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Jammu News: जीएमसी में सीएमओ के कमरे से हिदायत मिलने के बावजूद पौने घंटे तक तड़पती रही पीड़िता
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आशुतोष
जम्मू। भइया, भइया, भइया, सुनो ना भइया... इन शब्दों की आवाज नर्सिंग कमरा नंबर 15 के बाहर मुख्य इमरजेंसी में गूंजती रही। अर्धनग्न अवस्था में पीड़िता को देखकर लोग मायूस हो गए। उस वार्ड में एक मरीज के अलावा अन्य कोई नहीं था। चिल्लाते हुए अधेड़ उम्र की बेसहारा महिला बार-बार स्टाफ को पुकार रही थी, लेकिन उसका दर्द दूर करने के लिए कोई आगे नहीं आ रहा था। हालांकि मरीजों के साथ आए तीमारदार वार्ड बॉय को समस्या बता रहे थे, मगर जवाब मिल रहा था कि हम कुछ नहीं कर सकते, डॉक्टर के पास जाओ। कमरा नंबर 2 में एक चिकित्सक (मेडिकल स्टूडेंट) के सहारे इमरजेंसी ओपीडी थी। वहां गए तो तुरंत बाहर तैनात सुरक्षा कर्मी अंदर आ गया। समस्या बताने पर बोला-रहने दो तड़पने दो, इस औरत का दिमागी संतुलन ठीक नहीं है। यह सुनकर लगा कि इंसानियत भी अव्यवस्था का शिकार बन गई है।
ऐसे हालात जीएमसी में बुधवार 12 से दो बजे के थे। पीड़िता का हाल पौने दो बजे के बाद पूछा जब सीएमओ के कमरे में बैठीं महिला चिकित्सक ने तीमारदार के कहने पर आदेश एक बजे दिए। 45 मिनट तक हिदायत समस्याओं की तरह उलझती रही। बाड़ी ब्राह्मणा से सर्पदंश के पीड़ित दिनेश के साथ आए शिव कुमार घर जाते हुए इंसानियत की मिसाल कायम कर गए। वहीं, पूरे परिसर में हालात बद से बदतर हैं। मुख्य आपातकालीन वार्ड में स्ट्रेचर जैसी दिक्कतों की कतार लगी है। कमरा नंबर छह में दो चिकित्सक हैं। भीड़ इतनी है कि वे सुरक्षा कर्मी को यह तक बोले गए कि मरीजों की किसी भाषा (हिंदी, डोगरी या पंजाबी) में समझा दो, केवल बारी-बारी दो ही पीड़ित भेजो। इसी तरह आठ नंबर कमरे के बाहर डिजिटल एक्स-रे के लिए लंबी लाइन लगी है, बारी कब आएगी यह सवाल चिंताओं की तरह बढ़ रहा था। सिटी स्कैन और अल्ट्रासाउंड के लिए मरीजों के साथ आए तीमारदारों के हाथों में ग्लूकोज की बोतल से कब छुटकारा मिलेगा, इसका जवाब भी शायद किसी के पास होगा।
आठ घंटे तक स्ट्रेचर पर चिकित्सक का इंतजार
स्थिति इतनी खराब हो चुकी है कि आठ घंटे तक ठोकरें नहीं मिल रही हैं। इसकी उदाहरण मुख्य इमरजेंसी वार्ड में स्ट्रेचर पर पड़ी गोदावरी देखी को देखकर मिलती है। पंकज ने बताया कि शाम साढ़े सात बजे सांबा से पहुंचे। 2 बज रहे हैं, मगर अभी तक किसी ने यह नहीं बताया कि इलाज होना है या डिस्चार्ज करना है। कहने पर भी चिकित्सक नहीं आए।
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टेस्ट की भरमार, दो घंटे तक नहीं इलाज
विशेषज्ञों की कमी इतनी है कि तीमारदारों को टेस्ट की सूची लेकर भटकना पड़ रहा है। अगर कोई व्यवस्था से परिचित है तो भी दो घंटे तक टेस्ट ही हो रहे हैं। इस कुप्रबंध का शिकार अरनिया से 12 बजे पहुंचे आदित्य हुए। उनके अनुसार पिता त्रिशन कुमार को बीपी व हर्निया की शिकायत है। रात 2 बजे तक टेस्ट ही करवा रहे हैं। इलाज कब होगा, इसकी जानकारी नहीं है। हैरानी तो तब हुई जब सीएमओ के कमरे के बाहर मरीज को स्ट्रैचर पर लेटाया था। चंद कदम दूर बैठीं चिकित्सक भी बदइंतजामी से वाकिफ नहीं थीं।
डेंगू वार्ड कहां है, जवाब-इधर जाओ उधर जाओ
कुछ लोग वार्डों की जानकारी मांग रहे थे। पूछ रहे थे कि डेंगू वार्ड कहां पर है। कमरा नंबर छह के बाहर बैठा सुरक्षा कर्मी बोला- इमरजेंसी वार्ड में है, किसी ने कहा- इधर सामने ही है, मगर भटकने के बावजूद डेंगू वार्ड नहीं मिला। लौटते हुए फिर मुख्य प्रवेश द्वार पर पूछा गया तो वहां से आखिरकार सही रास्ता मिल गया।
व्यवस्था में सुधार किया जा रहा है। बेसहारा मरीजों की देखरेख के साथ वर्करों की कमी को दूर करने के लिए सामाजिक कल्याण विभाग से बातचीत चली रही है। तीमारदारों और मरीजों की सुविधा के लिए विशेषज्ञों का ड्यूटी रोस्टर बनाया गया है। उम्मीद है कि अगले माह से स्थिति में काफी बदलाव आएगा।
