक जेल में हैं। मीरवाइज उमर फारूक भी नजरबंद हैं। इसके अलावा 2014 के चुनाली अखाड़े में दांव-पेंच लगाने वाले पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती, फारूक अब्दुल्ला और गुलाब नबी आजाद की भूमिका इस बार अखाड़े में सिर्फ पहलवान उतारने भर की रही।
सुषमा स्वराज, अरुण जेटली, विनोद खन्ना, मुफ्ती मोहम्मद की होती थीं ताबड़तोड़ रैलियां
2014 के चुनाव में तत्कालीन विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने कई रैलियां की। जम्मू संभाग के नगरोटा, बसोहली, महानपुर, गांधीनगर समेत जम्मू के क्षेत्र में रैलियों के जरिए उन्होंने रिफ्यूजी परिवारों को नागरिकता दिलाने से लेकर, विधानसभा में महिलाओं को आरक्षण दिलाने तक के मुद्दों पर मतदाताओं से खूब संवाद किए। इसी तरह अरुण जेटली जम्मू संभाग में होने वाली रैलियों पर अलगाववादी नेताओं पर हमेशा मुखर रहे। उनकी भूमिका संगठन की छोटी-छोटी बैठकों से लेकर असंतुष्ट नेताओं को मनाने की भी रही। भाजपा नेता और अभिनेता विनोद खन्ना ने सिर्फ जम्मू नहीं कश्मीर संभाग में भी रैलियां की। उन्होंने लद्दाख, श्रीनगर, दक्षिणी कश्मीर की शांगस समेत अन्य जगह भाजपा के लिए माहौल बनाया था। गोवा के मुख्यमंत्री दिवंगत मनोहर पर्रिकर ने भी जम्मू क्षेत्र में रैलियां की थीं। इसी तरह पीडीपी की कमान मुफ्ती मोहम्मद सईद ने संभाली थी। उन्होंने जम्मू से लेकर कश्मीर तक बीस से अधिक रैलियां की।
विस चुनाव 2014 के हर चरण में स्टार प्रचारकों की सूची में तत्कालीन भाजपा नेता नवजोत सिंह सिद्द्धू, उमा भारती और ड्रीम गर्ल मथुरा से सांसद हेमामालिनी शामिल रही थीं। ये नेता हर चरण में पूरे राज्य में भाजपा के प्रचार की धुरी बने मगर इस चुनाव में नदारद रहे। हेमामालिनी मथुरा से सांसद हैं, वह उम्र का हवाला देखर नहीं आईं। पिछले चुनाव में हेमा मालिनी को देखने के लिए भाजपा की रैलियों में भीड़ उमड़ती थी। वहीं हिंदुत्व के मुद्दों पर भाजपा की ओर से सबसे अधिक रैलियां करने वालीं उमा भारती इस चुनाव में नहीं दिखाई दीं। वह भी करीब पांच साल से सक्रिय राजनीति से बाहर हैं। नवजोत सिंह कांग्रेस में जाने के बाद सक्रिय नहीं हैं। इसी तरह उस चुनाव तक भाजपा के दो बड़े मुस्लिम चेहरों मुख्तार अब्बास नकवी और शाहनवाज हुसैन ने कई रैलियां की थी। उनकी सक्रियता भी नहीं दिखी।
सोनिया गांधी और मायावती नहीं दिखीं
कांग्रेस की ओर पूरे जम्मू-कश्मीर में पिछले चुनाव की कमान तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने संभाली थी। उनके साथ राहुल गांधी और पूर्व पीएम मनमोहन सिंह की रैलियां हुई थीं। इस चुनाव में सोनिया गांधी की कोई रैली नहीं हुई और न ही उनका कोई बयान आया। मनमोहन सिंह भी इस चुनाव से दूर रहे। कांग्रेस से राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और राष्ट्रीय अध्यक्ष खरगे ने कमान संभाली। इसी तरह बसपा की बड़ी रैलियां करने वाली मायावती इस चुनाव में कहीं नहीं दिखाई दीं और न ही उनकी पार्टी का कोई नेता दिखा।
तीन पूर्व सीएम ने नहीं लड़ा चुनाव
पूर्व मुख्यमंत्री गुलाब नबी आजाद 2014 के चुनाव में कांग्रेस के स्टार प्रचारक रहे और कई रैलियां की। इस बार उन्होंने अपनी पार्टी डीपीएपी से प्रत्याशी उतारे। तबीयत खराब होने के चलते अंतिम समय में प्रचार किया मगर खुद चुनाव नहीं लड़ा। पूर्व सीएम फारूक अब्दुल्ला पूरे चुनाव में सक्रिय रहे। बैठकें और रैलियां कीं लेकिन चुनाव लड़ने से दूरी बना ली। इसी तरह पूर्व सीएम महबूबा मुफ्ती ने पीडीपी के चुनाव प्रचार की कमान संभाली लेकिन खुद चुनाव नहीं लड़ा।
न हुर्रियत दिखी न उसका प्रभाव
2014 के चुनाव में हुर्रियत खूब प्रभावी रही थी, लेकिन इस चुनाव में हुर्रियत बिखर गई। प्रमुख नेता सैयद शाह गिलानी गुजर गए तो यासीन मलिक, बरकती, मसरत आलम, शब्बीर शाह जेल में हैं तो इस पूरे चुनाव के दौरान हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के नेता मीरवाइज उमर फारूक नजरबंद रहे तो चुनाव में हुर्रियत की ओर से आने वाले बयान भी इस बार इसका हिस्सा नहीं बने।