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दिलों में उतर गए इनायत और केहरू के किरदार
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रियासी में नाटक का मंचन करते कलाकार। संवाद
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रियासी। ऑडिटोरियम में जारी नेशनल थिएटर फेस्टिवल में शुक्रवार को वर्ष 1947 में भारत-पाकिस्तान के बीच हुए विभाजन के दर्द को दर्शाया गया। डॉक्टर साहिब सिंह लिखित पंजाबी नाटक ‘परींदे हून जान कूत्थे’ का मंचन तेजिंदर सिंह प्रेमी के निर्देशन में किया गया। नाटक में लोगों को इनायत और केहरू का किरदार खूब पसंद आया। दोनों का किरदार लोगों के दिलों में उतर गए। कहानी में इनायत को उस के पिता पहले से शादीशुदा एक व्यक्ति को अढ़ाई सौ रुपये में बेचना चाहते हैं, जिसका पता चलते ही वह घर से भाग जाती है। लेकिन परिस्थितियां उसका पीछा नहीं छोड़ती और उसे फिर से बिकने पर मजबूर होना पड़ता है।
दस नंबरी कहलाने वाला बदमाश केहर सिंह उर्फ केहरू उसे आठ सौ रुपये में खरीदता है। केहरू बचपन से ही घरेलू हिंसा का शिकार रहा, उसका पिता परिवार के सदस्यों को मारता पीटता रहता था। इससे केहरू के दिमाग में नफरत भरी रहती है और वह एक दुष्ट व्यक्ति बन जाता है। इनायती के केहरू के पास आने के बाद वह एक सज्जन पुरुष बन जाता है तथा आपराधिक पृष्ठभूमि को छोड़ कर खेतीबाड़ी का काम करने लगता है। दिल से प्यार करते हुए केहरू इनायती का सिख परंपरा के साथ उसको नया नाम हरबंस कौर देता है। दोनों के बीच हुए रिश्ते में पैदा हुए बच्चे का नाम दीपा रखा जाता है। केहरू के तीन बदमाश दोस्त मलूक सिंह, प्रीतू तथा जीता केहरू के सुखी जीवन का बर्बाद करने की पुरी कोशिश करते है। विभाजन के बाद दोनों देशों के बीच पुनर्वास कानून बनाया जाता है, जिसमें कहा जाता है कि जो महिला जहां जाना चाहती है वह वहां जा सकती है। कानून के इस पेंच में इनायती (हरबंस कौर) का जीवन पुरी तरह से उलझ कर रह जाता है। वह कहां जाए, उसके पास कोई रास्ता नहीं रह जाता है। नाटक में इनायती उर्फ हरबंस कौर का किरदार अपर्णा शर्मा, केहर सिंह का पात्र तेजिंदर सिंह प्रेमी, सरपंच ताया का पात्र मक्खन लाल शर्मा, जीता की भूमिका को राजिंदर नारंग तथा दीपा के किरदार को मैथिली शर्मा ने निभाया। विभाजन के स्थिति के साथ ही केहरू व हरबंस कौर के बीच दर्शाए गए आपसी स्नेह, प्यार को दर्शकों की खूब वाहवाही मिली। शनिवार को सबरंग कला संगम की तरफ से हिंदी नाटक संध्या छाया का मंचन किया जाएगा।
नोट खबर फोटो सहित।
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दस नंबरी कहलाने वाला बदमाश केहर सिंह उर्फ केहरू उसे आठ सौ रुपये में खरीदता है। केहरू बचपन से ही घरेलू हिंसा का शिकार रहा, उसका पिता परिवार के सदस्यों को मारता पीटता रहता था। इससे केहरू के दिमाग में नफरत भरी रहती है और वह एक दुष्ट व्यक्ति बन जाता है। इनायती के केहरू के पास आने के बाद वह एक सज्जन पुरुष बन जाता है तथा आपराधिक पृष्ठभूमि को छोड़ कर खेतीबाड़ी का काम करने लगता है। दिल से प्यार करते हुए केहरू इनायती का सिख परंपरा के साथ उसको नया नाम हरबंस कौर देता है। दोनों के बीच हुए रिश्ते में पैदा हुए बच्चे का नाम दीपा रखा जाता है। केहरू के तीन बदमाश दोस्त मलूक सिंह, प्रीतू तथा जीता केहरू के सुखी जीवन का बर्बाद करने की पुरी कोशिश करते है। विभाजन के बाद दोनों देशों के बीच पुनर्वास कानून बनाया जाता है, जिसमें कहा जाता है कि जो महिला जहां जाना चाहती है वह वहां जा सकती है। कानून के इस पेंच में इनायती (हरबंस कौर) का जीवन पुरी तरह से उलझ कर रह जाता है। वह कहां जाए, उसके पास कोई रास्ता नहीं रह जाता है। नाटक में इनायती उर्फ हरबंस कौर का किरदार अपर्णा शर्मा, केहर सिंह का पात्र तेजिंदर सिंह प्रेमी, सरपंच ताया का पात्र मक्खन लाल शर्मा, जीता की भूमिका को राजिंदर नारंग तथा दीपा के किरदार को मैथिली शर्मा ने निभाया। विभाजन के स्थिति के साथ ही केहरू व हरबंस कौर के बीच दर्शाए गए आपसी स्नेह, प्यार को दर्शकों की खूब वाहवाही मिली। शनिवार को सबरंग कला संगम की तरफ से हिंदी नाटक संध्या छाया का मंचन किया जाएगा।
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