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Independence Day : शायर जगन्नाथ आजाद जम्मू-कश्मीर में हुए गुमनाम, लिखा था पाकिस्तान का पहला कौमी तराना

Sun, 14 Aug 2022 07:48 PM IST
अनुराग सक्सेना ओमपाल संब्याल, जम्मू
ओमपाल संब्याल, जम्मू Published by: अनुराग सक्सेना Updated Sun, 14 Aug 2022 07:48 PM IST
सार

जगन्नाथ आजाद की बेटी ने बताया कि पिता ने तराना लिखकर नौ अगस्त को सौंप दिया। इसे एक कमेटी और फिर खुद जिन्ना ने मंजूरी दी। यही कौमी तराना पाकिस्तान के लाहौर रेडियो स्टेशन से 14 अगस्त 1947 को रात 12 बजे नश्र किया गया। हालांकि जिन्ना के इंतकाल के बाद पाकिस्तान ने कौमी तराना बदल दिया।

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Independence Day Jagannath Azad wrote Pakistan's first Qaumi Tarana anonymous in Jammu-Kashmir
राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा के साथ शायर जगन्नाथ आज़ाद - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

चौदह अगस्त 1947 की आधी रात को लाहौर रेडियो स्टेशन से पाकिस्तान का जो कौमी तराना गूंजा, उसे हिंदू शायर जगन्नाथ आजाद ने लिखा था। विभाजन के बाद पाकिस्तान से दिल्ली और फिर जम्मू-कश्मीर में रहे जगन्नाथ आजाद उर्दू साहित्य का बड़ा नाम होकर भी जम्मू-कश्मीर में गुमनाम हैं। साल 2004 में उनका देहांत हो गया था।

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पाकिस्तान का राष्ट्रगान यानी कौमी तराना का आजाद ने अपनी दो किताबों और मुशायरों में जिक्र किया था। उन्होंने लिखा...कृष्ण नगर का रामनगर मोहल्ला खाली होना शुरू हो गया था। फसाद के माहौल में हिंदुओं के कुछ ही परिवार रुके थे। हर दिन हिंदुओं के परिवार घटते जा रहे थे। एक दिन पता चला कि साठ हजार की आबादी में अब केवल मैं ही हिंदू रह गया हूं। इस आलम में 14 अगस्त 1947 की रात बारह बजे मैंने लाहौर रेडियो से अपना तराना-ए-पाकिस्तान सुना।

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Independence Day Jagannath Azad wrote Pakistan's first Qaumi Tarana anonymous in Jammu-Kashmir
जगन्नाथ आजाद की बड़ी बेटी मुक्ता लाल - फोटो : अमर उजाला

सर जमीन-ए-पाक, जर्रे तेरे हैं आज सितारों से ताबनाक!...

आंखें तरसतियां हैं और हयात-ए-महरूम किताब में आजाद की कलम से लिखीं इन पंक्तियों का जिक्र कर बड़ी बेटी मुक्ता लाल और सबसे छोटी बेटी पूनम आजाद की आंखें भर आती हैं। जम्मू के त्रिकुटा नगर में रह रहीं पूनम आजाद ने बताया कि 27 साल की उम्र में पिता जगन्नाथ को पाकिस्तान के कायदे आजम मोहम्मद अली जिन्ना ने कौमी तराना लिखने के लिए चुना था।

उन्होंने बताया कि पिता ने तराना लिखकर नौ अगस्त को सौंप दिया। इसमें लफ्ज और मजमून धर्मनिरपेक्ष थे। इसे एक कमेटी और फिर खुद जिन्ना ने मंजूरी दी। यही कौमी तराना पाकिस्तान के लाहौर रेडियो स्टेशन से 14 अगस्त रात 12 बजे नश्र किया गया। हालांकि जिन्ना के इंतकाल के बाद पाकिस्तान ने कौमी तराना बदल दिया, जिसे हाफिज जालंधरी ने कलमबद्ध किया।

Independence Day Jagannath Azad wrote Pakistan's first Qaumi Tarana anonymous in Jammu-Kashmir
जगन्नाथ आजाद की छोटी बेटी पूनम आजाद - फोटो : अमर उजाला

पूनम आजाद और मुक्ता लाल कहती हैं कि पाकिस्तान में आज भी बहुत से लोग पहले कौमी तराने को नहीं भूले हैं। पाकिस्तान में कला और साहित्य से जुड़े कई लोगों ने उनसे इस मामले में संपर्क भी किया है। उन्होंने कहा कि किसी मुल्क का कौमी तराना लिखना और अपनाना ऐतिहासिक घटना होती है। इसे सम्मानपूर्वक संजोकर रखना चाहिए।

जम्मू विश्वविद्यालय में शुरू हो छात्रवृत्ति

पूनम आजाद ने कहा कि पिता ने जम्मू विश्वविद्यालय में उर्दू साहित्य को अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचाया, लेकिन कई बार मांग करने के बावजूद जम्मू-कश्मीर में न तो पिता के नाम से कोई सड़क है न इमारत। जम्मू विश्वविद्यालय में उनके नाम से छात्रवृत्ति शुरू करने की मांग पर भी विचार नहीं हुआ।

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जम्मू-कश्मीर में पोस्टिंग हुई और यहीं के हो गए

पूनम कहती हैं कि पिता ने किसी भी हाल में अपने गांव की मिट्टी को न छोड़ने का इरादा कर लिया था, लेकिन हालात इतने बिगड़े कि उन्हें रातों रात हिंदुस्तान आना पड़ा। पाकिस्तान से पहले दिल्ली आए। एक अखबार में काम करना शुरू किया। फिर सरकारी नौकरी लग गई। प्रेस इंफारमेशन ब्यूरो में जम्मू-कश्मीर के मुखिया के तौर पर पोस्टिंग होने के बाद उन्होंने जम्मू-कश्मीर को ही कर्मभूमि बना लिया। बाद में जम्मू विश्वविद्यालय में उर्दू विभाग के एचओडी रहे जगन्नाथ को साल की एक्सटेंशन भी मिली। उन्होंने उर्दू और अंग्रेजी में 70 से ज्यादा किताबें लिखीं जिन्हें अदब की दुनिया का बड़ा सरमाया माना जाता है।

पाकिस्तान में मिला हाफिज-ए-इकबाल का खिताब

सारे जहां से अच्छा... लिखने वाले अलामा इकबाल पर शोध के लिए उन्हें पाकिस्तान में हाफिज-ए-इकबाल का खिताब दिया गया। दिल्ली में रह रहीं जगन्नाथ की बेटी मुक्ता लाल कहती हैं कि पिता ने अलामा इकबाल पर गहन शोध किया। अलामा इकबाल की जन्म तिथि को आधिकारिक रूप से साबित करने में भी उनका योगदान रहा है। उन्हें पाकिस्तान में हाफिज-ए-इकबाल का खिताब मिला।

जम्मू विश्वविद्यालय में कई वर्ष आजाद के साथ काम कर चुके जम्मू निवासी सुभाष सांगड़ा का कहना है कि भारत और पाकिस्तान समेत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उर्दू अदब का बड़ा नाम जम्मू-कश्मीर में अब भुला दिया गया है। उनके नाम से कोई कार्यक्रम तक नहीं होता। यह दुर्भाग्यपूर्ण है।

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