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Jammu News: मुआवजा लेकर जमीन खरीदने से मना नहीं कर सकता मालिक
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जम्मू। जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने साफ किया है कि मालिक मुआवजा लेकर जमीन खरीदने से मना नहीं कर सकता। जस्टिस रजनेश ओसवाल और जस्टिस राजेश सेखरी की डिवीजन बेंच ने एक दस साल पुराने मामले में फैसला सुनाया।
जम्मू के गांव राख भाऊ में रवैल चंद के कानूनी वारिसों ने 36 कनाल और 17 मरला जमीन से जुड़े विवाद में अपील की थी जो सिंगल बेंच के उस फैसले के खिलाफ थी जिसमें रिट पिटीशन खारिज कर दी गई थी। अपीलकर्ता ने दावा किया था कि जमीन के बारे में कोई अवॉर्ड पास नहीं किया गया था। वकील ने तर्क दिया कि अपील करने वाले को सिर्फ संदर्भ प्रक्रिया में हिस्सा लेने के आधार पर मालिकाना हक जताने से नहीं रोका जा सकता। उन्हें तय कीमत का सिर्फ एक तिहाई मुआवजा दिया गया था। विरोध करते हुए सीनियर एडिशनल एडवोकेट जनरल ने कहा कि अपीलकर्ता ने खुद मुआवजा काफी न होने के आधार पर धारा 18 के तहत संदर्भ मांगा था और कोर्ट के सामने पेश हुआ था। उसने मुआवजा बढ़ोतरी की मांग की थी और बढ़ा हुआ मुआवजा स्वीकार कर लिया।
डिवीजन बेंच ने नोट किया कि अपील करने वाले ने रेफरेंस कोर्ट के सामने गवाही दी थी। चुनौती के बाद उसे 72,677.33 रुपये का बढ़ा मुआवजा मिला था। कोर्ट ने कहा कि कानूनी उपाय का इस्तेमाल करने और उससे होने वाले फायदे को मानने के बाद अपील करने वाले को उल्टा रुख अपनाने और यह दावा करने की इजाजत नहीं दी जा सकती कि अधिग्रहण हुआ ही नहीं था।
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किसी मुद्दई को वित्तीय लाभ के लिए अलग-अलग कार्रवाई में बात मनवाने या रुख बदलने की इजाजत नहीं दी जा सकती। अधिग्रहण आखिरी दौर में पहुंच गया था। चुनौती देने लायक नहीं था। हालांकि कोर्ट ने यह भी पाया कि केवल एक-तिहाई मुआवजे के भुगतान के दावे को सत्यापित करने की जरूरत है। अगर यह पाया जाता है कि अपीलकर्ता को केवल एक-तिहाई मुआवजा दिया गया था तो अधिकारी आदेश की प्रमाणित प्रति मिलने की तारीख से तीन महीने के अंदर बाकी रकम ब्याज के साथ जारी करेंगे। जेएनएफ
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जम्मू के गांव राख भाऊ में रवैल चंद के कानूनी वारिसों ने 36 कनाल और 17 मरला जमीन से जुड़े विवाद में अपील की थी जो सिंगल बेंच के उस फैसले के खिलाफ थी जिसमें रिट पिटीशन खारिज कर दी गई थी। अपीलकर्ता ने दावा किया था कि जमीन के बारे में कोई अवॉर्ड पास नहीं किया गया था। वकील ने तर्क दिया कि अपील करने वाले को सिर्फ संदर्भ प्रक्रिया में हिस्सा लेने के आधार पर मालिकाना हक जताने से नहीं रोका जा सकता। उन्हें तय कीमत का सिर्फ एक तिहाई मुआवजा दिया गया था। विरोध करते हुए सीनियर एडिशनल एडवोकेट जनरल ने कहा कि अपीलकर्ता ने खुद मुआवजा काफी न होने के आधार पर धारा 18 के तहत संदर्भ मांगा था और कोर्ट के सामने पेश हुआ था। उसने मुआवजा बढ़ोतरी की मांग की थी और बढ़ा हुआ मुआवजा स्वीकार कर लिया।
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डिवीजन बेंच ने नोट किया कि अपील करने वाले ने रेफरेंस कोर्ट के सामने गवाही दी थी। चुनौती के बाद उसे 72,677.33 रुपये का बढ़ा मुआवजा मिला था। कोर्ट ने कहा कि कानूनी उपाय का इस्तेमाल करने और उससे होने वाले फायदे को मानने के बाद अपील करने वाले को उल्टा रुख अपनाने और यह दावा करने की इजाजत नहीं दी जा सकती कि अधिग्रहण हुआ ही नहीं था।
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किसी मुद्दई को वित्तीय लाभ के लिए अलग-अलग कार्रवाई में बात मनवाने या रुख बदलने की इजाजत नहीं दी जा सकती। अधिग्रहण आखिरी दौर में पहुंच गया था। चुनौती देने लायक नहीं था। हालांकि कोर्ट ने यह भी पाया कि केवल एक-तिहाई मुआवजे के भुगतान के दावे को सत्यापित करने की जरूरत है। अगर यह पाया जाता है कि अपीलकर्ता को केवल एक-तिहाई मुआवजा दिया गया था तो अधिकारी आदेश की प्रमाणित प्रति मिलने की तारीख से तीन महीने के अंदर बाकी रकम ब्याज के साथ जारी करेंगे। जेएनएफ