-डॉ. आशुतोष गुप्ता, प्रिंसिपल, जीएमसी
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जम्मू। भइया, भइया, भइया, सुनो ना भइया... इन शब्दों की आवाज नर्सिंग कमरा नंबर 15 के बाहर मुख्य इमरजेंसी में गूंजती रही। अर्धनग्न अवस्था में पीड़िता को देखकर लोग मायूस हो गए। उस वार्ड में एक मरीज के अलावा अन्य कोई नहीं था। चिल्लाते हुए अधेड़ उम्र की बेसहारा महिला बार-बार स्टाफ को पुकार रही थी, लेकिन उसका दर्द दूर करने के लिए कोई आगे नहीं आ रहा था। हालांकि मरीजों के साथ आए तीमारदार वार्ड बॉय को समस्या बता रहे थे, मगर जवाब मिल रहा था कि हम कुछ नहीं कर सकते, डॉक्टर के पास जाओ। कमरा नंबर 2 में एक चिकित्सक (मेडिकल स्टूडेंट) के सहारे इमरजेंसी ओपीडी थी। वहां गए तो तुरंत बाहर तैनात सुरक्षा कर्मी अंदर आ गया। समस्या बताने पर बोला-रहने दो तड़पने दो, इस औरत का दिमागी संतुलन ठीक नहीं है। यह सुनकर लगा कि इंसानियत भी अव्यवस्था का शिकार बन गई है।
ऐसे हालात जीएमसी में बुधवार 12 से दो बजे के थे। पीड़िता का हाल पौने दो बजे के बाद पूछा जब सीएमओ के कमरे में बैठीं महिला चिकित्सक ने तीमारदार के कहने पर आदेश एक बजे दिए। 45 मिनट तक हिदायत समस्याओं की तरह उलझती रही। बाड़ी ब्राह्मणा से सर्पदंश के पीड़ित दिनेश के साथ आए शिव कुमार घर जाते हुए इंसानियत की मिसाल कायम कर गए। वहीं, पूरे परिसर में हालात बद से बदतर हैं। मुख्य आपातकालीन वार्ड में स्ट्रेचर जैसी दिक्कतों की कतार लगी है। कमरा नंबर छह में दो चिकित्सक हैं। भीड़ इतनी है कि वे सुरक्षा कर्मी को यह तक बोले गए कि मरीजों की किसी भाषा (हिंदी, डोगरी या पंजाबी) में समझा दो, केवल बारी-बारी दो ही पीड़ित भेजो। इसी तरह आठ नंबर कमरे के बाहर डिजिटल एक्स-रे के लिए लंबी लाइन लगी है, बारी कब आएगी यह सवाल चिंताओं की तरह बढ़ रहा था। सिटी स्कैन और अल्ट्रासाउंड के लिए मरीजों के साथ आए तीमारदारों के हाथों में ग्लूकोज की बोतल से कब छुटकारा मिलेगा, इसका जवाब भी शायद किसी के पास होगा।
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आठ घंटे तक स्ट्रेचर पर चिकित्सक का इंतजार
स्थिति इतनी खराब हो चुकी है कि आठ घंटे तक ठोकरें नहीं मिल रही हैं। इसकी उदाहरण मुख्य इमरजेंसी वार्ड में स्ट्रेचर पर पड़ी गोदावरी देखी को देखकर मिलती है। पंकज ने बताया कि शाम साढ़े सात बजे सांबा से पहुंचे। 2 बज रहे हैं, मगर अभी तक किसी ने यह नहीं बताया कि इलाज होना है या डिस्चार्ज करना है। कहने पर भी चिकित्सक नहीं आए।
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टेस्ट की भरमार, दो घंटे तक नहीं इलाज
विशेषज्ञों की कमी इतनी है कि तीमारदारों को टेस्ट की सूची लेकर भटकना पड़ रहा है। अगर कोई व्यवस्था से परिचित है तो भी दो घंटे तक टेस्ट ही हो रहे हैं। इस कुप्रबंध का शिकार अरनिया से 12 बजे पहुंचे आदित्य हुए। उनके अनुसार पिता त्रिशन कुमार को बीपी व हर्निया की शिकायत है। रात 2 बजे तक टेस्ट ही करवा रहे हैं। इलाज कब होगा, इसकी जानकारी नहीं है। हैरानी तो तब हुई जब सीएमओ के कमरे के बाहर मरीज को स्ट्रैचर पर लेटाया था। चंद कदम दूर बैठीं चिकित्सक भी बदइंतजामी से वाकिफ नहीं थीं।
डेंगू वार्ड कहां है, जवाब-इधर जाओ उधर जाओ
कुछ लोग वार्डों की जानकारी मांग रहे थे। पूछ रहे थे कि डेंगू वार्ड कहां पर है। कमरा नंबर छह के बाहर बैठा सुरक्षा कर्मी बोला- इमरजेंसी वार्ड में है, किसी ने कहा- इधर सामने ही है, मगर भटकने के बावजूद डेंगू वार्ड नहीं मिला। लौटते हुए फिर मुख्य प्रवेश द्वार पर पूछा गया तो वहां से आखिरकार सही रास्ता मिल गया।
व्यवस्था में सुधार किया जा रहा है। बेसहारा मरीजों की देखरेख के साथ वर्करों की कमी को दूर करने के लिए सामाजिक कल्याण विभाग से बातचीत चली रही है। तीमारदारों और मरीजों की सुविधा के लिए विशेषज्ञों का ड्यूटी रोस्टर बनाया गया है। उम्मीद है कि अगले माह से स्थिति में काफी बदलाव आएगा।
-डॉ. आशुतोष गुप्ता, प्रिंसिपल, जीएमसी